सत्यपूतां वदेत् वाचं मनः पूतं समाचरेत्॥ १॥
(मनुस्मृतिः — ६.४६)
पदच्छेदः — दृष्टिपूतम् + न्यसेत् + पादम् + वस्त्रपूतम् + जलम् + पिबेत् + सत्यपूताम् + वदेत् + वाचम् + मनःपूतम् + समाचरेत्।
अन्वयः — दृष्टिपूतं पादं न्यसेत्, वस्त्रपूतं जलं पिबेत्, सत्यपूतां वाचं वदेत्, मनःपूतं समाचरेत्। (यही अन्वय पुस्तक ने ‘अत्र इदम् अवधेयम्’ में दिया है।)
| पदम् | शब्दार्थः |
|---|---|
| पूतम् | शुद्धम् — शुद्ध किया हुआ, छाना हुआ (√पू + क्त) |
| दृष्टिपूतम् | दृष्ट्या पूतम् — आँख से जाँचा हुआ, देखकर शुद्ध किया हुआ |
| न्यसेत् | स्थापयेत् — रखे (नि + √अस्, विधिलिङ्) |
| पादम् | चरणम् — पैर |
| वस्त्रपूतम् | वस्त्रेण पूतम् — कपड़े से छाना हुआ |
| सत्यपूताम् | सत्येन पूताम् — सत्य से शुद्ध की हुई |
| वाचम् | वाणीम् — वाणी को |
| मनःपूतम् | मनसा पूतम् — मन से शुद्ध, जो मन को खरा लगे |
| समाचरेत् | सम्यक् आचरेत् — भली-भाँति आचरण करे (सम् + आ + √चर्, विधिलिङ्) |
हिन्दी अर्थ — दृष्टि से शुद्ध किया हुआ, अर्थात् देख-भालकर पैर रखे; वस्त्र से छाना हुआ जल पिए; सत्य से पवित्र वाणी बोले; और मन से पवित्र आचरण करे — अर्थात् वही काम करे जिसे उसका अपना मन शुद्ध ठहराता है।