यह स्वाध्याय तथा प्रस्तुति का कार्य है। इसका उत्तर पुस्तकालय से एक पुस्तक उठाकर, एक कथा पढ़कर और उसका संस्कृत सारांश कक्षा में सुनाकर दिया जाता है। नीचे विधि, अच्छे उत्तर की कसौटी और एक पूरा आदर्श उत्तर दिया है, जिसे देखकर आप अपनी चुनी हुई कथा का सारांश लिख सकते हैं।
विधि —
- कथा चुनिए: छोटी और पात्र-कम कथा चुनिए (३–४ पात्र पर्याप्त हैं)। पहली बार में ‘सिंहः शशकश्च’, ‘बकः नकुलश्च’, ‘वानरः मकरश्च’ जैसी कथाएँ सरल पड़ती हैं।
- दो बार पढ़िए: पहली बार केवल कथा जानने के लिए, दूसरी बार कठिन पदों को रेखांकित करने के लिए। शब्दकोश से उन्हीं का अर्थ देखिए।
- घटनाओं की सूची बनाइए: पाँच से सात वाक्यों में — आरम्भ, समस्या, उपाय, मोड़, अन्त। सारांश कहानी का दोहराव नहीं, उसका ढाँचा है।
- संस्कृत में लिखिए: छोटे वाक्य रखिए और भूतकाल के लिए क्तवतु रूप प्रयोग कीजिए (गतवान्, दृष्टवान्, उक्तवान्) — यही इस पाठ का व्याकरण-बिन्दु भी है।
- अन्त में नीति लिखिए: कथा का ‘नीतिवाक्यम्’ अवश्य जोड़िए, यदि हो सके तो मूल श्लोक के साथ।
- सुनाइए: धीरे, स्पष्ट, संयुक्ताक्षरों को पूरा बोलते हुए। पहले एक बार मित्र के सामने अभ्यास कीजिए।
अच्छे सारांश में ये पाँच बातें अवश्य आएँ — (१) कथा का नाम तथा वह किस तन्त्र से है, (२) पात्रों का एक-वाक्य परिचय, (३) घटनाक्रम सही क्रम में, (४) कथा का मोड़ (turning point) स्पष्ट, (५) नीतिवाक्य।
आदर्श उत्तरम् (नमूना सारांश) — ‘बकाः नकुलश्च’ (काकोलूकीयम् इति तृतीयतन्त्रात्)
कस्मिंश्चिद् वने एकः महान् न्यग्रोधवृक्षः आसीत्। तस्मिन् वृक्षे बहवः बकाः निवसन्ति स्म।
तस्य एव वृक्षस्य कोटरे एकः कृष्णसर्पः वसति स्म। सः प्रतिदिनं बकानां शिशून् खादति स्म।
बकाः अतीव दुःखिताः अभवन्। तदा एकः वृद्धः बकः उपायम् उक्तवान् —
‘अस्मात् वृक्षात् दूरे नकुलस्य बिलम् अस्ति। धीवरस्य गृहात् मत्स्यान् आनीय नकुलबिलात् आरभ्य सर्पस्य कोटरपर्यन्तं मार्गे स्थापयत।
नकुलः मत्स्यान् खादन् खादन् आगमिष्यति, सर्पं च हनिष्यति’ इति।
बकाः तथैव कृतवन्तः। नकुलः मत्स्यमार्गेण आगत्य कृष्णसर्पं हतवान्। बकाः प्रहृष्टाः अभवन्।
किन्तु ततः परं सः नकुलः वृक्षम् आरुह्य बकानां शिशून् अपि खादितवान्, अनन्तरं सर्वान् बकान् अपि।
मूर्खाः बकाः पश्यन्तः एव नष्टाः। यतः तैः उपायः चिन्तितः, किन्तु अपायः न चिन्तितः।
अत एव उक्तम् —
उपायं चिन्तयेत् प्राज्ञस्तथापायं च चिन्तयेत्।
पश्यतो बकमूर्खस्य नकुलेन हता बकाः॥
(हिन्दी अनुवाद —) किसी वन में एक बड़ा बरगद का पेड़ था, जिस पर बहुत-से बगुले रहते थे। उसी पेड़ के खोखल में एक काला साँप रहता था, जो रोज़ बगुलों के बच्चों को खा जाता था। बगुले बहुत दुखी हुए। तब एक बूढ़े बगुले ने उपाय बताया — ‘इस पेड़ से दूर एक नेवले का बिल है। मछुए के घर से मछलियाँ लाकर नेवले के बिल से लेकर साँप के खोखल तक रास्ते में रख दो। नेवला मछलियाँ खाता-खाता आएगा और साँप को मार देगा।’ बगुलों ने वैसा ही किया। नेवला मछलियों के रास्ते से आया और उसने काले साँप को मार डाला। बगुले प्रसन्न हुए। परन्तु उसके बाद वही नेवला पेड़ पर चढ़कर बगुलों के बच्चों को भी खा गया और फिर सारे बगुलों को भी। मूर्ख बगुले देखते ही रह गए और नष्ट हो गए — क्योंकि उन्होंने उपाय तो सोचा, पर अपाय नहीं सोचा। इसीलिए कहा गया है — ‘बुद्धिमान् उपाय भी सोचे और उससे आने वाली हानि भी सोचे; उस मूर्ख बगुले के देखते-देखते ही नेवले ने सब बगुलों को मार डाला।’