शारदा अध्याय 6 सुभाषितानि

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
प्रथमस्य श्लोकस्य पदच्छेदम् अन्वयं शब्दार्थं भावं च लिखत — “दृष्टिपूतं न्यसेत् पादं वस्त्रपूतं जलं पिबेत्। सत्यपूतां वदेत् वाचं मनः पूतं समाचरेत्॥ १॥” (मनुस्मृतिः — ६.४६)
उत्तर
दृष्टिपूतं न्यसेत् पादं वस्त्रपूतं जलं पिबेत्।
सत्यपूतां वदेत् वाचं मनः पूतं समाचरेत्॥ १॥
(मनुस्मृतिः — ६.४६)

पदच्छेदः — दृष्टिपूतम् + न्यसेत् + पादम् + वस्त्रपूतम् + जलम् + पिबेत् + सत्यपूताम् + वदेत् + वाचम् + मनःपूतम् + समाचरेत्।

अन्वयः — दृष्टिपूतं पादं न्यसेत्, वस्त्रपूतं जलं पिबेत्, सत्यपूतां वाचं वदेत्, मनःपूतं समाचरेत्। (यही अन्वय पुस्तक ने ‘अत्र इदम् अवधेयम्’ में दिया है।)

पदम्शब्दार्थः
पूतम्शुद्धम् — शुद्ध किया हुआ, छाना हुआ (√पू + क्त)
दृष्टिपूतम्दृष्ट्या पूतम् — आँख से जाँचा हुआ, देखकर शुद्ध किया हुआ
न्यसेत्स्थापयेत् — रखे (नि + √अस्, विधिलिङ्)
पादम्चरणम् — पैर
वस्त्रपूतम्वस्त्रेण पूतम् — कपड़े से छाना हुआ
सत्यपूताम्सत्येन पूताम् — सत्य से शुद्ध की हुई
वाचम्वाणीम् — वाणी को
मनःपूतम्मनसा पूतम् — मन से शुद्ध, जो मन को खरा लगे
समाचरेत्सम्यक् आचरेत् — भली-भाँति आचरण करे (सम् + आ + √चर्, विधिलिङ्)

हिन्दी अर्थ — दृष्टि से शुद्ध किया हुआ, अर्थात् देख-भालकर पैर रखे; वस्त्र से छाना हुआ जल पिए; सत्य से पवित्र वाणी बोले; और मन से पवित्र आचरण करे — अर्थात् वही काम करे जिसे उसका अपना मन शुद्ध ठहराता है।

भावः — चार द्वार, चार छन्नियाँ। मनु ने मनुष्य के चार व्यवहारों को गिनकर हर एक पर एक अलग छन्नी रख दी है : चलना — आँख की छन्नी, पीना — कपड़े की छन्नी, बोलना — सत्य की छन्नी, करना — मन की छन्नी। पहले तीन बाहर के हैं और सरल हैं; चौथा भीतर का है और सबसे कठिन। ध्यान दीजिए, क्रम भी सोचा हुआ है — स्थूल से सूक्ष्म की ओर। जो देखकर पैर रखना सीख गया, वह जाँचकर बोलना भी सीखेगा; और जो सत्य से वाणी छानना सीख गया, वही अन्त में मन से कर्म छान सकेगा। पाठ का शीर्षक इसी अन्तिम चरण से लिया गया है।
व्याकरण तथा जीवन-मूल्य: चारों क्रियाएँ — न्यसेत्, पिबेत्, वदेत्, समाचरेत् — विधिलिङ् लकार, प्रथमपुरुष, एकवचन में हैं; विधिलिङ् का अर्थ है ‘चाहिए’, इसलिए यह उपदेश है, वर्णन नहीं। चारों समस्तपद (दृष्टिपूतम्, वस्त्रपूतम्, सत्यपूताम्, मनःपूतम्) तृतीया-तत्पुरुष हैं — ‘दृष्ट्या पूतम्’ इत्यादि। ‘सत्यपूताम्’ तथा ‘वाचम्’ स्त्रीलिङ्ग द्वितीया एकवचन हैं, क्योंकि ‘वाच्’ स्त्रीलिङ्ग शब्द है — इसीलिए विशेषण भी स्त्रीलिङ्ग रूप लेता है। जीवनमूल्यम् — अहिंसा (देखकर चलने से नीचे के छोटे जीव नहीं कुचलते), स्वास्थ्य, सत्यवचन तथा विवेक।
प्र2.
द्वितीयस्य श्लोकस्य पदच्छेदम् अन्वयं शब्दार्थं भावं च लिखत — “धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः। धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्॥ २॥” (मनुस्मृतिः — ६.९२)
उत्तर
धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्॥ २॥
(मनुस्मृतिः — ६.९२)

