शारदा अध्याय 6 अभ्यासाद् जायते सिद्धिः

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
विघ्नैः विहताः (कार्यात्) विरमन्ति।
उत्तर

समस्तपदम् — विघ्नविहताः (हिन्दी — विघ्नों से आहत, रुकावटों की चोट खाए हुए।)

विग्रहः — विघ्नैः विहताः
समस्तपदम् — विघ्नविहताः
समासस्य नाम — तृतीया-तत्पुरुषः (‘विघ्नैः’ तृतीया में है, वही समास में लुप्त हो गई)
पाठ की पंक्ति — प्रारभ्य विघ्नविहता विरमन्ति मध्याः (श्लोक ५)
यही तत्पुरुष क्यों, दूसरा क्यों नहीं: तत्पुरुष समास का नाम उस विभक्ति से पड़ता है जो पूर्वपद में विग्रह करते समय आती है। यहाँ विग्रह ‘विघ्नैः विहताः’ है — तृतीया; इसलिए यह तृतीया-तत्पुरुष हुआ। यदि विग्रह ‘विघ्नानां विहताः’ होता तो षष्ठी-तत्पुरुष कहलाता। अर्थ भी यही माँगता है : विघ्न कर्ता हैं (उन्होंने चोट पहुँचाई), इसलिए तृतीया ही ठीक है — «कर्तृकरणे तृतीया»।
व्याकरण: ‘विहताः’ = वि + √हन् + क्त प्रत्यय, पुं.प्र.ब.व. — ‘मारे गए, आहत’। पुस्तक की शब्दार्थ-तालिका इसी पद को ‘विघ्नैः विहताः = विघ्नों से हत’ देकर विग्रह पहले ही बता देती है। यही पद अभ्यास के प्रश्न ८ (ङ) में सन्धिविच्छेद के लिए भी आया है।
प्र2.
वस्त्रेण पूतं जलं पिबेत्।
उत्तर

समस्तपदम् — वस्त्रपूतम् (हिन्दी — वस्त्र से छाना हुआ।)

विग्रहः — वस्त्रेण पूतम्
समस्तपदम् — वस्त्रपूतम्
समासस्य नाम — तृतीया-तत्पुरुषः
पाठ की पंक्ति — वस्त्रपूतं जलं पिबेत् (श्लोक १)
पूरे श्लोक का साँचा एक ही है: पहले श्लोक के चारों विशेषण इसी ढाँचे में बने हैं और चारों तृतीया-तत्पुरुष हैं — दृष्ट्या पूतम् = दृष्टिपूतम्, वस्त्रेण पूतम् = वस्त्रपूतम्, सत्येन पूताम् = सत्यपूताम्, मनसा पूतम् = मनःपूतम्। एक बार यह साँचा पकड़ लीजिए, चारों के विग्रह अपने-आप बन जाएँगे। इसीलिए पुस्तक ने ‘यथा’ में ‘मनसा पूतं = मनःपूतम्’ देकर साँचा पहले ही दिखा दिया।
ध्यान दें: समास बनाते समय पूर्वपद की विभक्ति का लोप होता है — ‘वस्त्रेण’ का ‘एन’ गिरकर केवल ‘वस्त्र’ शेष रहा। समस्तपद का लिङ्ग-विभक्ति-वचन उत्तरपद से आता है : ‘जलम्’ नपुंसकलिङ्ग द्वितीया एकवचन है, इसलिए ‘वस्त्रपूतम्’ भी वही।
प्र3.
पुरुषः सिंहः इव तम् उपैति लक्ष्मीः।
उत्तर

समस्तपदम् — पुरुषसिंहम् (हिन्दी — सिंह जैसे (पराक्रमी) पुरुष को।)

