कक्षा ९ संस्कृत अध्याय 4 न खलु वयस्तेजसो हेतुः के लिए एनसीईआरटी समाधान
अद्यतन 2026-09-19
इस अध्याय के बारे में
यह क्या है — ‘शब्दरूपाणि’ शारदा का चौथा परिशिष्ट है (पृष्ठ 184–198)। परिशिष्ट पाठ नहीं होता — उसमें न श्लोक होते हैं, न कथा, न अभ्यासाद् जायते सिद्धिः जैसा प्रश्न-खण्ड। यहाँ केवल सुबन्त रूपों की तालिकाएँ हैं, जिन्हें देखकर छात्र अपना लिखा हुआ रूप मिलाता है। केवल हलन्त शब्द — बड़ी बात यह है कि यह परिशिष्ट अजन्त (स्वरान्त) शब्द जैसे बालक, लता, मुनि, साधु, पितृ नहीं देता । वे कक्षा ६–८ में आ चुके हैं। यहाँ केवल व्यञ्जनान्त/हलन्त शब्द हैं — न्, स्, द्, ज्, च्, त्, व्, श्, ष् में समाप्त होने वाले — क्योंकि इन्हीं में विद्यार्थी सबसे अधिक भूल करता है। पुस्तक का क्रम — पहले पुंलिङ्गशब्दाः (पृष्ठ 184–188, दस शब्द), फिर स्त्रीलिङ्गरूपाणि (पृष्ठ 189–192, आठ शब्द), फिर नपुंसकलिङ्गरूपाणि (पृष्ठ 193–197, दस शब्द), और अन्त में पृष्ठ 198 पर सुप्-प्रत्ययाः की तालिका। हर तालिका में सात विभक्तियाँ तथा सम्बो
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| पद | अर्थ | उदाहरण | टिप्पणी |
|---|---|---|---|
| सुबन्त | सुप् प्रत्यय लगने पर बना पद; वाक्य में प्रयोग-योग्य शब्द | बालकः, ब्रह्मणा, वाचि | केवल प्रातिपदिक (ब्रह्मन्, वाच्) वाक्य में नहीं आ सकता |
| प्रातिपदिक | अर्थवान् मूल शब्द, प्रत्यय लगने से पहले का रूप | ब्रह्मन्, वाच्, मनस् | तालिका के शीर्षक में यही रूप छपा है |
| विभक्तिः | सात कारक-सूचक प्रत्यय-समूह (प्रथमा से सप्तमी) | कर्तरि प्रथमा, कर्मणि द्वितीया | पुस्तक सम्बोधन को आठवीं पंक्ति में अलग रखती है |
| वचनम् | संख्या — एक, दो, बहुत | एकवचनम्, द्विवचनम्, बहुवचनम् | संस्कृत में द्विवचन अनिवार्य है, हिन्दी में नहीं |
| सुप्-प्रत्ययाः | सु, औ, जस्… से लेकर सुप् तक इक्कीस प्रत्यय | सु + ब्रह्मन् → ब्रह्मा | पृष्ठ 198 की अन्तिम तालिका इन्हीं की है |
| हलन्त/व्यञ्जनान्त | जिसका अन्तिम वर्ण व्यञ्जन हो | वाच्, सुहृद्, मनस् | यह पूरा परिशिष्ट इन्हीं शब्दों का है |
| बलवत् अङ्गम् | लम्बा (गुण/वृद्धि/नुम् वाला) अङ्ग | ब्रह्माण्, विद्वांस्, पुमांस् | प्रथमा तीनों वचन + द्वितीया एक./द्वि. |
| मध्यमम् अङ्गम् | व्यञ्जनादि प्रत्यय (भ्याम्, भिस्, भ्यस्, सु) से पहले का अङ्ग | ब्रह्म-, विद्वद्-, जगद्- | यहीं जश्त्व दिखता है |
| दुर्बलम् अङ्गम् | स्वरादि प्रत्ययों से पहले का छोटा अङ्ग | ब्रह्मण्, विदुष्, पथ् | द्वितीया बहुवचन से आगे प्रायः यही |
| जश्त्वम् | पदान्त कठोर व्यञ्जन का मृदु (तृतीय) वर्ण हो जाना | वाच् → वाग्, सुहृद् में द् | झलां जशोऽन्ते |
| चर्त्वम् | पदान्त व्यञ्जन का कठोर (प्रथम) वर्ण हो जाना | वाच् → वाक्, सुहृद् → सुहृत् | खरि च — इसी से दो-दो रूप छपते हैं |
| णत्वम् | र्/ष् के बाद न् का ण् हो जाना | ब्रह्मणा, कर्मणि, चर्माणि | रषाभ्यां नो णः |
| नुम् आगमः | नपुंसक बहुवचन तथा कुछ रूपों में जुड़ने वाला न्/ं | जगन्ति, नामानि, मनांसि | नपुंसकस्य झलचः |
| रुत्वम्-उत्वम् | अस् के स् का र् और फिर उ होकर ‘ओ’ बनना | मनस् + भिस् → मनोभिः | तपोवन, पयोधर में भी यही |
| षत्वम् | इण्/कु के बाद स् का ष् होना | वाच् + सु → वाक्षु, दिक्षु | सप्तमी बहुवचन में सर्वाधिक दिखता है |
अभ्यास
- शब्दरूपाणि
- सुप्-प्रत्ययाः
- ‘न्’ कारान्तः पुंलिङ्गः
- ‘स्’ कारान्तः पुंलिङ्गः
- ‘द्’ तथा ‘ज्’ कारान्तः पुंलिङ्गः
- स्त्रीलिङ्गरूपाणि
- स्त्रीलिङ्गरूपाणि
- नपुंसकलिङ्गरूपाणि
- नपुंसकलिङ्गरूपाणि