शारदा अध्याय 6 अभ्यासाद् जायते सिद्धिः

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
सर्वाः …………… अभ्यासेन (सिध्यन्ति)। …………… कलाः अभ्यासात् (सिध्यन्ति)। ध्यानमौनादि (अपि) …………… (सिध्यति)। अभ्यासस्य …………… किम् (अस्ति) ?
उत्तर

पूर्णः अन्वयः — सर्वाः क्रियाः अभ्यासेन (सिध्यन्ति)। सकलाः कलाः अभ्यासात् (सिध्यन्ति)। ध्यानमौनादि (अपि) अभ्यासात् (सिध्यति)। अभ्यासस्य दुष्करं किम् (अस्ति) ?

(हिन्दी — सारे काम अभ्यास से सिद्ध होते हैं। सारी कलाएँ अभ्यास से सिद्ध होती हैं। ध्यान-मौन आदि भी अभ्यास से ही सिद्ध होते हैं। फिर अभ्यास के लिए कठिन क्या है ?)

मूल श्लोक (श्लोक ४) —
अभ्यासेन क्रियाः सर्वाः अभ्यासात् सकलाः कलाः।
अभ्यासाद् ध्यानमौनादि किमभ्यासस्य दुष्करम्॥
रिक्तस्थानम्भृतम् पदम्पहचानने का सूत्र
क्रियाः‘सर्वाः’ स्त्रीलिङ्ग प्रथमा बहुवचन का विशेषण है — उसे वही रूप वाला विशेष्य चाहिए : क्रियाः
सकलाः‘कलाः’ विशेष्य दिया है, विशेषण रिक्त है; श्लोक में उसका जोड़ीदार सकलाः है
अभ्यासात्तीसरे चरण में भी वही पञ्चमी चाहिए जो दूसरे में थी — ‘अभ्यासाद् ध्यानमौनादि’
दुष्करं‘किम् (अस्ति)?’ का विधेय-विशेषण चाहिए — नपुंसकलिङ्ग प्रथमा एकवचन दुष्करम्
अन्वय-क्रम पर ध्यान दीजिए: श्लोक में ‘अभ्यासेन क्रियाः सर्वाः’ है, पर अन्वय में ‘सर्वाः क्रियाः अभ्यासेन’ हो गया — क्योंकि गद्य-क्रम में विशेषण विशेष्य से पहले आता है और करण-पद क्रिया के पास। इसी तरह ‘किमभ्यासस्य दुष्करम्’ का अन्वय ‘अभ्यासस्य दुष्करं किम् (अस्ति)’ बना — प्रश्नवाचक अन्त में। यही अन्वय बनाने का नियम है।
कोष्ठक क्यों हैं: ‘(सिध्यन्ति)’ तथा ‘(अस्ति)’ श्लोक में हैं ही नहीं — वे अध्याहृत क्रियाएँ हैं जिन्हें अर्थ पूरा करने के लिए जोड़ना पड़ता है। संस्कृत में ‘अस्ति/भवति’ तथा प्रसंग से स्पष्ट क्रिया प्रायः छोड़ दी जाती है; अन्वय लिखते समय उसे कोष्ठक में जोड़ देना चाहिए।
प्र2.
श्रेष्ठः यत् यत् …………… इतरः जनः तत् तत् एव (आचरति)। सः यत् …………… कुरुते, लोकः तत् …………… ।
उत्तर

पूर्णः अन्वयः — श्रेष्ठः यत् यत् आचरति इतरः जनः तत् तत् एव (आचरति)। सः यत् प्रमाणं कुरुते, लोकः तत् अनुवर्तते

(हिन्दी — श्रेष्ठ पुरुष जो-जो आचरण करता है, दूसरा व्यक्ति भी वही-वही करता है। वह जिसे प्रमाण बनाता है, समाज उसी का अनुसरण करता है।)

मूल श्लोक (श्लोक ३, श्रीमद्भगवद्गीता ३.२१) —
यद्यदाचरति श्रेष्ठः तत्तदेवेतरो जनः।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥
रिक्तस्थानम्भृतम् पदम्पहचानने का सूत्र
आचरति‘श्रेष्ठः’ कर्ता है, उसे क्रिया चाहिए; कोष्ठक में आगे ‘(आचरति)’ दोहराया गया है — वही क्रिया यहाँ मूल रूप में है
प्रमाणं‘कुरुते’ सकर्मक है — क्या बनाता है ? उत्तर नपुंसकलिङ्ग द्वितीया प्रमाणम्
अनुवर्तते‘लोकः तत् ___’ — कर्ता तथा कर्म दोनों हैं, क्रिया रिक्त है : अनुवर्तते (अनु + √वृत्, लट्, आत्मनेपद)
‘यत् यत् — तत् तत्’ की जोड़ी: संस्कृत में यत् (जो) और तत् (वह) सदा जोड़े में चलते हैं — ‘यत् … तत् …’। यहाँ दोनों की आवृत्ति हुई है (यत् यत् / तत् तत्), जिसका अर्थ है ‘जो-जो … वही-वही’ — अर्थात् कोई भी बात छूटती नहीं। दूसरी पंक्ति में भी वही जोड़ी है — ‘सः यत् प्रमाणं कुरुते, लोकः तत् अनुवर्तते’।
सन्धि जोड़कर देखिए: ‘यद्यदाचरति’ = यत् + यत् + आचरति; ‘तत्तदेवेतरो जनः’ = तत् + तत् + एव + इतरः + जनः; ‘लोकस्तदनुवर्तते’ = लोकः + तत् + अनुवर्तते। यही अन्तिम पद अभ्यास के प्रश्न ८ (च) में सन्धिविच्छेद के लिए दिया गया है — वहाँ उत्तर तीन भागों में आएगा।
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