पूर्णः भावार्थः — लक्ष्मीः प्रयत्नशीलस्य पराक्रमिणः पुरुषस्य समीपं स्वयम् आगच्छति। कापुरुषाः तु ‘विधिः एव बलीयान्’ इति वदन्ति। ये पौरुषेण परिस्थितिम् अतिक्रम्य कार्याणि साधयन्ति ते एव धीराः। प्रयत्नं कृत्वा अपि यदि लक्ष्यं न प्राप्तं तर्हि तत्र दोषः नास्ति खलु।
(हिन्दी — लक्ष्मी प्रयत्नशील, पराक्रमी पुरुष के पास स्वयं आती है। कायर लोग तो कहते हैं कि ‘भाग्य ही बलवान् है’। जो लोग पुरुषार्थ से परिस्थिति को लाँघकर काम सिद्ध करते हैं, वे ही धीर हैं। प्रयत्न कर लेने पर भी यदि लक्ष्य न मिले, तो उसमें कोई दोष नहीं है।)
| रिक्तस्थानम् | भृतम् पदम् | क्यों यही पद | श्लोक का आधार |
|---|---|---|---|
| १ | पुरुषस्य | ‘प्रयत्नशीलस्य पराक्रमिणः’ दोनों षष्ठी के विशेषण हैं; उन्हें विशेष्य चाहिए, और वह भी षष्ठी में — मञ्जूषा में केवल ‘पुरुषस्य’ ही षष्ठी में है। | उद्योगिनं पुरुषसिंहम् उपैति लक्ष्मीः |
| २ | धीराः | ‘ये … साधयन्ति ते एव ___’ — ‘ते’ पुंलिङ्ग प्रथमा बहुवचन है, इसलिए विधेय भी प्रथमा बहुवचन चाहिए। मञ्जूषा में वही रूप ‘धीराः’ है। | दैवं निहत्य कुरु पौरुषम् आत्मशक्त्या |
| ३ | लक्ष्यं | ‘न प्राप्तम्’ नपुंसकलिङ्ग कर्मवाच्य का रूप है; उसका कर्म भी नपुंसकलिङ्ग चाहिए — ‘लक्ष्यम्’। | यत्ने कृते यदि न सिध्यति कोऽत्र दोषः |