पदच्छेदः — धृतिः + क्षमा + दमः + अस्तेयम् + शौचम् + इन्द्रियनिग्रहः + धीः + विद्या + सत्यम् + अक्रोधः + दशकम् + धर्मलक्षणम्।

अन्वयः — धृतिः क्षमा दमः अस्तेयं शौचम् इन्द्रियनिग्रहः धीः विद्या सत्यम् अक्रोधः (च इति) दशकं धर्मलक्षणं (भवति)।

क्रमःधर्मलक्षणम्अर्थःव्यवहारे कथम्
धृतिःधैर्यम्, स्थिरताकठिनाई में भी मन न डोले
क्षमासहनशीलता, अपराध को माफ़ करनाकिसी की ग़लती पर बदला न लेना
दमःइन्द्रियाणां मनसः च नियन्त्रणम्मन को विषयों की ओर दौड़ने से रोकना
अस्तेयम्न स्तेयम् — चोरी न करनादूसरे की वस्तु बिना पूछे न लेना, नक़ल न करना
शौचम्शुचेः भावः, पावित्र्यम्शरीर, वस्त्र, स्थान तथा मन — चारों की स्वच्छता
इन्द्रियनिग्रहःइन्द्रियाणां निग्रहःआँख, कान, जीभ को अनुचित की ओर न जाने देना
धीःबुद्धिःसही-ग़लत पहचानने की समझ
विद्याज्ञानम्, शास्त्रज्ञानम्पढ़ाई तथा अनुभव से अर्जित ज्ञान
सत्यम्यथार्थवचनम्जो देखा-जाना, वही कहना
१०अक्रोधःक्रोधस्य अभावःक्रोध आने पर भी उसे वचन-कर्म में न आने देना

हिन्दी अर्थ — धैर्य, क्षमा, संयम, चोरी न करना, पवित्रता, इन्द्रियों का निग्रह, बुद्धि, विद्या, सत्य तथा अक्रोध — ये दस धर्म के लक्षण हैं।

भावः — धर्म कोई कर्मकाण्ड नहीं, दस गुणों का समुच्चय है। मनु यहाँ ‘धर्म’ की परिभाषा पूजा-पाठ से नहीं, चरित्र से देते हैं। सूची को ध्यान से देखिए — इसमें तीन प्रकार के गुण हैं : मन के (धृति, क्षमा, अक्रोध), संयम के (दम, अस्तेय, शौच, इन्द्रियनिग्रह) और ज्ञान के (धी, विद्या, सत्य)। अर्थात् धर्मी वही है जो मन से स्थिर हो, इन्द्रियों से संयत हो और बुद्धि से जागरूक हो। पहले श्लोक ने कहा था ‘मन से पवित्र आचरण करो’; यह दूसरा श्लोक बताता है कि वह पवित्र आचरण दिखता कैसा है — इन्हीं दस लक्षणों में।
सन्धिविच्छेदः (पूरी पंक्ति): दमोऽस्तेयम् = दमः + अस्तेयम् (विसर्गसन्धि — अः + अ → ओ, तथा अगला ‘अ’ लुप्त होकर अवग्रह ‘ऽ’ बनता है)। शौचमिन्द्रियनिग्रहः = शौचम् + इन्द्रियनिग्रहः। धीर्विद्या = धीः + विद्या (विसर्गसन्धि — ईः + व → ईर्)। सत्यमक्रोधो दशकम् = सत्यम् + अक्रोधः + दशकम् (अक्रोधः + द → अक्रोधो द)। अस्तेयम् तथा अक्रोधः दोनों नञ्-तत्पुरुष समास हैं — न स्तेयम्, न क्रोधः।
प्र3.
तृतीयस्य श्लोकस्य पदच्छेदम् अन्वयं शब्दार्थं भावं च लिखत — “यद्यदाचरति श्रेष्ठः तत्तदेवेतरो जनः। स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥ ३॥” (श्रीमद्भगवद्गीता — ३.२१)
उत्तर
यद्यदाचरति श्रेष्ठः तत्तदेवेतरो जनः।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥ ३॥
(श्रीमद्भगवद्गीता — ३.२१)

