प्र1.
अस्मिन् श्लोके प्रथमं क्रियापदं किम् ?
उत्तर
उत्तरम् — न्यसेत्। (हिन्दी — ‘रखे / रखना चाहिए’।)
श्लोक की पहली पंक्ति — दृष्टिपूतं न्यसेत् पादं वस्त्रपूतं जलं पिबेत्।
न्यसेत् = नि + √अस् , विधिलिङ् लकार · प्रथमपुरुष · एकवचन
अर्थः — स्थापयेत् (रखना चाहिए)
न्यसेत् = नि + √अस् , विधिलिङ् लकार · प्रथमपुरुष · एकवचन
अर्थः — स्थापयेत् (रखना चाहिए)
क्रियापद कैसे पहचानें: जिस पद से कार्य का बोध हो और जो लकार में चला हो, वही क्रियापद है। इस श्लोक में चार क्रियापद हैं — न्यसेत्, पिबेत्, वदेत्, समाचरेत् — और चारों विधिलिङ् में हैं। विधिलिङ् का अर्थ है ‘चाहिए’, इसलिए पूरा श्लोक उपदेश बन जाता है, वर्णन नहीं। क्रम में सबसे पहला ‘न्यसेत्’ है।
ध्यान दें: ‘दृष्टिपूतम्’ क्रियापद नहीं, कृदन्त विशेषण है (√पू + क्त)। क्त-प्रत्ययान्त पद क्रिया जैसा लगता है, पर वह विशेषण की तरह विभक्ति लेता है — इसीलिए वह ‘पादम्’ के साथ द्वितीया में है।