प्र1.
“अधोलिखितां सारिणीं पठित्वा भारतीय-ज्ञान-परम्परा-विषये, कवीनां कालविषये च जानीत।” — सारिणीं पूरयत, तस्याः परिचयं च लिखत। एतेषु ग्रन्थेषु केषां श्लोकाः अस्मिन् पाठे आगताः ?
उत्तर
उत्तरम् — सारिणी अष्टानां प्रसिद्धानां संस्कृतग्रन्थानां नाम, भारतीय-ज्ञान-परम्परायां तेषां स्थानं, तेषां ग्रन्थकर्तारं च दर्शयति। एतेषु मनुस्मृतिः, श्रीमद्भगवद्गीता, नीतिशतकम्, पञ्चतन्त्रम्, मालविकाग्निमित्रम्, किरातार्जुनीयम् — इति षड्भ्यः ग्रन्थेभ्यः पाठस्य श्लोकाः गृहीताः सन्ति।
(हिन्दी — यह सारिणी आठ प्रसिद्ध संस्कृत ग्रन्थों का नाम, भारतीय ज्ञान-परम्परा में उनका स्थान और उनके रचयिता बताती है। इनमें से छह ग्रन्थों — मनुस्मृति, श्रीमद्भगवद्गीता, नीतिशतक, पञ्चतन्त्र, मालविकाग्निमित्र तथा किरातार्जुनीय — से इस पाठ के श्लोक लिए गए हैं।)
पुस्तक की सारिणी (पूर्ण रूप में, कालनिर्देशसहिता) —
| क्रमः | ग्रन्थस्य नाम | भारतीय-ज्ञान-परम्परा-स्थानम् | ग्रन्थकर्ता | अनुमानितः कालः तथा संक्षिप्तः परिचयः (जोड़ी गई जानकारी) |
|---|---|---|---|---|
| १. | रामायणम् | ऐतिहासिकं काव्यम् | महर्षिः वाल्मीकिः | आदिकाव्य; वाल्मीकि ‘आदिकवि’ कहलाते हैं। सात काण्ड, अनुष्टुप् छन्द। इसी से भारत की समस्त काव्य-परम्परा आरम्भ होती है। |
| २. | मनुस्मृतिः | धर्मशास्त्रीयग्रन्थः | मनुः | सबसे प्रसिद्ध स्मृति-ग्रन्थ; आचार, धर्म तथा समाज-व्यवस्था का विवेचन। पाठ के श्लोक १ (६.४६) तथा श्लोक २ (६.९२) इसी से हैं। |
| ३. | श्रीमद्भगवद्गीता | ज्ञानोपदेशः | महर्षिः व्यासः | महाभारत के भीष्मपर्व का अंश; १८ अध्याय, ७०० श्लोक। पाठ का श्लोक ३ (३.२१) कर्मयोग-अध्याय से है। |
| ४. | हठयोगप्रदीपिका | योग-दर्शनम् | स्वात्मारामः | हठयोग का प्रामाणिक ग्रन्थ — आसन, प्राणायाम, मुद्रा तथा समाधि का विवेचन। इससे पाठ में कोई श्लोक नहीं लिया गया। |
| ५. | नीतिशतकम् | नीति-साहित्यम् | भर्तृहरिः | भर्तृहरि के तीन शतकों (नीति, शृङ्गार, वैराग्य) में प्रथम। पाठ का श्लोक ५ (२७) इसी से — अधम, मध्यम तथा उत्तम जनों का प्रसिद्ध वर्गीकरण। |
| ६. | पञ्चतन्त्रम् | कथा-साहित्यम् | विष्णुशर्मा | पाँच तन्त्रों (मित्रभेदः, मित्रसम्प्राप्तिः, काकोलूकीयम्, लब्धप्रणाशम्, अपरीक्षितकारकम्) में नीति-कथाएँ। पाठ का श्लोक ६ (मित्रभेदः १४९) इसी से। |
| ७. | मालविकाग्निमित्रम् | रूपकम् | कालिदासः | कालिदास के तीन नाटकों में प्रथम (अन्य — विक्रमोर्वशीयम्, अभिज्ञानशाकुन्तलम्)। पाठ का श्लोक ७ (१.२) इसकी प्रस्तावना से। |
| ८. | किरातार्जुनीयम् | महाकाव्यम् | भारविः | अठारह सर्गों का महाकाव्य; अर्जुन तथा किरातरूपधारी शिव की कथा। ‘भारवेरर्थगौरवम्’ प्रसिद्ध है। पाठ का श्लोक ८ (२.३०) इसी से। |
यह सारिणी यहाँ क्यों दी गई: पाठ के आठ सुभाषित आठ अलग-अलग ग्रन्थों से आए हैं, और वे ग्रन्थ भी अलग-अलग विधाओं के हैं। सारिणी यही दिखाती है कि एक ही जीवन-मूल्य को भारतीय परम्परा ने कितने रूपों में कहा — धर्मशास्त्र ने नियम बनाकर, गीता ने उपदेश देकर, नीतिशतक ने वर्गीकरण करके, पञ्चतन्त्र ने कथा में पिरोकर, नाटक ने प्रस्तावना में रखकर और महाकाव्य ने वर्णन के बीच। इसीलिए ‘भारतीय-ज्ञान-परम्परा’ केवल ग्रन्थों की सूची नहीं, विधाओं का जाल है।
दो बातें ध्यान देने योग्य: (१) सारिणी का शीर्षक ‘कवीनां कालविषये च जानीत’ कहता है, पर तालिका में काल का कोई स्तम्भ नहीं है — इसलिए ऊपर की तालिका के अन्तिम स्तम्भ में वह जानकारी जोड़ दी गई है; विद्यार्थी पुस्तकालय या शिक्षक की सहायता से उसे और विस्तार दे सकते हैं। (२) सारिणी में रामायणम् तथा हठयोगप्रदीपिका हैं, जिनसे पाठ में कोई श्लोक नहीं लिया गया; और पाठ के चौथे श्लोक का स्रोत सुभाषितरत्नभाण्डागारः सारिणी में नहीं है — क्योंकि वह किसी एक कवि की रचना नहीं, अनेक कवियों के सुभाषितों का सङ्ग्रह-ग्रन्थ है।