शारदा अध्याय 6 अभ्यासाद् जायते सिद्धिः

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
…………………………………… परमापदां पदम्।
उत्तर

उत्तरम् — सहसा विदधीत न क्रियामविवेकः परमापदां पदम्।

(हिन्दी — जल्दबाज़ी में काम नहीं करना चाहिए; अविवेक विपत्तियों का सबसे बड़ा घर है।)

पूरा श्लोकांश (श्लोक ८, किरातार्जुनीयम् २.३०) —
सहसा विदधीत न क्रियामविवेकः परमापदां पदम्।
पदच्छेदः — सहसा + विदधीत + न + क्रियाम् + अविवेकः + परम् + आपदाम् + पदम्
रिक्तस्थान कैसे पहचाना: जो अंश दिया है — ‘परमापदां पदम्’ — वह विधेय है (‘विपत्तियों का सबसे बड़ा घर’)। विधेय है तो उद्देश्य कहाँ है ? वही रिक्त है — ‘अविवेकः’। और उससे पहले जो निषेध-वाक्य है (‘सहसा विदधीत न क्रियाम्’) वही अविवेक की व्याख्या करता है। इस प्रकार कर्ता खोजो — यही रिक्तस्थान-पूर्ति की पहली युक्ति है।
सन्धि: क्रियामविवेकः = क्रियाम् + अविवेकः; परमापदाम् = परम् + आपदाम् (दीर्घ सन्धि — अ + आ = आ)। ‘परम्’ यहाँ ‘सबसे बड़ा / परम’ के अर्थ में ‘पदम्’ का विशेषण है।
प्र2.
सन्तः …………………………………… अन्यतरद् भजन्ते।
उत्तर

उत्तरम् — सन्तः परीक्ष्य अन्यतरद् भजन्ते।

(हिन्दी — सज्जन लोग परीक्षा करके दोनों में से (जो उत्तम हो) उसी को अपनाते हैं।)

पूरा श्लोकांश (श्लोक ७, मालविकाग्निमित्रम् १.२) —
सन्तः परीक्ष्यान्यतरद्भजन्ते मूढः परप्रत्ययनेयबुद्धिः॥
सन्धिविच्छेदः — परीक्ष्य + अन्यतरत् + भजन्ते
‘परीक्ष्य’ ही क्यों: इस श्लोक की पूरी बात एक ही शब्द पर टिकी है। पहले दो चरण दो झूठी कसौटियाँ हटाते हैं — पुराना होने से कुछ अच्छा नहीं हो जाता, नया होने से बुरा नहीं। तो कसौटी क्या है ? — परीक्षा। ‘परीक्ष्य’ हटा दीजिए तो श्लोक का उत्तर ही ग़ायब हो जाता है। यही कारण है कि पुस्तक ने ठीक यही पद रिक्त रखा।
व्याकरण: ‘परीक्ष्य’ = परि + √ईक्ष् + ल्यप्। नियम — समासेऽनञ्पूर्वे क्त्वो ल्यप्, अर्थात् उपसर्ग लगने पर क्त्वा प्रत्यय ‘य’ (ल्यप्) हो जाता है : दृष्ट्वा → सन्दृश्य, कृत्वा → विकृत्य, ईक्षित्वा → परीक्ष्य। ‘अन्यतरत्’ = दो में से एक (नपुंसकलिङ्ग, द्वितीया एकवचन)।
प्र3.
दैवं निहत्य कुरु …………………………………… आत्मशक्त्या।
उत्तर

उत्तरम् — दैवं निहत्य कुरु पौरुषम् आत्मशक्त्या।

(हिन्दी — भाग्य को पीछे धकेलकर अपनी शक्ति से पुरुषार्थ करो।)