पदच्छेदः — यत् + यत् + आचरति + श्रेष्ठः + तत् + तत् + एव + इतरः + जनः + सः + यत् + प्रमाणम् + कुरुते + लोकः + तत् + अनुवर्तते।

अन्वयः — श्रेष्ठः यत् यत् आचरति इतरः जनः तत् तत् एव (आचरति)। सः यत् प्रमाणं कुरुते, लोकः तत् अनुवर्तते।

पदम्शब्दार्थः
श्रेष्ठःउत्तमः जनः, अग्रणीः — श्रेष्ठ पुरुष, अगुआ
आचरतिआचरणं करोति — आचरण करता है
इतरः जनःअन्यः जनः, सामान्यजनः — दूसरा (सामान्य) व्यक्ति
प्रमाणम्मानदण्डः, आदर्शः — कसौटी, मानक
कुरुतेकरोति (आत्मनेपदे) — बनाता है, ठहराता है
लोकःजनसमूहः — समाज, लोग
अनुवर्ततेअनुसरति — पीछे-पीछे चलता है (अनु + √वृत्)

हिन्दी अर्थ — श्रेष्ठ पुरुष जो-जो आचरण करता है, दूसरा (सामान्य) व्यक्ति भी वही-वही करता है। वह जिसे प्रमाण — अर्थात् मानक — बना देता है, सारा समाज उसी का अनुसरण करता है।

भावः — बड़े का आचरण ही समाज का पाठ्यक्रम है। यह गीता का प्रसिद्ध श्लोक है, जिसमें श्रीकृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि श्रेष्ठ व्यक्ति का हर काम केवल उसका अपना काम नहीं रहता — वह दूसरों के लिए नियम बन जाता है। ‘यत् यत्’ और ‘तत् तत्’ की जोड़ी यही जताती है कि छूट किसी भी बात में नहीं है : जो-जो वह करेगा, वही-वही लोग दोहराएँगे — अच्छा भी, बुरा भी। इसीलिए बड़े होने का अर्थ है अधिक स्वतन्त्रता नहीं, अधिक उत्तरदायित्व। अध्यापक, माता-पिता, बड़े भाई-बहन, कक्षा के मॉनीटर — सब पर यह श्लोक उतना ही लागू है जितना किसी राजा पर।
सन्धिविच्छेदः तथा व्याकरण: यद्यदाचरति = यत् + यत् + आचरति (जश्त्व — त् + य → द्य)। तत्तदेवेतरो जनः = तत् + तत् + एव + इतरः + जनः (एव + इतरः → एवेतरः, गुण सन्धि से नहीं — यहाँ ‘अ + इ = ए’ गुणसन्धि है; इतरः + जनः → इतरो जनः, विसर्गसन्धि)। यत्प्रमाणम् = यत् + प्रमाणम्। लोकस्तदनुवर्तते = लोकः + तत् + अनुवर्तते (विसर्गसन्धि — अः + त् → अस्त्)। ‘कुरुते’ तथा ‘अनुवर्तते’ दोनों आत्मनेपद के रूप हैं, लट् लकार, प्रथमपुरुष, एकवचन।
प्र4.
चतुर्थस्य श्लोकस्य पदच्छेदम् अन्वयं शब्दार्थं भावं च लिखत — “अभ्यासेन क्रियाः सर्वाः अभ्यासात् सकलाः कलाः। अभ्यासाद् ध्यानमौनादि किमभ्यासस्य दुष्करम्॥ ४॥” (सुभाषितरत्नभाण्डागारः)
उत्तर
अभ्यासेन क्रियाः सर्वाः अभ्यासात् सकलाः कलाः।
अभ्यासाद् ध्यानमौनादि किमभ्यासस्य दुष्करम्॥ ४॥
(सुभाषितरत्नभाण्डागारः)

पदच्छेदः — अभ्यासेन + क्रियाः + सर्वाः + अभ्यासात् + सकलाः + कलाः + अभ्यासात् + ध्यानमौनादि + किम् + अभ्यासस्य + दुष्करम्।

अन्वयः — सर्वाः क्रियाः अभ्यासेन (सिध्यन्ति)। सकलाः कलाः अभ्यासात् (सिध्यन्ति)। ध्यानमौनादि (अपि) अभ्यासात् (सिध्यति)। अभ्यासस्य दुष्करं किम् (अस्ति) ?