विग्रहः — पुरुषः सिंहः इव
समस्तपदम् — पुरुषसिंहम् (श्लोक में द्वितीया एकवचन में)
समासस्य नाम — कर्मधारयः (उपमानोत्तरपद कर्मधारय)
पाठ की पंक्ति — उद्योगिनं पुरुषसिंहम् उपैति लक्ष्मीः (श्लोक ६)
यह कर्मधारय क्यों है, तत्पुरुष क्यों नहीं: तत्पुरुष में दोनों पद भिन्न वस्तुओं के होते हैं (राजपुरुषः = राज्ञः पुरुषः — राजा और पुरुष अलग)। पर यहाँ दोनों पद एक ही वस्तु के हैं — वही पुरुष, और वही सिंह-सा; अर्थात् दोनों पद समानाधिकरण हैं। जहाँ पूर्वपद और उत्तरपद एक ही वस्तु को कहें, वहाँ कर्मधारय होता है। और चूँकि उत्तरपद ‘सिंह’ उपमान है (जिससे तुलना की गई), इसे विशेष रूप से ‘उपमानोत्तरपद कर्मधारय’ कहते हैं।
ऐसे और उदाहरण: पुरुषव्याघ्रः (व्याघ्र-सा पुरुष), नरसिंहः, मुखकमलम् (कमल-सा मुख), विद्यारत्नम्। ध्यान दीजिए, इनमें ‘इव’ लुप्त हो जाता है — विग्रह में वह लौट आता है। पाठ में इस पद का प्रयोजन भी यही है : लक्ष्मी केवल परिश्रमी को नहीं, सिंह जैसे निर्भय और पराक्रमी परिश्रमी को मिलती है।
प्र4.
उत्तमाः जनाः न परित्यजन्ति।
उत्तर

समस्तपदम् — उत्तमजनाः (हिन्दी — उत्तम श्रेणी के लोग।)

विग्रहः — उत्तमाः जनाः
समस्तपदम् — उत्तमजनाः
समासस्य नाम — कर्मधारयः (विशेषण-पूर्वपद कर्मधारय)
पाठ की पंक्ति — प्रारभ्य चोत्तमजनाः न परित्यजन्ति (श्लोक ५)
कर्मधारय की पहचान: यहाँ ‘उत्तमाः’ विशेषण है और ‘जनाः’ विशेष्य — दोनों एक ही वस्तु (उन्हीं लोगों) को कहते हैं और दोनों प्रथमा बहुवचन में हैं, अर्थात् समानाधिकरण हैं। जहाँ विशेषण और विशेष्य का समास हो, वहाँ कर्मधारय होता है — नीलकमलम् (नीलं कमलम्), महापुरुषः (महान् पुरुषः), पीताम्बरम् (पीतम् अम्बरम्)।
पाठ में तीन श्रेणियाँ: पाँचवें श्लोक में तीन प्रकार के लोग हैं — नीचैः (अधम), मध्याः (मध्यम) तथा उत्तमजनाः। तीनों में केवल अन्तिम पद समस्तपद है; पहले दो एक ही शब्द हैं। समास बनाने का अभ्यास इसी पर कराया गया है।
प्र5.
न विवेकः परमापदां पदम्।
उत्तर

समस्तपदम् — अविवेकः (हिन्दी — अविवेक, बिना सोचे-समझे काम करना।)

विग्रहः — न विवेकः
समस्तपदम् — अविवेकः
समासस्य नाम — नञ्-तत्पुरुषः
पाठ की पंक्ति — सहसा विदधीत न क्रियाम् अविवेकः परमापदां पदम् (श्लोक ८)
नञ्-तत्पुरुष का नियम: ‘न’ (नञ्) के साथ बने समास को नञ्-तत्पुरुष कहते हैं। नियम यह है — व्यञ्जन से आरम्भ होने वाले शब्द के आगे ‘न’ का ‘अ’ हो जाता है और स्वर से आरम्भ होने वाले के आगे ‘अन्’। जैसे — न विवेकः = विवेकः, न धर्मः = अधर्मः, न सत्यम् = असत्यम्; किन्तु न आदिः = अनादिः, न इच्छा = अनिच्छा, न अन्तः = अनन्तः। इसी पाठ में ‘अस्तेयम्’ (न स्तेयम्), ‘अक्रोधः’ (न क्रोधः) तथा ‘अवद्यम्’ (न वद्यम्) भी इसी प्रकार के समास हैं।
अर्थ पर ध्यान: ‘अविवेक’ का अर्थ केवल ‘विवेक न होना’ नहीं, विवेक का उलटा — जल्दबाज़ी में, बिना सोचे काम कर बैठना — है। नञ्-तत्पुरुष प्रायः अभाव नहीं, विरोध बताता है : ‘अधर्म’ धर्म का न होना नहीं, धर्म के विरुद्ध आचरण है। श्लोक इसीलिए उसे ‘परमापदां पदम्’ (विपत्तियों का सबसे बड़ा घर) कहता है।
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