पूरा श्लोकांश (श्लोक ६, पञ्चतन्त्रम् — मित्रभेदः १४९) —
दैवं निहत्य कुरु पौरुषमात्मशक्त्या यत्ने कृते यदि न सिध्यति कोऽत्र दोषः॥
सन्धिविच्छेदः — पौरुषम् + आत्मशक्त्या
क्रिया का कर्म खोजिए: ‘कुरु’ (करो) लोट् लकार, मध्यमपुरुष, एकवचन की आज्ञा है — और हर सकर्मक क्रिया को कर्म चाहिए। ‘क्या करो ?’ का उत्तर ही रिक्त है : पौरुषम् (द्वितीया एकवचन)। ‘आत्मशक्त्या’ तृतीया में है — साधन बताता है, कर्म नहीं; इसलिए वह रिक्तस्थान नहीं भर सकता।
भाव तथा व्याकरण: ‘दैवं निहत्य’ का शब्दशः अर्थ है ‘भाग्य को मारकर’ — पुस्तक इसका अर्थ ‘अतिक्रम्य’ (अतिक्रमण करके) देती है, अर्थात् भाग्य के भरोसे बैठे रहने की वृत्ति को हराकर। ‘निहत्य’ = नि + √हन् + ल्यप्। ‘आत्मशक्त्या’ = आत्मनः शक्त्या (षष्ठी-तत्पुरुष, फिर करणे तृतीया)।
प्र4.
स यत् …………………………………… कुरुते।
उत्तर

उत्तरम् — स यत् प्रमाणं कुरुते।

(हिन्दी — वह (श्रेष्ठ पुरुष) जिसे प्रमाण — अर्थात् मानक — बना देता है।)

पूरा श्लोकांश (श्लोक ३, श्रीमद्भगवद्गीता ३.२१) —
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥
अन्वयः — सः यत् प्रमाणं कुरुते, लोकः तत् अनुवर्तते।
‘प्रमाणम्’ का अर्थ यहाँ क्या है: ‘प्रमाण’ का सामान्य अर्थ है नाप, प्रमाण, साक्ष्य; पर यहाँ उसका अर्थ है मानक / आदर्श — वह वस्तु जिसे देखकर बाक़ी लोग अपना व्यवहार नापते हैं। श्रेष्ठ पुरुष जिस बात को अपने आचरण से ‘ठीक’ ठहरा देता है, समाज उसी को नियम मान लेता है। इसीलिए अगली पंक्ति में ‘लोकस्तदनुवर्तते’ आता है — ‘तत्’ का सम्बन्ध इसी ‘प्रमाणम्’ से है।
ध्यान दें: ‘कुरुते’ आत्मनेपद का रूप है (√कृ, लट्, प्र.पु.ए.व.)। ‘करोति’ और ‘कुरुते’ दोनों ‘करता है’ ही हैं; कवि ने छन्द के अनुरोध से आत्मनेपद लिया है। ‘स’ = सः (विसर्ग का लोप, ‘सः’ का ‘स’ रूप श्लोक में सामान्य है)।
प्र5.
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो …………………………………… धर्मलक्षणम्।
उत्तर

उत्तरम् — धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्।

(हिन्दी — बुद्धि, विद्या, सत्य तथा अक्रोध — (इस प्रकार ये) दस धर्म के लक्षण हैं।)

पूरा श्लोक (श्लोक २, मनुस्मृतिः ६.९२) —
धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्॥
‘दशकम्’ क्यों आवश्यक है: श्लोक ने दस गुण गिनाए और अन्त में उन्हें एक शब्द में समेट दिया — ‘दशकम्’ अर्थात् ‘दस का समूह’। यही पद पूरे श्लोक को एक वाक्य बना देता है; उसके बिना केवल नामों की सूची रह जाती। गिनकर देखिए — धृति, क्षमा, दम, अस्तेय, शौच, इन्द्रियनिग्रह, धी, विद्या, सत्य, अक्रोध : ठीक दस
सन्धि: ‘सत्यमक्रोधो दशकम्’ = सत्यम् + अक्रोधः + दशकम्; ‘अक्रोधः’ का विसर्ग ‘द’ (घोष वर्ण) से पहले ‘ओ’ हो गया — विसर्गसन्धि (अः + घोष वर्ण → ओ)। ‘धीर्विद्या’ = धीः + विद्या (ईः + व → ईर्)।
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