प्र1.
यथोचितं मेलनं कुरुत — श्लोकांशः : (क) पुराणमित्येव न साधु सर्वम् (ख) प्रारभ्य चोत्तमजनाः न परित्यजन्ति (ग) यद्यदाचरति श्रेष्ठः (घ) धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयम् (ङ) उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः ॥ स्रोतोग्रन्थः : १. मनुस्मृतिः २. पञ्चतन्त्रम् ३. नीतिशतकम् ४. मालविकाग्निमित्रम् ५. श्रीमद्भगवद्गीता
उत्तर
शुद्धं मेलनम् — (क)–४, (ख)–३, (ग)–५, (घ)–१, (ङ)–२।
(हिन्दी — (क) मालविकाग्निमित्रम्, (ख) नीतिशतकम्, (ग) श्रीमद्भगवद्गीता, (घ) मनुस्मृतिः, (ङ) पञ्चतन्त्रम्।)
| क्रमः | श्लोकांशः | स्रोतोग्रन्थः | ग्रन्थकर्ता / काव्यरूपम् | पहचानने का सूत्र |
|---|---|---|---|---|
| (क) | पुराणमित्येव न साधु सर्वम् | ४. मालविकाग्निमित्रम् (१.२) | कालिदासः — रूपकम् (नाटक) | यह नाटक की प्रस्तावना का श्लोक है, जहाँ पुराने और नए कवि की तुलना पर उत्तर दिया गया है |
| (ख) | प्रारभ्य चोत्तमजनाः न परित्यजन्ति | ३. नीतिशतकम् (२७) | भर्तृहरिः — नीति-साहित्यम् | अधम-मध्यम-उत्तम की त्रिविध वर्गीकरण-शैली भर्तृहरि की अपनी पहचान है |
| (ग) | यद्यदाचरति श्रेष्ठः | ५. श्रीमद्भगवद्गीता (३.२१) | महर्षिः व्यासः — ज्ञानोपदेशः | ‘लोकसंग्रह’ का प्रसंग — कर्मयोग-अध्याय का प्रसिद्ध श्लोक |
| (घ) | धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयम् | १. मनुस्मृतिः (६.९२) | मनुः — धर्मशास्त्रीयग्रन्थः | ‘धर्मलक्षणम्’ की परिभाषा देना धर्मशास्त्र का ही काम है |
| (ङ) | उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः | २. पञ्चतन्त्रम् — मित्रभेदः (१४९) | विष्णुशर्मा — कथा-साहित्यम् | पञ्चतन्त्र की सीधी, व्यावहारिक उद्यम-प्रशंसा — कथा के बीच रखा उपदेश-श्लोक |
मेलन कैसे जाँचें: दो कसौटियाँ एक साथ लगाइए। पहली — विषय: धर्म की परिभाषा धर्मशास्त्र से आएगी (घ–१); उद्यम की प्रशंसा कथा-साहित्य से (ङ–२); तीन प्रकार के मनुष्यों का वर्गीकरण नीति-साहित्य से (ख–३); नए-पुराने काव्य की चर्चा नाटक की प्रस्तावना से (क–४); और श्रेष्ठ पुरुष के अनुकरण की बात गीता से (ग–५)। दूसरी — पाठ: पृष्ठ ६९–७० पर हर श्लोक के नीचे उसका स्रोत कोष्ठक में छपा है; अपना उत्तर वहीं से मिला लीजिए। विषय से अनुमान लगाइए, पाठ से पुष्टि कीजिए — तभी उत्तर पक्का होगा।
ध्यान दें: पाठ में आठ श्लोक हैं पर मेलन में केवल पाँच स्रोत दिए गए हैं। छूटे हुए तीन हैं — मनुस्मृति ६.४६ (श्लोक १, जिसका स्रोत (घ) वाले से एक ही है), सुभाषितरत्नभाण्डागारः (श्लोक ४) तथा किरातार्जुनीयम् (श्लोक ८)। इन तीनों के स्रोत भी याद रखिए — परीक्षा में वही पूछे जा सकते हैं। ‘सुभाषितरत्नभाण्डागार’ किसी एक कवि की रचना नहीं, अनेक कवियों के सुभाषितों का सङ्ग्रह-ग्रन्थ है।