शारदा अध्याय 6 अभ्यासाद् जायते सिद्धिः

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
नीचैः विघ्नभयेन कार्यं न प्रारभ्यते।
उत्तर

उत्तरम् — कैः विघ्नभयेन कार्यं न प्रारभ्यते ?

(हिन्दी — विघ्न के डर से किनके द्वारा काम आरम्भ नहीं किया जाता ?)

नियम — प्रश्ननिर्माण में रेखाङ्कित पद का लिङ्ग · विभक्ति · वचन जाँचिए, और उसी लिङ्ग-विभक्ति-वचन का प्रश्नवाचक ‘किम्’ रूप रखिए।
नीचैः = ‘नीच’ (पुंलिङ्ग), तृतीया · बहुवचन
‘किम्’ का पुंलिङ्ग तृतीया बहुवचन = कैः
यहाँ तृतीया क्यों है: वाक्य कर्मवाच्य का है — ‘प्रारभ्यते’ (आरम्भ किया जाता है)। नियम है «कर्मवाच्ये कर्तरि तृतीया» — कर्मवाच्य में कर्ता तृतीया में आता है। इसीलिए पुस्तक की शब्दार्थ-तालिका भी ‘नीचैः’ के आगे ‘(कर्मवाच्ये, तृ.ब.व.)’ लिखती है। कर्ता तृतीया में है, इसलिए प्रश्न भी तृतीया में ही बनेगा — ‘के’ नहीं, ‘कैः’।
सावधान: ‘विघ्नभयेन’ भी तृतीया में है, पर वह कारण बताता है, कर्ता नहीं — और वह रेखाङ्कित भी नहीं है। प्रश्न केवल रेखाङ्कित पद पर बनाना है, शेष वाक्य ज्यों का त्यों रखना है।
प्र2.
सकलाः कलाः अभ्यासात् सिध्यन्ति।
उत्तर

उत्तरम् — सकलाः कलाः कस्मात् सिध्यन्ति ?

(हिन्दी — सारी कलाएँ किससे सिद्ध होती हैं ?)

अभ्यासात् = ‘अभ्यास’ (पुंलिङ्ग), पञ्चमी · एकवचन
‘किम्’ का पञ्चमी एकवचन = कस्मात्
(तुलना — तृतीया एकवचन ‘केन’, षष्ठी एकवचन ‘कस्य’, सप्तमी एकवचन ‘कस्मिन्’)
पञ्चमी क्यों, तृतीया क्यों नहीं: श्लोक की पंक्ति है ‘अभ्यासेन क्रियाः सर्वाः अभ्यासात् सकलाः कलाः’ — पहले आधे में तृतीया (करण) है और दूसरे में पञ्चमी (हेतु/अपादान)। यहाँ रेखाङ्कित पद ‘अभ्यासात्’ है, इसलिए प्रश्न ‘कस्मात्’ बनेगा। यदि ‘अभ्यासेन’ रेखाङ्कित होता तो प्रश्न ‘केन’ बनता। रूप देखिए, अर्थ अनुमान से मत लगाइए
जोड़कर देखिए: यही प्रश्न अभ्यास के प्रश्न १ (च) में तैयार रूप में पूछा गया है — ‘सकलाः कलाः कस्मात् सिध्यन्ति ?’ अर्थात् पुस्तक ने एक ही वाक्य से दो अभ्यास कराए हैं : एक में प्रश्न से उत्तर बनाना है, दूसरे में उत्तर से प्रश्न।
प्र3.
वस्त्रपूतं जलं पिबेत्।
उत्तर

उत्तरम् — कीदृशं जलं पिबेत् ?

(हिन्दी — कैसा जल पीना चाहिए ?)

नियम — रेखाङ्कित पद यदि विशेषण हो (गुण/स्वरूप बताता हो), तो प्रश्न ‘किम्’ से नहीं, ‘कीदृश’ से बनता है।
वस्त्रपूतम् = ‘जलम्’ का विशेषण, नपुंसकलिङ्ग · द्वितीया · एकवचन
अतः प्रश्नवाचक भी वही रूप — कीदृशम्
‘किं जलं पिबेत्’ क्यों नहीं: ‘किम्’ वस्तु पूछता है, ‘कीदृश’ गुण पूछता है। यहाँ पीने की वस्तु (जल) पहले से वाक्य में है और रेखाङ्कित वही पद है जो उस जल का प्रकार बताता है। इसीलिए ‘कीदृशम्’ ही ठीक है। यह भेद पुस्तक ने प्रश्न ४ में और भी स्पष्ट कराया है, जहाँ ‘किं पिबेत् ?’ (उत्तर — जलम्) और ‘कीदृशं जलं पिबेत् ?’ (उत्तर — वस्त्रपूतम्) दोनों अलग-अलग पूछे गए हैं।
व्याकरण: ‘वस्त्रपूतम्’ = वस्त्रेण पूतम् — तृतीया-तत्पुरुष समास। विशेषण अपने विशेष्य के लिङ्ग-विभक्ति-वचन को अपनाता है : जलम् नपुंसकलिङ्ग द्वितीया एकवचन है, इसलिए ‘वस्त्रपूतम्’ भी वही; और प्रश्नवाचक ‘कीदृशम्’ भी वही।
प्र4.
लक्ष्मीः पुरुषसिंहम् उपैति।
उत्तर

उत्तरम् — लक्ष्मीः कम् उपैति ?

