शारदा अध्याय 6 अभ्यासाद् जायते सिद्धिः

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
लक्ष्मीः प्रयत्नशीलस्य पराक्रमिणः …………………… समीपं स्वयम् आगच्छति। कापुरुषाः तु ‘विधिः एव बलीयान्’ इति वदन्ति। ये पौरुषेण परिस्थितिम् अतिक्रम्य कार्याणि साधयन्ति ते एव …………………… । प्रयत्नं कृत्वा अपि यदि …………………… न प्राप्तं तर्हि तत्र दोषः नास्ति खलु।
उत्तर

पूर्णः भावार्थः — लक्ष्मीः प्रयत्नशीलस्य पराक्रमिणः पुरुषस्य समीपं स्वयम् आगच्छति। कापुरुषाः तु ‘विधिः एव बलीयान्’ इति वदन्ति। ये पौरुषेण परिस्थितिम् अतिक्रम्य कार्याणि साधयन्ति ते एव धीराः। प्रयत्नं कृत्वा अपि यदि लक्ष्यं न प्राप्तं तर्हि तत्र दोषः नास्ति खलु।

(हिन्दी — लक्ष्मी प्रयत्नशील, पराक्रमी पुरुष के पास स्वयं आती है। कायर लोग तो कहते हैं कि ‘भाग्य ही बलवान् है’। जो लोग पुरुषार्थ से परिस्थिति को लाँघकर काम सिद्ध करते हैं, वे ही धीर हैं। प्रयत्न कर लेने पर भी यदि लक्ष्य न मिले, तो उसमें कोई दोष नहीं है।)

रिक्तस्थानम्भृतम् पदम्क्यों यही पदश्लोक का आधार
पुरुषस्य‘प्रयत्नशीलस्य पराक्रमिणः’ दोनों षष्ठी के विशेषण हैं; उन्हें विशेष्य चाहिए, और वह भी षष्ठी में — मञ्जूषा में केवल ‘पुरुषस्य’ ही षष्ठी में है।उद्योगिनं पुरुषसिंहम् उपैति लक्ष्मीः
धीराः‘ये … साधयन्ति ते एव ___’ — ‘ते’ पुंलिङ्ग प्रथमा बहुवचन है, इसलिए विधेय भी प्रथमा बहुवचन चाहिए। मञ्जूषा में वही रूप ‘धीराः’ है।दैवं निहत्य कुरु पौरुषम् आत्मशक्त्या
लक्ष्यं‘न प्राप्तम्’ नपुंसकलिङ्ग कर्मवाच्य का रूप है; उसका कर्म भी नपुंसकलिङ्ग चाहिए — ‘लक्ष्यम्’।यत्ने कृते यदि न सिध्यति कोऽत्र दोषः
यह भावार्थ किस श्लोक का है: यह पूरा गद्यांश छठे श्लोक (पञ्चतन्त्रम् — ‘उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः’) का हिन्दी-नुमा संस्कृत सारांश है। तीनों वाक्य श्लोक के तीन भागों को दोहराते हैं — (१) लक्ष्मी उद्यमी के पास आती है, (२) भाग्य को हराकर पुरुषार्थ करने वाला ही धीर है, (३) प्रयत्न के बाद असफलता में दोष नहीं। ध्यान दीजिए, ‘विधिः एव बलीयान्’ श्लोक के ‘दैवेन देयम्’ का ही रूपान्तर है।
पद चुनने की युक्ति: पहले रिक्तस्थान के आस-पास के पदों की विभक्ति देखिए, फिर मञ्जूषा में उसी विभक्ति-वचन-लिङ्ग वाला पद ढूँढ़िए। ‘पुरुषस्य’ (षष्ठी ए.व.), ‘धीराः’ (प्रथमा ब.व.), ‘लक्ष्यम्’ (नपुं. प्र./द्वि. ए.व.) — तीनों का रूप ही उनका स्थान बता देता है, अर्थ पर बाद में सोचिए।
प्र2.
पुरातनम् अस्ति इति कारणेन किमपि वस्तु तत्त्वं व्यक्तित्वं वा समीचीनं भवेदेव इति नियमः नास्ति। तथैव …………………… अस्ति इति कारणेन दोषरहितं भवेत् इत्यपि नियमः नास्ति। येषां …………………… पक्वा अस्ति ते परीक्षण-निरीक्षणानन्तरम् एव उत्तमं स्वीकुर्वन्ति। किन्तु अज्ञानाः अन्येषाम् …………………… श्रुत्वा तदनुसारेण प्रवर्तन्ते।
उत्तर

