प्र1.
‘सर्वं शब्देन भासते’ इति तालिकायाः अन्तिमः स्तम्भः — ‘मातृभाषया अर्थं लिखत’ — रिक्तः अस्ति। पाठे प्रयुक्तानां सर्वेषां पदानाम् अर्थान् ज्ञात्वा तं स्तम्भं पूरयत।
उत्तर
पुस्तक ने इस तालिका का अन्तिम स्तम्भ जान-बूझकर खाली छोड़ा है — विद्यार्थी को हर शब्द का अर्थ अपनी मातृभाषा में लिखना है। नीचे पूरी तालिका (उनतीस पद) दी है और वह स्तम्भ हिन्दी में भर दिया गया है। जिनकी मातृभाषा मराठी, बाङ्ग्ला, गुजराती, तमिऴ, तेलुगु, कन्नड, ओड़िआ या कोई अन्य भारतीय भाषा है, वे इसी अर्थ के आधार पर अपनी भाषा का शब्द रखें।
| शब्दः | अर्थः (संस्कृतम्) | हिन्दी | English | मातृभाषया अर्थम् (भरा हुआ — हिन्दी) |
|---|---|---|---|---|
| अनुवर्तते (अनु + √वृत्, लट्.प्र.पु.ए.व.) | अनुसरति | अनुसरण करता है | Follows | पीछे-पीछे चलता है, वैसा ही करने लगता है |
| अवद्यम् (नञ्-तत्पुरुषः, न+वद्+यत्) | न वद्यम् | निम्नस्तरीय | Inferior | निन्दा के योग्य, घटिया |
| अस्तेयम् (नञ्-तत्पुरुषः, नपुं.प्र.ए.व.) | न स्तेयम् | चोरी न करना | Not stealing | पराया धन न लेना, चोरी से बचना |
| आपदाम् (स्त्री.ष.ब.व.) | विपत्तीनाम् | खतरों का | Of dangerous | विपत्तियों का, मुसीबतों का |
| उद्योगिनम् (पुं.द्वि.ए.व.) | उद्योगः अस्य अस्ति इति, तम् | प्रयत्न करने वाले को | Industrious | मेहनती को, उद्यमी को |
| कापुरुषाः (कर्मधारयसमासः, पुं.प्र.ब.व.) | कुत्सिताः पुरुषाः | कायर / अधम | Cowards | डरपोक लोग, नीच पुरुष |
| गुणलुब्धाः (सप्तमीतत्पुरुषः, पुं.प्र.ब.व.) | गुणानाम् अभिलाषिणः, गुणेषु लुब्धाः | गुण को चाहने वाले | Those who desire good qualities | गुणों के लोभी, गुण देखकर आने वाले |
| दमः (पुं.प्र.ए.व.) | इन्द्रियाणां मनसः च नियन्त्रणम् | इन्द्रिय एवं मन को वश में करना | Controlling senses | आत्म-संयम, मन पर काबू |
| दैवम् (नपुं.प्र.ए.व.) | विधिः / भाग्यम्, देवस्य इदम् | भाग्य | Luck | किस्मत, नसीब, होनहार |
| निहत्य (नि + √हन् + ल्यप्) | अतिक्रम्य | अतिक्रमण करके | Having crossed | पीछे धकेलकर, हराकर |
| नीचैः (कर्मवाच्ये, तृ.ब.व.) | अधमजनैः | अधम लोगों द्वारा | By inferior people | नीच लोगों के द्वारा, हीन प्रकृति के लोगों से |
| न्यसेत् (नि + √अस् + विधि, प्र.पु.ए.व.) | स्थापयेत् | रखे | Should place | रखना चाहिए, टिकाना चाहिए |
| पदम् (नपुं.प्र.ए.व.) | स्थानम् | स्थान | Place | ठिकाना, जगह, घर |
| पुराणम् (नपुं.प्र.ए.व.) | पुरातनम् | पुराना | Old | प्राचीन, पहले का |
| पूतम् (√पू + क्त, नपुं.प्र.ए.व.) | शुद्धम् | शुद्ध | Cleansed | छाना हुआ, साफ़ किया हुआ, पवित्र |
| परप्रत्ययनेयबुद्धिः (बहुव्रीहिः, स्त्री.प्र.ए.व.) | परप्रत्ययेन नेया बुद्धिः यस्य सः | दूसरों के द्वारा निर्देशित बुद्धि वाला | One who is influenced by the thinking of others | जो अपनी अक्ल से नहीं, दूसरों के कहे पर चलता है |
| प्रतिहन्यमानाः (प्रति + √हन् + यक् शानच्, पुं.प्र.ब.व.) | बाधिताः | बाधित | Obstructed | बार-बार रोके जाते हुए, टकराते हुए |