पदम्शब्दार्थः
अभ्यासेन / अभ्यासात्पुनःपुनःकरणेन / पुनःपुनःकरणात् — बार-बार करने से (तृतीया = साधन, पञ्चमी = हेतु)
क्रियाःकर्माणि — काम, कार्य
सकलाः कलाःसर्वाः कलाः — सारी कलाएँ (संगीत, चित्र, नृत्य आदि)
ध्यानमौनादिध्यानं मौनम् आदि येषां तानि — ध्यान, मौन आदि साधनाएँ
दुष्करम्कर्तुम् अशक्यम्, कठिनम् — कठिन, न होने योग्य

हिन्दी अर्थ — सारे काम अभ्यास से सिद्ध होते हैं, सारी कलाएँ अभ्यास से सिद्ध होती हैं, ध्यान-मौन आदि (कठिन साधनाएँ) भी अभ्यास से ही सिद्ध होती हैं — फिर भला अभ्यास के लिए कठिन क्या है ?

भावः — अन्तिम पंक्ति ही श्लोक की चोट है। पहली तीन पंक्तियाँ तीन उदाहरण देती हैं और चौथी पंक्ति उन्हें एक प्रश्न में बदल देती है — ‘किमभ्यासस्य दुष्करम्’ (अभ्यास के लिए असम्भव क्या है?)। यह प्रश्न उत्तर माँगने के लिए नहीं, उत्तर देने के लिए है; ऐसे प्रश्न को काव्य में ‘काकु’ या भाषा में ‘अलंकारिक प्रश्न’ कहते हैं, और उसका अर्थ है — कुछ भी कठिन नहीं। ध्यान दीजिए, उदाहरणों का क्रम भी चढ़ता हुआ है : पहले साधारण क्रिया, फिर कठिन कला, फिर सबसे कठिन ध्यान और मौन — जो पूरी तरह भीतर की साधना है। जब वह भी अभ्यास से सधती है, तो शेष किस गिनती में?
व्याकरण तथा उपयोग: ‘अभ्यासेन’ में करणे तृतीया (साधन के अर्थ में) और ‘अभ्यासात्’ में हेतौ / अपादाने पञ्चमी है — कवि ने एक ही बात दो विभक्तियों में कहकर पंक्ति में विविधता ला दी है। इसीलिए अभ्यास का प्रश्न ३ (ख) पूछता है ‘सकलाः कलाः कस्मात् सिध्यन्ति?’ — पञ्चमी का प्रश्न ‘कस्मात्’ ही होगा, ‘केन’ नहीं। सन्धि: अभ्यासाद् ध्यानम् = अभ्यासात् + ध्यानम् (जश्त्व — त् + ध → द्); किमभ्यासस्य = किम् + अभ्यासस्य।
प्र5.
पञ्चमस्य श्लोकस्य पदच्छेदम् अन्वयं शब्दार्थं भावं च लिखत — “प्रारभ्यते न खलु विघ्नभयेन नीचैः प्रारभ्य विघ्नविहता विरमन्ति मध्याः। विघ्नैः पुनः पुनरपि प्रतिहन्यमानाः प्रारभ्य चोत्तमजनाः न परित्यजन्ति॥ ५॥” (नीतिशतकम् — २७)
उत्तर
प्रारभ्यते न खलु विघ्नभयेन नीचैः प्रारभ्य विघ्नविहता विरमन्ति मध्याः।
विघ्नैः पुनः पुनरपि प्रतिहन्यमानाः प्रारभ्य चोत्तमजनाः न परित्यजन्ति॥ ५॥
(नीतिशतकम् — २७)

पदच्छेदः — प्रारभ्यते + न + खलु + विघ्नभयेन + नीचैः + प्रारभ्य + विघ्नविहताः + विरमन्ति + मध्याः + विघ्नैः + पुनः + पुनः + अपि + प्रतिहन्यमानाः + प्रारभ्य + च + उत्तमजनाः + न + परित्यजन्ति।

अन्वयः — नीचैः विघ्नभयेन (कार्यं) न प्रारभ्यते खलु। मध्याः (कार्यं) प्रारभ्य विघ्नविहताः (कार्यात्) विरमन्ति। उत्तमजनाः (कार्यं) प्रारभ्य विघ्नैः पुनः पुनः अपि प्रतिहन्यमानाः (कार्यं) न परित्यजन्ति।

