कक्षा ९ संस्कृत अध्याय 5 एषा सा कृतकबुद्धिः मानवबुद्धेः सहकरी के लिए एनसीईआरटी समाधान

अद्यतन 2026-09-19

इस अध्याय के बारे में

यह क्या है — ‘धातुरूपाणि’ शारदा का पाँचवाँ और अन्तिम परिशिष्ट है (छपे पृष्ठ 199–206)। परिशिष्ट पाठ नहीं होता — इसमें न श्लोक हैं, न कथा, न अभ्यासाद् जायते सिद्धिः जैसा प्रश्न-खण्ड। यहाँ केवल तिङन्त (क्रिया) रूपों की तालिकाएँ हैं, जिन्हें देखकर छात्र अपना लिखा हुआ रूप मिलाता है। पाँच लकार, पाँच धातु — पुस्तक जिन पाँच लकारों को लेती है वे हैं लट् (वर्तमान), लृट् (भविष्यत्), लङ् (भूत — अनद्यतन), लोट् (आज्ञा/प्रार्थना) और विधिलिङ् (चाहिए/यदि — विधि, निमन्त्रण, सम्भावना)। लिट्, लुङ्, लृङ्, आशीर्लिङ् यहाँ नहीं हैं। धातुएँ पाँच हैं — पठ् (परस्मैपदी), वृधु और लभ् (आत्मनेपदी), तथा शीङ् और भुज् (विशिष्ट आत्मनेपदी)। पुस्तक का क्रम — पहले पृष्ठ 199 पर णिच्-प्रत्ययान्त (प्रेरणार्थक) प्रयोग — ‘पठति’ के सामने ‘पाठयति’ रखकर दिखाया गया है कि प्रेरणा के अर्थ में रूप कैसे बदलता है। फिर परस्मैपदिधातूनां पञ्चस

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पदअर्थउदाहरणटिप्पणी
धातुःक्रिया का मूल रूप, जिससे सब क्रियापद बनते हैंपठ्, वृधु, लभ्, शीङ्, भुज्तालिका के शीर्षक में यही रूप छपा है
तिङन्तम्तिङ् प्रत्यय लगने पर बना क्रियापदपठति, वर्धते, भुङ्क्तेसुबन्त = नाम-पद, तिङन्त = क्रिया-पद
लकारःकाल तथा अर्थ बताने वाला दस प्रत्यय-समूहों में से एकलट्, लृट्, लङ्, लोट्, विधिलिङ्परिशिष्ट में केवल ये पाँच हैं
लट्-लकारःवर्तमान कालपठति = पढ़ता है‘ल’ + ‘ट्’; ट् इत् है
लृट्-लकारःभविष्यत् काल — ‘स्य’ चिह्नपठिष्यति = पढ़ेगावर्धिष्यते, लप्स्यते, भोक्ष्यते
लङ्-लकारःअनद्यतन भूत काल — आगे ‘अ’ (अट् आगम)अपठत् = पढ़ाअवर्धत, अशेत, अभुङ्क्त
लोट्-लकारःआज्ञा, प्रार्थना, अनुमतिपठतु = पढ़े/पढ़ोपठानि, वर्धै, भुनजै
विधिलिङ्-लकारःचाहिए, यदि, सम्भावना, विधिपठेत् = पढ़ना चाहिएवर्धेत, शयीत, भुञ्जीत
पुरुषःप्रथम (वह), मध्यम (तू), उत्तम (मैं)पठति · पठसि · पठामिसंस्कृत का प्रथमपुरुष = अंग्रेज़ी third person
वचनम्एक, दो, बहुतपठति · पठतः · पठन्तिसंस्कृत में द्विवचन अनिवार्य है
परस्मैपदम्जिसका फल कर्ता से भिन्न को मिलेपठति, गच्छति, लिखतिप्रत्यय — ति, तः, अन्ति…
आत्मनेपदम्जिसका फल कर्ता को ही मिलेवर्धते, लभते, शेतेप्रत्यय — ते, एते, अन्ते…
णिच्-प्रत्ययःप्रेरणा (कराना) का अर्थ देने वाला प्रत्ययपठ् + णिच् = पठि → पाठयतिपृष्ठ 199 की पहली तालिका इसी की है
प्रेरणार्थः‘करना’ के स्थान पर ‘कराना’ अर्थपाठयति = पढ़ाता हैप्रेरक कर्ता प्रथमा में, प्रेर्य द्वितीया में
अट् आगमःलङ् में धातु के आगे जुड़ने वाला ‘अ’अ + पठत् = अपठत्यही लङ् की सबसे पक्की पहचान है
तातङ् आदेशःलोट् में ‘तु/हि’ के स्थान पर विकल्प से ‘तात्’पठतु / पठतात्; पठ / पठतात्आशीर्वाद-सा गम्भीर स्वर देता है
श्नम् विकरणःरुधादिगण में धातु के भीतर घुसने वाला ‘न्’भुज् → भुनज् / भुञ्ज्इसी से भुनक्ति–भुङ्क्ते–भुञ्जते बनते हैं
सेट्–अनिट्लृट् आदि में ‘इ’ आगम लगे या न लगेवर्धिष्यते (सेट्), लप्स्यते (अनिट्)इसी से वर्धिष्यते पर लप्स्यते बनता है
  1. धातुरूपाणि
  2. णिच्-प्रत्ययान्तानां प्रयोगः (प्रेरणार्थे)
  3. परस्मैपदिधातूनां पञ्चसु लकारेषु प्रयोगाः
  4. आत्मनेपदीनां धातूनां पञ्चसु लकारेषु प्रयोगाः
  5. ‘वृधु’ तथा ‘लभ्’
  6. ‘वृधु’ तथा ‘लभ्’
  7. विशिष्टधातवः (आत्मनेपदिनः)
  8. विशिष्टधातवः (आत्मनेपदिनः)
  9. पूरे परिशिष्ट का सार
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