| भजन्ते (√भज् + लट्, प्र.पु.ब.व.) | स्वीकुर्वन्ति | स्वीकारते हैं | Accept | अपना लेते हैं, ग्रहण करते हैं |
| मूढः (पुं.प्र.ए.व.) | मूर्खः | मूर्ख | Fool | नासमझ, बुद्धिहीन |
| यत्ने (पुं.स.ए.व.) | श्रमे | यत्न में | By doing effort | प्रयत्न कर लेने पर, मेहनत में |
| वाचम् (स्त्री.द्वि.ए.व.) | वाणीम् | वाणी को | Speech | बोली को, बात को |
| विदधीत (वि + √धा + विधिलिङ्, प्र.पु.ए.व.) | कुर्यात् | करना चाहिए | Should be done | करे, कर डाले (‘चाहिए’ के अर्थ में) |
| विघ्नविहताः (तृतीया-तत्पुरुषः, पुं.प्र.ब.व.) | विघ्नैः विहताः | विघ्नों से हत | Struck by obstacles | रुकावटों की चोट खाए हुए |
| विमृश्यकारिणम् (पुं.द्वि.ए.व.) | यः चिन्तयित्वा कार्यं करोति, तम् | भली-भाँति चिन्तन करके कार्य करने वाले को | One who acts thoughtfully | सोच-समझकर काम करने वाले को |
| विरमन्ति (वि + √रम् + लट्, प्र.पु.ब.व.) | स्थगनं कुर्वन्ति | छोड़ते हैं | Leave | बीच में ही रुक जाते हैं, हाथ खींच लेते हैं |
| वृणते (√वृ + लट्, प्र.ब.व.) | आश्रयन्ते | आश्रय लेते हैं | Take refuge | वरण कर लेती हैं, स्वयं चुन लेती हैं |
| शौचम् (नपुं.प्र.ए.व.) | शुचेः भावः, पावित्र्यम् | पवित्रता | Purity | स्वच्छता — तन, मन तथा स्थान की |
| सन्तः (प्र.ब.व.) | सज्जनाः | सज्जन लोग | Great people | भले लोग, विवेकी लोग |
| सम्पदः (स्त्री.प्र.ब.व.) | ऐश्वर्यम् | सम्पत्ति | Wealth | धन-सम्पदा, समृद्धि |
नमूना उत्तर (अन्य मातृभाषाओं में) — मराठी: पूतम् = ‘शुद्ध / गाळलेले’, दैवम् = ‘नशीब’, मूढः = ‘मूर्ख’, सम्पदः = ‘संपत्ती’। बाङ्ग्ला: वाचम् = ‘कथा/वाणी’, सन्तः = ‘सज्जन लोकेरा’, पदम् = ‘स्थान’। गुजराती: उद्योगिनम् = ‘महेनतु ने’, आपदाम् = ‘आफतो नुं’। तमिऴ: पुराणम् = ‘पऴमै’, नवम् = ‘पुदिय’। अपनी भाषा में लिखते समय ध्यान रखिए कि अर्थ वही रहे जो संस्कृत स्तम्भ में दिया है, और विभक्ति का भाव भी सुरक्षित रहे (जैसे ‘आपदाम्’ = ‘का/की’, ‘उद्योगिनम्’ = ‘को’)।
यह स्तम्भ क्यों रखा गया: संस्कृत का शब्द जब अपनी मातृभाषा के शब्द से जुड़ जाता है, तभी वह याद रहता है। इस तालिका के अनेक पद तो अधिकांश भारतीय भाषाओं में ज्यों के त्यों चलते हैं — ‘शौच’, ‘क्षमा’, ‘दैव’, ‘सम्पदा’, ‘मूढ’, ‘विद्या’, ‘सत्य’। इन्हें पहचान लेने पर शेष कठिन पद (परप्रत्ययनेयबुद्धिः, प्रतिहन्यमानाः, विमृश्यकारिणम्) भी टुकड़े-टुकड़े करके खुल जाते हैं।
तालिका पढ़ते समय दो बातें ध्यान में रखिए: (१) ‘आपदाम्’ के सामने अंग्रेज़ी में Of dangerous छपा है; व्याकरण की दृष्टि से वहाँ Of dangers / Of calamities होना चाहिए — संस्कृत स्तम्भ ‘विपत्तीनाम्’ ही ठीक अर्थ देता है। (२) ‘परप्रत्ययनेयबुद्धिः’ के सामने ‘स्त्री.प्र.ए.व.’ छपा है, क्योंकि समास का अन्तिम पद ‘बुद्धिः’ स्त्रीलिङ्ग है; पर बहुव्रीहि होने से यह पद ‘मूढः’ का विशेषण है और श्लोक में पुंलिङ्ग ही समझा जाएगा — बहुव्रीहि का लिङ्ग विशेष्य से आता है, अन्तिम पद से नहीं। (३) पदों का क्रम अकारादि है, पर ‘परप्रत्ययनेयबुद्धिः’ ‘पूतम्’ के बाद छपा है; वर्णक्रम से वह ‘पदम्’ के ठीक बाद आना चाहिए था।