पदम्शब्दार्थः
प्रारभ्यतेआरम्भः क्रियते — आरम्भ किया जाता है (कर्मवाच्य)
विघ्नभयेनविघ्नानां भयेन — रुकावट के डर से
नीचैःअधमजनैः — अधम (निकृष्ट) लोगों द्वारा
मध्याःमध्यमजनाः — बीच के दर्जे के लोग
विघ्नविहताःविघ्नैः विहताः — विघ्नों से आहत, चोट खाए हुए
विरमन्तिस्थगनं कुर्वन्ति — रुक जाते हैं, छोड़ देते हैं
प्रतिहन्यमानाःबाधिताः — बार-बार रोके जाते हुए (प्रति + √हन् + यक् शानच्)
उत्तमजनाःश्रेष्ठाः जनाः — उत्तम कोटि के लोग
न परित्यजन्तिन त्यजन्ति — नहीं छोड़ते

हिन्दी अर्थ — अधम लोग विघ्न के डर से काम आरम्भ ही नहीं करते। मध्यम श्रेणी के लोग काम आरम्भ तो कर देते हैं, पर विघ्नों की चोट खाकर बीच में ही छोड़ देते हैं। उत्तम लोग काम आरम्भ करके विघ्नों से बार-बार रोके जाने पर भी उसे नहीं छोड़ते।

भावः — विघ्न सबके आते हैं; अन्तर उनके सामने के व्यवहार का है। भर्तृहरि ने मनुष्यों को तीन श्रेणियों में बाँटा है और कसौटी एक ही रखी है — विघ्न। अधम विघ्न की कल्पना से ही हार जाता है (आरम्भ ही नहीं करता); मध्यम विघ्न के पहले प्रहार से हार जाता है; उत्तम बार-बार प्रहार खाकर भी नहीं हारता। ध्यान दीजिए, कवि यह नहीं कहता कि उत्तम को विघ्न नहीं आते — उसे तो ‘पुनः पुनरपि’ आते हैं, सबसे अधिक आते हैं। श्रेष्ठता विघ्न के अभाव में नहीं, विघ्न के बावजूद टिके रहने में है।
व्याकरण तथा छन्द: यह श्लोक वसन्ततिलका छन्द में है (प्रत्येक चरण में १४ वर्ण) — इसीलिए पंक्तियाँ लम्बी हैं और तीनों प्रकार के लोग एक ही साँस में गिनाए जा सके। ‘प्रारभ्यते’ कर्मवाच्य है, इसलिए उसका कर्ता ‘नीचैः’ तृतीया में है (कर्मवाच्ये कर्तरि तृतीया)। यही कारण है कि अभ्यास का प्रश्न ३ (क) ‘नीचैः’ पर प्रश्न बनवाता है और उत्तर ‘कैः’ बनेगा। ‘प्रतिहन्यमानाः’ कर्मवाच्य का वर्तमान कृदन्त है — प्रति + √हन् + यक् (कर्मवाच्य का चिह्न) + शानच्; अर्थ ‘रोके जाते हुए’। ‘विघ्नविहताः’ तृतीया-तत्पुरुष समास है — विघ्नैः विहताः।
प्र6.
षष्ठस्य श्लोकस्य पदच्छेदम् अन्वयं शब्दार्थं भावं च लिखत — “उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः दैवेन देयमिति कापुरुषा वदन्ति। दैवं निहत्य कुरु पौरुषमात्मशक्त्या यत्ने कृते यदि न सिध्यति कोऽत्र दोषः॥ ६॥” (पञ्चतन्त्रम् — मित्रभेदः — १४९)
उत्तर
उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः दैवेन देयमिति कापुरुषा वदन्ति।
दैवं निहत्य कुरु पौरुषमात्मशक्त्या यत्ने कृते यदि न सिध्यति कोऽत्र दोषः॥ ६॥
(पञ्चतन्त्रम् — मित्रभेदः — १४९)

पदच्छेदः — उद्योगिनम् + पुरुषसिंहम् + उपैति + लक्ष्मीः + दैवेन + देयम् + इति + कापुरुषाः + वदन्ति + दैवम् + निहत्य + कुरु + पौरुषम् + आत्मशक्त्या + यत्ने + कृते + यदि + न + सिध्यति + कः + अत्र + दोषः।

अन्वयः — लक्ष्मीः उद्योगिनं पुरुषसिंहम् उपैति, दैवेन देयम् इति (तु) कापुरुषाः वदन्ति, दैवं निहत्य पौरुषं कुरु, यत्ने कृते यदि (कार्यं) न सिध्यति, (तर्हि) अत्र कः दोषः (स्यात्) ?