(हिन्दी — लक्ष्मी किसके पास जाती है ?)

पुरुषसिंहम् = पुंलिङ्ग · द्वितीया · एकवचन (‘उपैति’ का कर्म)
‘किम्’ का पुंलिङ्ग द्वितीया एकवचन = कम्
(नपुंसकलिङ्ग होता तो ‘किम्’, स्त्रीलिङ्ग होता तो ‘काम्’)
लिङ्ग का ध्यान रखिए: यह वही स्थान है जहाँ विद्यार्थी प्रायः चूकते हैं — ‘किम्’ लिखकर छोड़ देते हैं। ‘पुरुषसिंहम्’ पुंलिङ्ग है, इसलिए प्रश्न ‘कम्’ बनेगा। यही प्रश्न पुस्तक ने अभ्यास के प्रश्न १ (ग) में तैयार रूप में पूछा है — ‘लक्ष्मीः कम् उपैति ?’ — इससे अपना उत्तर जाँच लीजिए।
ध्यान दें: श्लोक में कर्म दो विशेषणों के साथ है — ‘उद्योगिनं पुरुषसिंहम्’। यहाँ रेखाङ्कित केवल ‘पुरुषसिंहम्’ है, इसलिए प्रश्न में ‘उद्योगिनम्’ नहीं रखा गया; अभ्यास के वाक्य में वह पहले ही हटा दिया गया है।
प्र5.
सन्तः परीक्ष्य अन्यतरद् भजन्ते।
उत्तर

उत्तरम् — के परीक्ष्य अन्यतरद् भजन्ते ?

(हिन्दी — कौन लोग परीक्षा करके दोनों में से (उत्तम) को अपनाते हैं ?)

सन्तः = ‘सत्’ (पुंलिङ्ग), प्रथमा · बहुवचन — वाक्य का कर्ता
‘किम्’ का पुंलिङ्ग प्रथमा बहुवचन = के
(एकवचन होता तो ‘कः’, द्विवचन होता तो ‘कौ’)
वचन पर ध्यान: यह वाक्य कर्तृवाच्य का है, इसलिए कर्ता प्रथमा में है — तुलना कीजिए (क) से, जहाँ कर्मवाच्य होने के कारण कर्ता तृतीया में था और प्रश्न ‘कैः’ बना। यहाँ ‘भजन्ते’ बहुवचन की क्रिया है, ‘सन्तः’ बहुवचन का कर्ता — इसलिए प्रश्न भी बहुवचन में ‘के’ ही बनेगा, ‘कः’ नहीं।
शब्द-परिचय: ‘सत्’ (√अस् + शतृ) का अर्थ है ‘होने वाला, विद्यमान’, और नीति-साहित्य में ‘सत्’ का अर्थ ‘सज्जन’ हो जाता है। इसके रूप — प्रथमा : सन् / सन्तौ / सन्तः; द्वितीया : सन्तम् / सन्तौ / सतः। पुस्तक की तालिका भी ‘सन्तः = सज्जनाः’ ही देती है।
प्र6.
क्रियां सहसा न विदधीत।
उत्तर

उत्तरम् — कां सहसा न विदधीत ?

(हिन्दी — किस काम को जल्दबाज़ी में नहीं करना चाहिए ?)

क्रियाम् = ‘क्रिया’ (स्त्रीलिङ्ग, आकारान्त), द्वितीया · एकवचन
‘किम्’ का स्त्रीलिङ्ग द्वितीया एकवचन = काम् (लिखने में ‘कां’)
तुलना — पुंलिङ्ग ‘कम्’, नपुंसकलिङ्ग ‘किम्’, स्त्रीलिङ्ग ‘काम्’
तीनों लिङ्गों का भेद एक साथ देखिए: इस प्रश्न-समूह ने जान-बूझकर तीनों रूप एक साथ अभ्यास कराए हैं — (घ) में पुंलिङ्ग कर्म ‘पुरुषसिंहम्’ → कम्; यहाँ स्त्रीलिङ्ग कर्म ‘क्रियाम्’ → काम्; और प्रश्न ४ (ङ) में नपुंसकलिङ्ग कर्म ‘जलम्’ → किम्कर्म का लिङ्ग बदलते ही प्रश्नवाचक बदल जाता है — यही इस अभ्यास का मर्म है।
व्याकरण: ‘विदधीत’ = वि + √धा, विधिलिङ् लकार, आत्मनेपद, प्रथमपुरुष, एकवचन — ‘करना चाहिए’। ‘सहसा’ अव्यय है (‘अचानक, बिना विचारे’), इसलिए प्रश्न बनाते समय वह ज्यों का त्यों रहता है।
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