शारदा अध्याय 6 यस्तु क्रियावान् मनुजः स विद्वान्

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
पाठे आगतेषु सुभाषितेषु कानि-कानि जीवनमूल्यानि सन्ति ? तानि जीवनमूल्यानि अधिकृत्य पञ्च पञ्च सुभाषितानि सङ्गृह्णीत। तेषां सन्दर्भग्रन्थानां नामानि अपि लिखत।
उत्तर

यह सङ्ग्रह-परियोजना है। इसे दो चरणों में कीजिए — पहले पाठ के आठ सुभाषितों से जीवनमूल्य निकालिए, फिर हर मूल्य के लिए अन्यत्र से पाँच-पाँच सुभाषित ढूँढ़कर स्रोत सहित लिखिए।

चरण १ — पाठ के सुभाषितों में कौन-से जीवनमूल्य हैं —

श्लोकःजीवनमूल्यम्हिन्दी मेंस्रोतोग्रन्थः
विवेकः, अहिंसा, स्वच्छता, सत्यवचनम्, मनःशुद्धिःदेखकर चलना, छानकर पीना, सत्य बोलना, मन से पवित्र आचरणमनुस्मृतिः ६.४६
धर्माचरणम् (दश धर्मलक्षणानि)धैर्य, क्षमा, संयम, अस्तेय, शौच, इन्द्रियनिग्रह, बुद्धि, विद्या, सत्य, अक्रोधमनुस्मृतिः ६.९२
आदर्शस्थापनम्, उत्तरदायित्वम्बड़ों का आचरण ही समाज का उदाहरण बनता हैश्रीमद्भगवद्गीता ३.२१
अभ्यासः, परिश्रमःबार-बार करने से हर कठिन काम सधता हैसुभाषितरत्नभाण्डागारः
धैर्यम्, अध्यवसायः (लगन)विघ्न आने पर भी काम न छोड़नानीतिशतकम् २७
पुरुषार्थः, आत्मविश्वासःभाग्य के भरोसे न बैठना, अपनी शक्ति से काम करनापञ्चतन्त्रम् — मित्रभेदः १४९
विवेचनशक्तिः, स्वतन्त्रचिन्तनम्पुराने या नए के मोह में न पड़कर जाँचकर स्वीकार करनामालविकाग्निमित्रम् १.२
विमर्शः, दूरदर्शिताजल्दबाज़ी से बचना, सोच-विचारकर काम करनाकिरातार्जुनीयम् २.३०

अच्छे सङ्ग्रह में क्या होना चाहिए —

  • हर सुभाषित शुद्ध लिखा हो — विसर्ग, अनुस्वार तथा संयुक्ताक्षर सही हों।
  • हर सुभाषित के नीचे सन्दर्भग्रन्थ का नाम कोष्ठक में हो, जैसा पाठ में ही छपा है।
  • साथ में हिन्दी अर्थ की एक पंक्ति हो, ताकि सङ्ग्रह पढ़ने योग्य बने।
  • एक ही ग्रन्थ से पाँचों न लीजिए; दो-तीन भिन्न ग्रन्थों से लीजिए — इससे परम्परा की व्यापकता दिखती है।

आदर्श उत्तरम् (नमूना सङ्ग्रह — ‘अभ्यासः तथा परिश्रमः’ इति जीवनमूल्यम्) —

॥ अभ्यासः परिश्रमश्च ॥

१. अभ्यासेन क्रियाः सर्वाः अभ्यासात् सकलाः कलाः।
   अभ्यासाद् ध्यानमौनादि किमभ्यासस्य दुष्करम्॥  (सुभाषितरत्नभाण्डागारः)
   — अभ्यास से सब कुछ सधता है; अभ्यास के लिए कठिन कुछ नहीं।

२. उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।
   न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः॥  (हितोपदेशः — प्रस्तावना)
   — काम उद्यम से सिद्ध होते हैं, केवल मन की इच्छाओं से नहीं।

३. उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः दैवेन देयमिति कापुरुषा वदन्ति।
   दैवं निहत्य कुरु पौरुषमात्मशक्त्या यत्ने कृते यदि न सिध्यति कोऽत्र दोषः॥  (पञ्चतन्त्रम् — मित्रभेदः)
   — लक्ष्मी उद्यमी के पास स्वयं आती है; भाग्य को हराकर पुरुषार्थ करो।