पदम्शब्दार्थः
उद्योगिनम्उद्योगः अस्य अस्ति इति, तम् — प्रयत्नशील पुरुष को
पुरुषसिंहम्पुरुषः सिंहः इव, तम् — सिंह जैसे पराक्रमी पुरुष को
उपैतिसमीपम् आगच्छति (उप + √इ) — पास आती है
दैवम् / दैवेनविधिः, भाग्यम्, देवस्य इदम् — भाग्य / भाग्य से
देयम्दातव्यम् — दिया जाना चाहिए
कापुरुषाःकुत्सिताः पुरुषाः — कायर, अधम पुरुष
निहत्यअतिक्रम्य — पीछे धकेलकर, हराकर (नि + √हन् + ल्यप्)
पौरुषम्पुरुषस्य कर्म, पराक्रमः — पुरुषार्थ
आत्मशक्त्यास्वसामर्थ्येन — अपनी शक्ति से
यत्ने कृतेप्रयत्ने सम्पादिते सति — प्रयत्न कर लेने पर (सति सप्तमी)

हिन्दी अर्थ — लक्ष्मी उद्यमी, सिंह जैसे पराक्रमी पुरुष के पास स्वयं आती है; ‘भाग्य से मिलना चाहिए’ — ऐसा तो कायर लोग कहते हैं। इसलिए भाग्य को पीछे धकेलकर अपनी शक्ति से पुरुषार्थ करो; और यदि पूरा प्रयत्न कर लेने पर भी काम सिद्ध न हो, तो इसमें दोष ही क्या है ?

भावः — भाग्य का इन्तज़ार करना कायरता है। यह श्लोक पञ्चतन्त्र के ‘मित्रभेद’ तन्त्र से है और उसकी शैली भी वैसी ही सीधी है। दो पक्ष आमने-सामने रखे गए हैं — उद्योगी और कापुरुष। कापुरुष कहता है ‘दैवेन देयम्’ — जो मिलना है, भाग्य देगा; उद्योगी ‘दैवं निहत्य’ — भाग्य को हराकर आगे बढ़ता है। सबसे सुन्दर बात अन्तिम पंक्ति है : कवि सफलता की गारण्टी नहीं देता, वह कहता है कि पूरा प्रयत्न कर लेने के बाद असफलता में कोई दोष नहीं। अर्थात् मनुष्य का उत्तरदायित्व प्रयत्न तक है, फल तक नहीं — यही बात गीता भी ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते’ में कहती है।
व्याकरण, समास तथा छन्द: छन्द वसन्ततिलका। ‘पुरुषसिंहम्’ उपमानोत्तरपद कर्मधारय समास है — पुरुषः सिंहः इव (सिंह जैसा पुरुष); इसीलिए अभ्यास का प्रश्न ९ (ग) इसी का विग्रह देकर समस्तपद पूछता है। ‘कापुरुषाः’ में ‘कु/का’ उपसर्ग निन्दा के अर्थ में है — कुत्सिताः पुरुषाः (कर्मधारय)। ‘यत्ने कृते’ सति सप्तमी (भावे सप्तमी) है — ‘प्रयत्न कर लिए जाने पर’। ‘कोऽत्र’ = कः + अत्र (विसर्गसन्धि, अः + अ → ओऽ)। ‘उपैति’ = उप + एति (वृद्धि सन्धि — अ + ए → ऐ)।
प्र7.
सप्तमस्य श्लोकस्य पदच्छेदम् अन्वयं शब्दार्थं भावं च लिखत — “पुराणमित्येव न साधु सर्वं न चापि काव्यं नवमित्यवद्यम्। सन्तः परीक्ष्यान्यतरद्भजन्ते मूढः परप्रत्ययनेयबुद्धिः॥ ७॥” (मालविकाग्निमित्रम् — १.२)
उत्तर
पुराणमित्येव न साधु सर्वं न चापि काव्यं नवमित्यवद्यम्।
सन्तः परीक्ष्यान्यतरद्भजन्ते मूढः परप्रत्ययनेयबुद्धिः॥ ७॥
(मालविकाग्निमित्रम् — १.२)

