प्र1.
‘अत्र इदम् अवधेयम्’ इति खण्डे किम् दत्तम् अस्ति ? तस्य कः उपयोगः ? अन्वयस्य निर्माणस्य नियमान् उदाहरणेन सह लिखत।
उत्तर
उत्तरम् — ‘अत्र इदम् अवधेयम्’ इति खण्डे पाठस्य अष्टानां श्लोकानाम् अन्वयः दत्तः अस्ति। श्लोके पदानि छन्दसः अनुरोधात् इतस्ततः स्थापितानि भवन्ति; अन्वये तानि एव पदानि गद्यक्रमेण योजितानि सन्ति, केचन अध्याहृतशब्दाः च कोष्ठके दत्ताः। अनेन श्लोकस्य अर्थः सुगमः भवति।
(हिन्दी — इस खण्ड में पाठ के आठों श्लोकों का अन्वय दिया गया है। श्लोक में पद छन्द के कारण इधर-उधर रखे होते हैं; अन्वय में वही पद गद्य के क्रम में जमा दिए जाते हैं और जो शब्द श्लोक में छूट गए हों वे कोष्ठक में जोड़ दिए जाते हैं। इससे श्लोक का अर्थ सरलता से खुल जाता है।)
अन्वय बनाने के नियम —
- पहले कर्ता (प्रथमा विभक्ति का पद) रखिए, फिर उसके विशेषण।
- फिर कर्म (द्वितीया), फिर करण/सम्प्रदान/अपादान/सम्बन्ध/अधिकरण के पद — अर्थ के क्रम से।
- अन्त में क्रियापद रखिए। संस्कृत गद्य में क्रिया प्रायः वाक्य के अन्त में आती है।
- अव्यय (न, खलु, हि, एव, अपि, तु) उसी पद के साथ रहें जिसका वे अर्थ बदलते हैं।
- जो क्रिया या पद श्लोक में लुप्त हो पर अर्थ के लिए चाहिए, उसे कोष्ठक में जोड़िए — जैसे (अस्ति), (भवति), (सिध्यन्ति), (कार्यम्)।
| श्लोकः | श्लोक-क्रमः (जैसा छपा है) | अन्वय-क्रमः (पुस्तक का) |
|---|---|---|
| १ | दृष्टिपूतं न्यसेत् पादम् | दृष्टिपूतं पादं न्यसेत् — कर्म ‘पादम्’ क्रिया से पहले आ गया |
| ३ | तत्तदेवेतरो जनः | इतरः जनः तत् तत् एव (आचरति) — कर्ता पहले, लुप्त क्रिया कोष्ठक में |
| ४ | अभ्यासेन क्रियाः सर्वाः | सर्वाः क्रियाः अभ्यासेन (सिध्यन्ति) — विशेषण ‘सर्वाः’ विशेष्य से पहले, क्रिया जोड़ी गई |
| ५ | प्रारभ्यते न खलु विघ्नभयेन नीचैः | नीचैः विघ्नभयेन (कार्यं) न प्रारभ्यते खलु — कर्मवाच्य का कर्ता ‘नीचैः’ पहले |
| ८ | सहसा विदधीत न क्रियाम् | क्रियां सहसा न विदधीत — कर्म पहले, क्रिया अन्त में |
अन्वय क्यों सीखना चाहिए: श्लोक का अर्थ तब तक नहीं खुलता जब तक यह न पता चले कि कौन-सा पद किस पद से जुड़ा है। अन्वय यही जोड़ दिखाता है। इसीलिए अभ्यास का प्रश्न ६ सीधे अन्वय में रिक्तस्थान भरवाता है — अर्थात् परीक्षा इस बात की है कि आपने श्लोक रटा है या समझा है। जो पद-सम्बन्ध समझ गया, वह भूला हुआ पद भी अपने-आप भर देगा।
ध्यान दें: इस पाठ में ‘भावार्थः’ खण्ड नहीं है — जो अन्य पाठों में श्लोक का संस्कृत सारांश देता है। यहाँ उसकी जगह अन्वय दिया गया है, क्योंकि पाठ सुभाषितों का सङ्कलन है और हर सुभाषित अपने-आप में पूर्ण है; उसे केवल क्रम में लगाने की आवश्यकता है, फिर से कहने की नहीं।