४. प्रारभ्यते न खलु विघ्नभयेन नीचैः प्रारभ्य विघ्नविहता विरमन्ति मध्याः।
   विघ्नैः पुनः पुनरपि प्रतिहन्यमानाः प्रारभ्य चोत्तमजनाः न परित्यजन्ति॥  (नीतिशतकम् — २७)
   — उत्तम लोग विघ्नों की बार-बार चोट खाकर भी काम नहीं छोड़ते।

५. काकचेष्टा बकोध्यानं श्वाननिद्रा तथैव च।
   अल्पाहारी गृहत्यागी विद्यार्थिनः पञ्चलक्षणम्॥  (चाणक्यनीतिः)
   — कौए-सी चेष्टा, बगुले-सा ध्यान, कुत्ते-सी हल्की नींद — ये विद्यार्थी के लक्षण हैं।

(इसी ढंग से शेष चार मूल्यों के लिए भी पाँच-पाँच सुभाषित एकत्र कीजिए —)

जीवनमूल्यम्सङ्ग्रह के लिए सुझाए गए सुभाषितों के आरम्भिक पदसन्दर्भग्रन्थाः
सत्यम् तथा वाक्संयमःसत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात् · सत्यमेव जयते नानृतम् · सत्यपूतां वदेत् वाचम् · वाणी रसवती यस्य · प्रियवाक्यप्रदानेन सर्वे तुष्यन्ति जन्तवःमनुस्मृतिः · मुण्डकोपनिषद् · मनुस्मृतिः · नीतिशतकम् · हितोपदेशः
विवेकः तथा दूरदर्शितासहसा विदधीत न क्रियाम् · पुराणमित्येव न साधु सर्वम् · अनागतविधाता च प्रत्युत्पन्नमतिस्तथा · सर्वे गुणाः काञ्चनमाश्रयन्ति · परोक्षे कार्यहन्तारं प्रत्यक्षे प्रियवादिनम्किरातार्जुनीयम् · मालविकाग्निमित्रम् · पञ्चतन्त्रम् · नीतिशतकम् · चाणक्यनीतिः
धर्मः तथा सदाचारःधृतिः क्षमा दमोऽस्तेयम् · धर्म एव हतो हन्ति · अहिंसा परमो धर्मः · न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते · आचारः परमो धर्मःमनुस्मृतिः · महाभारतम् · महाभारतम् · श्रीमद्भगवद्गीता · मनुस्मृतिः
आदर्शः तथा उत्तरदायित्वम्यद्यदाचरति श्रेष्ठः · महाजनो येन गतः स पन्थाः · परोपकाराय फलन्ति वृक्षाः · विद्या ददाति विनयम् · गुणाः गुणज्ञेषु गुणा भवन्तिश्रीमद्भगवद्गीता · महाभारतम् · सुभाषितम् · हितोपदेशः · हितोपदेशः
यह कार्य क्यों दिया गया: सुभाषित तब तक ‘पाठ’ रहता है जब तक वह अकेला रहे; जब उसी भाव के पाँच सुभाषित एक साथ रखे जाएँ, तब वह जीवनमूल्य बन जाता है। इसी से यह भी दिखता है कि एक ही बात को अलग-अलग कवियों ने अलग-अलग चित्रों से कहा — कोई सिंह का उदाहरण देता है, कोई बगुले का, कोई वृक्ष का। इसीलिए पुस्तक ‘सन्दर्भग्रन्थानां नामानि अपि लिखत’ पर बल देती है : सुभाषित के साथ उसका घर भी जानना चाहिए।
कार्य की विधि: (१) एक अलग ‘सुभाषित-वही’ बनाइए और हर पृष्ठ पर एक मूल्य रखिए। (२) सुभाषित पुस्तकालय से — ‘सुभाषितरत्नभाण्डागारः’, ‘चाणक्यनीतिः’, ‘हितोपदेशः’, ‘नीतिशतकम्’ — या शिक्षक की सहायता से लीजिए; इंटरनेट से लें तो दो स्रोतों से मिलाकर जाँच लीजिए (यही तो सातवाँ श्लोक सिखाता है — ‘सन्तः परीक्ष्य अन्यतरद् भजन्ते’)। (३) हर सुभाषित को कण्ठस्थ कीजिए; लिखा हुआ सङ्ग्रह भूल जाता है, कण्ठस्थ किया हुआ काम आता है।
प्र2.
दृष्टिपूतं, वस्त्रपूतं, सत्यपूतं च आचरणं कथं भवेत् इति विषये स्वस्य अनुभवं कक्षायां कथयत।
उत्तर

