शारदा अध्याय 7 यस्तु क्रियावान् मनुजः स विद्वान्

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
पुस्तकालयात् पञ्चतन्त्रस्य पुस्तकं स्वीकृत्य एकां कथां पठत। तस्याः कथायाः सारांशं संस्कृतेन लिखित्वा कक्षायां श्रावयत।
उत्तर

यह स्वाध्याय तथा प्रस्तुति का कार्य है। इसका उत्तर पुस्तकालय से एक पुस्तक उठाकर, एक कथा पढ़कर और उसका संस्कृत सारांश कक्षा में सुनाकर दिया जाता है। नीचे विधि, अच्छे उत्तर की कसौटी और एक पूरा आदर्श उत्तर दिया है, जिसे देखकर आप अपनी चुनी हुई कथा का सारांश लिख सकते हैं।

विधि —

  1. कथा चुनिए: छोटी और पात्र-कम कथा चुनिए (३–४ पात्र पर्याप्त हैं)। पहली बार में ‘सिंहः शशकश्च’, ‘बकः नकुलश्च’, ‘वानरः मकरश्च’ जैसी कथाएँ सरल पड़ती हैं।
  2. दो बार पढ़िए: पहली बार केवल कथा जानने के लिए, दूसरी बार कठिन पदों को रेखांकित करने के लिए। शब्दकोश से उन्हीं का अर्थ देखिए।
  3. घटनाओं की सूची बनाइए: पाँच से सात वाक्यों में — आरम्भ, समस्या, उपाय, मोड़, अन्त। सारांश कहानी का दोहराव नहीं, उसका ढाँचा है।
  4. संस्कृत में लिखिए: छोटे वाक्य रखिए और भूतकाल के लिए क्तवतु रूप प्रयोग कीजिए (गतवान्, दृष्टवान्, उक्तवान्) — यही इस पाठ का व्याकरण-बिन्दु भी है।
  5. अन्त में नीति लिखिए: कथा का ‘नीतिवाक्यम्’ अवश्य जोड़िए, यदि हो सके तो मूल श्लोक के साथ।
  6. सुनाइए: धीरे, स्पष्ट, संयुक्ताक्षरों को पूरा बोलते हुए। पहले एक बार मित्र के सामने अभ्यास कीजिए।

अच्छे सारांश में ये पाँच बातें अवश्य आएँ — (१) कथा का नाम तथा वह किस तन्त्र से है, (२) पात्रों का एक-वाक्य परिचय, (३) घटनाक्रम सही क्रम में, (४) कथा का मोड़ (turning point) स्पष्ट, (५) नीतिवाक्य।

आदर्श उत्तरम् (नमूना सारांश) — ‘बकाः नकुलश्च’ (काकोलूकीयम् इति तृतीयतन्त्रात्)

॥ बकाः नकुलश्च ॥

कस्मिंश्चिद् वने एकः महान् न्यग्रोधवृक्षः आसीत्। तस्मिन् वृक्षे बहवः बकाः निवसन्ति स्म।
तस्य एव वृक्षस्य कोटरे एकः कृष्णसर्पः वसति स्म। सः प्रतिदिनं बकानां शिशून् खादति स्म।
बकाः अतीव दुःखिताः अभवन्। तदा एकः वृद्धः बकः उपायम् उक्तवान् —
‘अस्मात् वृक्षात् दूरे नकुलस्य बिलम् अस्ति। धीवरस्य गृहात् मत्स्यान् आनीय नकुलबिलात् आरभ्य सर्पस्य कोटरपर्यन्तं मार्गे स्थापयत।
नकुलः मत्स्यान् खादन् खादन् आगमिष्यति, सर्पं च हनिष्यति’ इति।

बकाः तथैव कृतवन्तः। नकुलः मत्स्यमार्गेण आगत्य कृष्णसर्पं हतवान्। बकाः प्रहृष्टाः अभवन्।
किन्तु ततः परं सः नकुलः वृक्षम् आरुह्य बकानां शिशून् अपि खादितवान्, अनन्तरं सर्वान् बकान् अपि।
मूर्खाः बकाः पश्यन्तः एव नष्टाः। यतः तैः उपायः चिन्तितः, किन्तु अपायः न चिन्तितः

अत एव उक्तम् —
उपायं चिन्तयेत् प्राज्ञस्तथापायं च चिन्तयेत्।
पश्यतो बकमूर्खस्य नकुलेन हता बकाः॥