पूर्णः भावार्थः — पुरातनम् अस्ति इति कारणेन किमपि वस्तु तत्त्वं व्यक्तित्वं वा समीचीनं भवेदेव इति नियमः नास्ति। तथैव नूतनम् अस्ति इति कारणेन दोषरहितं भवेत् इत्यपि नियमः नास्ति। येषां बुद्धिः पक्वा अस्ति ते परीक्षण-निरीक्षणानन्तरम् एव उत्तमं स्वीकुर्वन्ति। किन्तु अज्ञानाः अन्येषाम् अभिप्रायं श्रुत्वा तदनुसारेण प्रवर्तन्ते।

(हिन्दी — कोई वस्तु, तत्त्व या व्यक्तित्व केवल इसलिए ठीक हो — ऐसा कोई नियम नहीं कि वह पुराना है। वैसे ही यह भी नियम नहीं कि नया होने के कारण वह दोषरहित होगा। जिनकी बुद्धि पकी हुई है, वे जाँच-परखकर ही उत्तम को स्वीकार करते हैं। किन्तु अज्ञानी लोग दूसरों की राय सुनकर उसी के अनुसार चलने लगते हैं।)

रिक्तस्थानम्भृतम् पदम्क्यों यही पदश्लोक का आधार
नूतनम्पिछले वाक्य में ‘पुरातनम्’ था; ‘तथैव’ के बाद उसका विपरीत चाहिए — नया। मञ्जूषा में वही ‘नूतनम्’ (नपुं.प्र.ए.व.) है।न चापि काव्यं नवम् इत्यवद्यम्
बुद्धिः‘पक्वा अस्ति’ — ‘पक्वा’ स्त्रीलिङ्ग प्रथमा एकवचन है, अतः कर्ता भी स्त्रीलिङ्ग प्रथमा एकवचन चाहिए। मञ्जूषा में केवल ‘बुद्धिः’ ही ऐसा है।सन्तः परीक्ष्य अन्यतरद् भजन्ते
अभिप्रायं‘श्रुत्वा’ सकर्मक है — क्या सुनकर ? अतः द्वितीया का पद चाहिए; ‘अभिप्रायम्’ वही है।मूढः परप्रत्ययनेयबुद्धिः
यह भावार्थ किस श्लोक का है: यह पूरा गद्यांश सातवें श्लोक (मालविकाग्निमित्रम् — ‘पुराणमित्येव न साधु सर्वम्’) का सारांश है और उसके चारों चरणों को क्रम से खोलता है : पुराना = अच्छा नहीं, नया = बुरा नहीं, सन्तः परीक्ष्य भजन्ते = पकी बुद्धि वाले जाँचकर लेते हैं, और मूढः परप्रत्ययनेयबुद्धिः = अज्ञानी दूसरों की राय पर चलते हैं। ध्यान दीजिए, ‘परप्रत्ययनेयबुद्धिः’ को यहाँ ‘अन्येषाम् अभिप्रायं श्रुत्वा तदनुसारेण प्रवर्तन्ते’ कहकर सरल कर दिया गया है — यही अनुवाद की अच्छी विधि है।
ध्यान दें: मञ्जूषा में छह पद हैं और रिक्तस्थान भी छह — (क) में तीन, (ख) में तीन। इसलिए एक पद दो बार नहीं आएगा। जो पद निश्चित रूप से पहचान में आ जाएँ उन्हें पहले भर दीजिए, शेष अपने-आप बच जाएँगे — यह बहिष्करण की विधि मेलन तथा मञ्जूषा दोनों प्रकार के प्रश्नों में काम आती है।
क्या यह उपयोगी रहा? त्रुटि बताएँ