यह अनुभव-कथन (भाषण) का कार्य है — कक्षा में खड़े होकर अपने जीवन का कोई सच्चा प्रसंग सुनाना है जिसमें ‘देखकर चलना’, ‘छानकर पीना’ या ‘सत्य बोलना’ काम आया हो। इसका उत्तर कॉपी में नहीं, बोलकर दिया जाता है; नीचे विधि और एक नमूना दिया है, जिसे अपने अनुभव से बदलकर बोलिए।

अच्छे उत्तर में ये बातें अवश्य हों —

  1. तीनों बिन्दुओं में से कम से कम दो पर अपनी बात हो — केवल एक पर नहीं।
  2. बात घटना के रूप में हो — कब, कहाँ, क्या हुआ। सामान्य उपदेश (‘हमें सदा सच बोलना चाहिए’) से बचिए।
  3. अन्त में उसे श्लोक की पंक्ति से जोड़िए — ‘अतः एव मनुः अवदत् — दृष्टिपूतं न्यसेत् पादम्’।
  4. भाषा सरल संस्कृत हो; कठिन वाक्य की अपेक्षा शुद्ध छोटा वाक्य अच्छा है।
बिन्दुःकिस प्रकार का अनुभव सुनाया जा सकता हैश्लोक से जोड़
दृष्टिपूतम्सड़क पार करते समय देखकर चलना; सीढ़ी उतरते समय ध्यान रखना; रास्ते में चींटियों की पंक्ति देखकर बचाकर पैर रखना; अँधेरे में टॉर्च जलाकर चलना।दृष्टिपूतं न्यसेत् पादम्
वस्त्रपूतम्यात्रा में खुला जल न पीना; वर्षा-ऋतु में उबालकर या छानकर जल पीना; परिवार में किसी के बीमार पड़ने पर जल की शुद्धि का ध्यान रखना।वस्त्रपूतं जलं पिबेत्
सत्यपूतम्कोई वस्तु टूट जाने पर स्वयं सच बता देना; परीक्षा में नक़ल न करना; सुनी-सुनाई बात बिना जाँचे आगे न फैलाना।सत्यपूतां वदेत् वाचम्

आदर्श उत्तरम् (नमूना अनुभव-कथनम्) —

माननीयाः अध्यापिकाः, प्रियाः सहपाठिनः, सर्वेभ्यः नमस्कारः।

अद्य अहं स्वस्य त्रीणि लघूनि अनुभवानि कथयितुम् इच्छामि।

प्रथमम् — दृष्टिपूतम्।
एकदा अहं विद्यालयात् गृहं गच्छन् आसम्। मार्गे पिपीलिकानां पङ्क्तिः आसीत्।
अहं दृष्ट्वा पादं पार्श्वे न्यस्तवान्। मम मित्रं तु न दृष्टवान्, अतः सः स्खलितः।
तदा अहम् अजानाम् — ‘दृष्टिपूतं न्यसेत् पादम्’ इति केवलं श्लोकः न, अपितु प्रतिदिनस्य नियमः अस्ति।

द्वितीयम् — वस्त्रपूतम्।
गतवर्षे वर्षाकाले अस्माकं ग्रामे बहवः जनाः रुग्णाः अभवन्।
वैद्यः अवदत् — ‘अशुद्धं जलं कारणम्’ इति। ततः प्रभृति वयं जलं वस्त्रेण गालयित्वा,
क्वथयित्वा च पिबामः। अद्य अस्माकं गृहे कोऽपि न रुग्णः भवति।

