यह सङ्ग्रह-परियोजना है। इसे दो चरणों में कीजिए — पहले पाठ के आठ सुभाषितों से जीवनमूल्य निकालिए, फिर हर मूल्य के लिए अन्यत्र से पाँच-पाँच सुभाषित ढूँढ़कर स्रोत सहित लिखिए।
चरण १ — पाठ के सुभाषितों में कौन-से जीवनमूल्य हैं —
| श्लोकः | जीवनमूल्यम् | हिन्दी में | स्रोतोग्रन्थः |
|---|---|---|---|
| १ | विवेकः, अहिंसा, स्वच्छता, सत्यवचनम्, मनःशुद्धिः | देखकर चलना, छानकर पीना, सत्य बोलना, मन से पवित्र आचरण | मनुस्मृतिः ६.४६ |
| २ | धर्माचरणम् (दश धर्मलक्षणानि) | धैर्य, क्षमा, संयम, अस्तेय, शौच, इन्द्रियनिग्रह, बुद्धि, विद्या, सत्य, अक्रोध | मनुस्मृतिः ६.९२ |
| ३ | आदर्शस्थापनम्, उत्तरदायित्वम् | बड़ों का आचरण ही समाज का उदाहरण बनता है | श्रीमद्भगवद्गीता ३.२१ |
| ४ | अभ्यासः, परिश्रमः | बार-बार करने से हर कठिन काम सधता है | सुभाषितरत्नभाण्डागारः |
| ५ | धैर्यम्, अध्यवसायः (लगन) | विघ्न आने पर भी काम न छोड़ना | नीतिशतकम् २७ |
| ६ | पुरुषार्थः, आत्मविश्वासः | भाग्य के भरोसे न बैठना, अपनी शक्ति से काम करना | पञ्चतन्त्रम् — मित्रभेदः १४९ |
| ७ | विवेचनशक्तिः, स्वतन्त्रचिन्तनम् | पुराने या नए के मोह में न पड़कर जाँचकर स्वीकार करना | मालविकाग्निमित्रम् १.२ |
| ८ | विमर्शः, दूरदर्शिता | जल्दबाज़ी से बचना, सोच-विचारकर काम करना | किरातार्जुनीयम् २.३० |
अच्छे सङ्ग्रह में क्या होना चाहिए —
- हर सुभाषित शुद्ध लिखा हो — विसर्ग, अनुस्वार तथा संयुक्ताक्षर सही हों।
- हर सुभाषित के नीचे सन्दर्भग्रन्थ का नाम कोष्ठक में हो, जैसा पाठ में ही छपा है।
- साथ में हिन्दी अर्थ की एक पंक्ति हो, ताकि सङ्ग्रह पढ़ने योग्य बने।
- एक ही ग्रन्थ से पाँचों न लीजिए; दो-तीन भिन्न ग्रन्थों से लीजिए — इससे परम्परा की व्यापकता दिखती है।
आदर्श उत्तरम् (नमूना सङ्ग्रह — ‘अभ्यासः तथा परिश्रमः’ इति जीवनमूल्यम्) —
१. अभ्यासेन क्रियाः सर्वाः अभ्यासात् सकलाः कलाः।
अभ्यासाद् ध्यानमौनादि किमभ्यासस्य दुष्करम्॥ (सुभाषितरत्नभाण्डागारः)
— अभ्यास से सब कुछ सधता है; अभ्यास के लिए कठिन कुछ नहीं।
२. उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः॥ (हितोपदेशः — प्रस्तावना)
— काम उद्यम से सिद्ध होते हैं, केवल मन की इच्छाओं से नहीं।
३. उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः दैवेन देयमिति कापुरुषा वदन्ति।
दैवं निहत्य कुरु पौरुषमात्मशक्त्या यत्ने कृते यदि न सिध्यति कोऽत्र दोषः॥ (पञ्चतन्त्रम् — मित्रभेदः)
— लक्ष्मी उद्यमी के पास स्वयं आती है; भाग्य को हराकर पुरुषार्थ करो।
४. प्रारभ्यते न खलु विघ्नभयेन नीचैः प्रारभ्य विघ्नविहता विरमन्ति मध्याः।
विघ्नैः पुनः पुनरपि प्रतिहन्यमानाः प्रारभ्य चोत्तमजनाः न परित्यजन्ति॥ (नीतिशतकम् — २७)
— उत्तम लोग विघ्नों की बार-बार चोट खाकर भी काम नहीं छोड़ते।
५. काकचेष्टा बकोध्यानं श्वाननिद्रा तथैव च।
अल्पाहारी गृहत्यागी विद्यार्थिनः पञ्चलक्षणम्॥ (चाणक्यनीतिः)
— कौए-सी चेष्टा, बगुले-सा ध्यान, कुत्ते-सी हल्की नींद — ये विद्यार्थी के लक्षण हैं।
(इसी ढंग से शेष चार मूल्यों के लिए भी पाँच-पाँच सुभाषित एकत्र कीजिए —)
| जीवनमूल्यम् | सङ्ग्रह के लिए सुझाए गए सुभाषितों के आरम्भिक पद | सन्दर्भग्रन्थाः |
|---|---|---|
| सत्यम् तथा वाक्संयमः | सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात् · सत्यमेव जयते नानृतम् · सत्यपूतां वदेत् वाचम् · वाणी रसवती यस्य · प्रियवाक्यप्रदानेन सर्वे तुष्यन्ति जन्तवः | मनुस्मृतिः · मुण्डकोपनिषद् · मनुस्मृतिः · नीतिशतकम् · हितोपदेशः |
| विवेकः तथा दूरदर्शिता | सहसा विदधीत न क्रियाम् · पुराणमित्येव न साधु सर्वम् · अनागतविधाता च प्रत्युत्पन्नमतिस्तथा · सर्वे गुणाः काञ्चनमाश्रयन्ति · परोक्षे कार्यहन्तारं प्रत्यक्षे प्रियवादिनम् | किरातार्जुनीयम् · मालविकाग्निमित्रम् · पञ्चतन्त्रम् · नीतिशतकम् · चाणक्यनीतिः |
| धर्मः तथा सदाचारः | धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयम् · धर्म एव हतो हन्ति · अहिंसा परमो धर्मः · न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते · आचारः परमो धर्मः | मनुस्मृतिः · महाभारतम् · महाभारतम् · श्रीमद्भगवद्गीता · मनुस्मृतिः |
| आदर्शः तथा उत्तरदायित्वम् | यद्यदाचरति श्रेष्ठः · महाजनो येन गतः स पन्थाः · परोपकाराय फलन्ति वृक्षाः · विद्या ददाति विनयम् · गुणाः गुणज्ञेषु गुणा भवन्ति | श्रीमद्भगवद्गीता · महाभारतम् · सुभाषितम् · हितोपदेशः · हितोपदेशः |