प्र1.
धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयम्।
उत्तर
उत्तरम् — दमोऽस्तेयम् = दमः + अस्तेयम्।
(हिन्दी — दम = इन्द्रिय तथा मन का संयम; अस्तेय = चोरी न करना।)
दमः + अस्तेयम्
विसर्ग ‘अः’ के बाद ‘अ’ आया → अः + अ = ओ , और अगला ‘अ’ लुप्त होकर अवग्रह (ऽ) से दिखाया जाता है
दमः + अस्तेयम् → दमो + ऽस्तेयम् → दमोऽस्तेयम्
विसर्ग ‘अः’ के बाद ‘अ’ आया → अः + अ = ओ , और अगला ‘अ’ लुप्त होकर अवग्रह (ऽ) से दिखाया जाता है
दमः + अस्तेयम् → दमो + ऽस्तेयम् → दमोऽस्तेयम्
नियम — विसर्गसन्धि: «अतोऽति नित्यम्» — यदि ‘अ’ के बाद विसर्ग हो और उसके आगे भी ‘अ’ हो, तो विसर्ग तथा उससे पहले का ‘अ’ मिलकर ‘ओ’ बन जाते हैं और आगे वाला ‘अ’ लुप्त हो जाता है; उस लोप का चिह्न ही अवग्रह ‘ऽ’ है। उदाहरण — कः + अत्र → कोऽत्र (यह भी इसी पाठ के छठे श्लोक में है), शिवः + अपि → शिवोऽपि, सः + अयम् → सोऽयम्।
ध्यान दें: अवग्रह ‘ऽ’ कोई अक्षर नहीं, लुप्त ‘अ’ का चिह्न है। सन्धिविच्छेद करते समय उसे हटाकर ‘अ’ लौटा दीजिए — इसीलिए उत्तर ‘दमो + स्तेयम्’ नहीं, ‘दमः + अस्तेयम्’ है। ‘अस्तेयम्’ स्वयं नञ्-तत्पुरुष समास है (न स्तेयम् = चोरी न करना)।