तृतीयम् — सत्यपूतम्।
एकदा क्रीडन् अहं कक्षायाः कुण्डम् अभञ्जम्। कोऽपि न अपश्यत्।
अहं भीतः आसम्, तथापि अध्यापिकायै सत्यम् अकथयम्।
अध्यापिका न अकुप्यत्, प्रत्युत अवदत् — ‘सत्यं वदन्तं छात्रम् अहं सर्वदा विश्वसिमि’ इति।
तस्मिन् दिने अहम् अजानाम् यत् सत्येन भयं न वर्धते, अपितु न्यूनं भवति।

एतैः त्रिभिः अनुभवैः अहं शिक्षितवान् — दृष्टिः, वस्त्रं, सत्यं च त्रीणि परिस्रावणानि सन्ति,
किन्तु चतुर्थं परिस्रावणं सर्वेषाम् उपरि अस्ति — मनः। अतः एव उक्तम् — ‘मनःपूतं समाचरेत्’।

एतावत् एव। धन्यवादः।

(हिन्दी अनुवाद —) आदरणीय अध्यापिका जी, प्रिय सहपाठियो, सबको नमस्कार। आज मैं अपने तीन छोटे अनुभव सुनाना चाहता/चाहती हूँ। पहला — दृष्टिपूत। एक दिन मैं विद्यालय से घर जा रहा था। रास्ते में चींटियों की एक पंक्ति थी। मैंने देखकर पैर बग़ल में रखा; मेरे मित्र ने नहीं देखा, इसलिए वह फिसल गया। तब मैंने जाना कि ‘दृष्टिपूतं न्यसेत् पादम्’ केवल श्लोक नहीं, रोज़ का नियम है। दूसरा — वस्त्रपूत। पिछले वर्ष वर्षा के दिनों में हमारे गाँव में बहुत लोग बीमार पड़े। वैद्य ने कहा कि कारण अशुद्ध जल है। तब से हम जल छानकर और उबालकर पीते हैं; अब हमारे घर में कोई बीमार नहीं पड़ता। तीसरा — सत्यपूत। एक बार खेलते हुए मैंने कक्षा का गमला तोड़ दिया। किसी ने नहीं देखा था। मैं डरा हुआ था, फिर भी मैंने अध्यापिका को सच बता दिया। वे नाराज़ नहीं हुईं, बल्कि बोलीं — ‘सच बोलने वाले विद्यार्थी पर मुझे हमेशा भरोसा रहता है।’ उस दिन मैंने जाना कि सच बोलने से डर बढ़ता नहीं, घटता है। इन तीन अनुभवों से मैंने सीखा कि दृष्टि, वस्त्र और सत्य — ये तीन छन्नियाँ हैं, पर चौथी छन्नी सबसे ऊपर है — मन। इसीलिए कहा गया है — ‘मनःपूतं समाचरेत्’। बस इतना ही। धन्यवाद।

यह नमूना अच्छा उत्तर क्यों है: (१) तीनों बिन्दुओं पर अलग-अलग घटना है, उपदेश नहीं — और घटना ही सुनने वाले को याद रहती है। (२) हर घटना के अन्त में एक सीख है, जो श्लोक की पंक्ति से जुड़ती है। (३) अन्त में चौथी छन्नी ‘मनः’ जोड़कर पूरा भाषण पाठ के शीर्षक पर आ टिकता है — इससे बात गोल होकर पूरी हो जाती है। (४) वाक्य छोटे हैं, इसलिए बोलते समय प्रवाह नहीं टूटेगा और व्याकरण की भूल की सम्भावना भी कम रहेगी।
प्रस्तुति की युक्तियाँ: (१) अपना सच्चा अनुभव सुनाइए — गढ़ी हुई कहानी सुनने वाले को तुरन्त पकड़ में आ जाती है। (२) दो-तीन मिनट पर्याप्त हैं। (३) आरम्भ का सम्बोधन और अन्त का ‘धन्यवादः’ न भूलिए। (४) संस्कृत में जो वाक्य कठिन लगे, उसे सरल कर लीजिए — ‘अहं स्खलितः’ के स्थान पर ‘सः पतितः’ भी चलेगा। (५) एक बार घर पर बोलकर अभ्यास कीजिए और किसी से केवल यह पूछिए — ‘कहाँ अटका ?’
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