पदच्छेदः — पुराणम् + इति + एव + न + साधु + सर्वम् + न + च + अपि + काव्यम् + नवम् + इति + अवद्यम् + सन्तः + परीक्ष्य + अन्यतरत् + भजन्ते + मूढः + परप्रत्ययनेयबुद्धिः।

अन्वयः — पुराणम् इति सर्वं साधु न (वर्तते), काव्यं नवम् इति अवद्यं न (वर्तते), सन्तः परीक्ष्य अन्यतरत् भजन्ते, मूढः परप्रत्ययनेयबुद्धिः (भवति)।

पदम्शब्दार्थः
पुराणम्पुरातनम् — पुराना
साधुउत्तमम्, समीचीनम् — अच्छा, ठीक
नवम्नूतनम् — नया
अवद्यम्न वद्यम् — निन्दनीय, निम्नस्तरीय
सन्तःसज्जनाः — सज्जन, विवेकी लोग
परीक्ष्यपरीक्षां कृत्वा — जाँच-परखकर
अन्यतरत्द्वयोः एकम् — दोनों में से जो (ठीक हो) वह
भजन्तेस्वीकुर्वन्ति — स्वीकार करते हैं, अपनाते हैं
मूढःमूर्खः — मूर्ख
परप्रत्ययनेयबुद्धिःपरप्रत्ययेन नेया बुद्धिः यस्य सः — जिसकी बुद्धि दूसरों के भरोसे चलाई जाती है

हिन्दी अर्थ — कोई रचना केवल इसलिए अच्छी नहीं हो जाती कि वह पुरानी है, और न कोई काव्य केवल इसलिए निन्दनीय है कि वह नया है। सज्जन लोग परीक्षा करके दोनों में से (जो उत्तम हो) उसी को अपनाते हैं; मूर्ख वही है जिसकी बुद्धि दूसरों की राय के सहारे चलती है।

भावः — कसौटी न पुरानापन है, न नयापन; कसौटी परीक्षा है। यह श्लोक कालिदास के नाटक मालविकाग्निमित्रम् की प्रस्तावना का है, जहाँ सूत्रधार से पूछा जाता है कि भास जैसे पुराने कवियों को छोड़कर कालिदास जैसे नए कवि का नाटक क्यों खेला जा रहा है। उत्तर यही श्लोक है। दो झूठी कसौटियाँ यहाँ एक साथ तोड़ी गई हैं — ‘पुराना है इसलिए ठीक’ और ‘नया है इसलिए ग़लत’। सज्जन इनमें से किसी पर नहीं चलते; वे परीक्ष्य — जाँचकर — चुनते हैं। और जो स्वयं नहीं जाँचता, दूसरों के कहे पर चलता है, कवि उसे मूर्ख कहता है — क्योंकि उसकी बुद्धि उसकी अपनी है ही नहीं। आज के समय में, जब कोई भी बात क्षण भर में सबके पास पहुँच जाती है, यह श्लोक और भी काम का है।
व्याकरण, समास तथा छन्द: छन्द उपजातिसन्धि: पुराणमित्येव = पुराणम् + इति + एव (यण् सन्धि — इ + ए → य्ए); नवमित्यवद्यम् = नवम् + इति + अवद्यम्; परीक्ष्यान्यतरद्भजन्ते = परीक्ष्य + अन्यतरत् + भजन्ते (दीर्घ सन्धि तथा जश्त्व)। समास: ‘अवद्यम्’ नञ्-तत्पुरुष है (न वद्यम्; व्युत्पत्ति न + वद् + यत्); ‘परप्रत्ययनेयबुद्धिः’ बहुव्रीहि है — ‘परप्रत्ययेन नेया बुद्धिः यस्य सः’, अर्थात् वह पद स्वयं बुद्धि का नहीं, बुद्धि वाले व्यक्ति का बोध कराता है, इसीलिए वह ‘मूढः’ का विशेषण बनकर आया है। ‘परीक्ष्य’ = परि + √ईक्ष् + ल्यप् — ‘जाँचकर’।
प्र8.
अष्टमस्य श्लोकस्य पदच्छेदम् अन्वयं शब्दार्थं भावं च लिखत — “सहसा विदधीत न क्रियामविवेकः परमापदां पदम्। वृणते हि विमृश्यकारिणं गुणलुब्धाः स्वयमेव सम्पदः॥ ८॥” (किरातार्जुनीयम् — २.३०)
उत्तर
सहसा विदधीत न क्रियामविवेकः परमापदां पदम्।
वृणते हि विमृश्यकारिणं गुणलुब्धाः स्वयमेव सम्पदः॥ ८॥
(किरातार्जुनीयम् — २.३०)

पदच्छेदः — सहसा + विदधीत + न + क्रियाम् + अविवेकः + परम् + आपदाम् + पदम् + वृणते + हि + विमृश्यकारिणम् + गुणलुब्धाः + स्वयम् + एव + सम्पदः।

अन्वयः — क्रियां सहसा न विदधीत, अविवेकः परम् आपदां पदम् (भवति), हि गुणलुब्धाः सम्पदः स्वयमेव विमृश्यकारिणं वृणते।

पदम्शब्दार्थः
सहसाअकस्मात्, अविचार्य — अचानक, बिना सोचे
विदधीतकुर्यात् — करना चाहिए (वि + √धा, विधिलिङ्)
क्रियाम्कर्म, कार्यम् — काम को
अविवेकःन विवेकः — बिना सोचे-समझे काम करना
परम्श्रेष्ठम्, अत्यन्तम् — सबसे बड़ा
आपदाम्विपत्तीनाम् — विपत्तियों का
पदम्स्थानम् — घर, ठिकाना
वृणतेआश्रयन्ते, वरणं कुर्वन्ति — वरण करती हैं, आश्रय लेती हैं
विमृश्यकारिणम्यः चिन्तयित्वा कार्यं करोति, तम् — सोच-विचारकर काम करने वाले को
गुणलुब्धाःगुणेषु लुब्धाः, गुणानाम् अभिलाषिण्यः — गुणों की चाह रखने वाली
सम्पदःऐश्वर्यम्, सम्पत्तयः — सम्पत्तियाँ

हिन्दी अर्थ — कोई भी काम जल्दबाज़ी में नहीं करना चाहिए, क्योंकि अविवेक (बिना सोचे काम करना) विपत्तियों का सबसे बड़ा घर है। गुणों की चाह रखने वाली सम्पत्तियाँ तो सोच-विचारकर काम करने वाले पुरुष का स्वयं ही वरण कर लेती हैं।

भावः — जल्दबाज़ी विपत्ति को बुलावा है, विचार सम्पत्ति को। श्लोक की रचना बहुत कसी हुई है : पहला आधा निषेध है (क्या न करें — सहसा काम) और उसका कारण देता है (अविवेक विपत्तियों का ठिकाना); दूसरा आधा विधि है (क्या करें — विमृश्य काम) और उसका फल देता है (सम्पत्ति स्वयं आती है)। सबसे सुन्दर कल्पना ‘गुणलुब्धाः सम्पदः वृणते’ है — यहाँ सम्पत्तियों को स्त्रियों के रूप में कल्पित किया गया है जो गुण की लोभी हैं और स्वयंवर में विचारशील पुरुष को वर लेती हैं। इस मानवीकरण से बात याद रह जाती है : धन को खींचना नहीं पड़ता, गुण हो तो वह स्वयं आता है। यही बात छठे श्लोक में ‘उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः’ में भी थी — वहाँ उद्योग खींचता है, यहाँ विवेक।
व्याकरण, समास तथा छन्द: छन्द वियोगिनी (सुन्दरी) — विषम वृत्त, जिसमें पहले-तीसरे चरण छोटे और दूसरे-चौथे बड़े होते हैं। सन्धि: क्रियामविवेकः = क्रियाम् + अविवेकः; परमापदाम् = परम् + आपदाम् (दीर्घ सन्धि); स्वयमेव = स्वयम् + एव। समास: ‘अविवेकः’ नञ्-तत्पुरुष; ‘गुणलुब्धाः’ सप्तमी-तत्पुरुष (गुणेषु लुब्धाः); ‘विमृश्यकारिणम्’ उपपद-तत्पुरुष (विमृश्य करोति इति विमृश्यकारी, तम्)। ‘विदधीत’ आत्मनेपद विधिलिङ् प्र.पु.ए.व. है — इसीलिए अभ्यास के प्रश्न ३ (च) में उसी वाक्य पर प्रश्न बनाना है। ‘हि’ अव्यय यहाँ ‘क्योंकि / निश्चय ही’ के अर्थ में है।
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