(हिन्दी अनुवाद —) किसी वन में एक बड़ा बरगद का पेड़ था, जिस पर बहुत-से बगुले रहते थे। उसी पेड़ के खोखल में एक काला साँप रहता था, जो रोज़ बगुलों के बच्चों को खा जाता था। बगुले बहुत दुखी हुए। तब एक बूढ़े बगुले ने उपाय बताया — ‘इस पेड़ से दूर एक नेवले का बिल है। मछुए के घर से मछलियाँ लाकर नेवले के बिल से लेकर साँप के खोखल तक रास्ते में रख दो। नेवला मछलियाँ खाता-खाता आएगा और साँप को मार देगा।’ बगुलों ने वैसा ही किया। नेवला मछलियों के रास्ते से आया और उसने काले साँप को मार डाला। बगुले प्रसन्न हुए। परन्तु उसके बाद वही नेवला पेड़ पर चढ़कर बगुलों के बच्चों को भी खा गया और फिर सारे बगुलों को भी। मूर्ख बगुले देखते ही रह गए और नष्ट हो गए — क्योंकि उन्होंने उपाय तो सोचा, पर अपाय नहीं सोचा। इसीलिए कहा गया है — ‘बुद्धिमान् उपाय भी सोचे और उससे आने वाली हानि भी सोचे; उस मूर्ख बगुले के देखते-देखते ही नेवले ने सब बगुलों को मार डाला।’

यही कथा क्यों चुनी गई: पाठ का शीर्षक जिस श्लोक से लिया गया है, पुस्तक ने उसका केवल पूर्वार्ध दिया है। उसका उत्तरार्ध — ‘पश्यतो बकमूर्खस्य नकुलेन हता बकाः’ — सीधे इसी कथा की ओर सङ्केत करता है। अर्थात् यह सारांश केवल एक और कहानी नहीं, आपके पाठ का छूटा हुआ आधा हिस्सा है। कक्षा में सुनाते समय यह सम्बन्ध बताइए — तब आपकी प्रस्तुति सबसे अलग खड़ी होगी।
भाषा की जाँच-सूची (सुनाने से पहले): (१) हर वाक्य में कर्ता और क्रिया का वचन मिला है ? (बकाः … अभवन्, नकुलः … हतवान्) (२) भूतकाल के लिए क्तवतु का रूप कर्ता के लिङ्ग-वचन से मिला है ? (३) ‘स्म’ का प्रयोग वर्तमान क्रिया के साथ ही किया है ? (वसति स्म = रहता था) (४) संयुक्ताक्षर कहीं टूट तो नहीं रहे — कृष्णसर्पः, न्यग्रोधवृक्षः, प्रहृष्टाः ? अशुद्ध लम्बे वाक्य से शुद्ध छोटा वाक्य सदा अच्छा है।
प्र2.
कक्षायां छात्राः अध्यापकस्य साहाय्येन कथाधारितस्य नाटकस्य प्रस्तुतिं कुर्वन्तु।
उत्तर

यह समूह-कार्य है — अध्यापक की सहायता से पूरी कक्षा इसी पाठ की कथा पर नाटक तैयार करे और प्रस्तुत करे। सुविधा यह है कि पाठ पहले से ही नाट्य-शैली में लिखा है — पात्रों के नाम बाईं ओर हैं और कोष्ठकों में रङ्ग-सङ्केत भी दिए हैं। अर्थात् पटकथा आपको बनानी नहीं है, केवल सजानी है।

पात्र-वितरणम् (छह पात्र तथा एक सूत्रधार) —

पात्रम्कति छात्राःक्या करना हैवेश-सामग्री
सूत्रधारःदृश्यों के बीच जोड़ने वाला विवरण संस्कृत में पढ़े (कोष्ठक के रङ्ग-सङ्केत यही बोले)उत्तरीय, हाथ में पोथी
धर्मबुद्धिःस्वर शान्त तथा दृढ़; क्रोध केवल ‘भोः दुरात्मन्!’ परश्वेत कुर्ता-धोती, पगड़ी
पापबुद्धिःस्वर मीठा पर आँखें चंचल; ‘शिरस्ताडयन्’ का अभिनय आवश्यकरंगीन कुर्ता, कन्धे पर झोली
पापबुद्धेः पितावृद्ध स्वर; अन्तिम संवाद काँपती आवाज़ मेंश्वेत केश-दाढ़ी, दण्ड
धर्माधिकारीगम्भीर, तटस्थ स्वर; कहीं पक्ष न लेता दिखेउत्तरीय, आसन
सर्वे जनाः / सामाजिकाः५–८अन्तिम दृश्य में समवेत स्वर; ‘किमिदम् ? किमिदम् ?’ एक साथसाधारण वेश

दृश्य-योजना (पाँच दृश्य) —

दृश्यम्स्थानम्घटनामञ्च-सङ्केत
१. देशान्तरगमनम्ग्रामःपापबुद्धि की योजना; दोनों श्लोक; गुरुजनों की अनुमतिदो श्लोक मञ्च के पीछे से सस्वर पढ़े जाएँ
२. धननिधानम्गहन अरण्यम्धन गाड़ना; रात में पापबुद्धि का अकेले आनामञ्च पर एक ‘गड्ढा’ (कपड़े का घेरा) तथा एक घड़ा
३. रिक्तं भाण्डम्तदेव अरण्यम्खाली घड़ा; झूठा आरोप; ‘मातृवत्परदारेषु…’ श्लोकपापबुद्धि सिर पीटता है; प्रकाश तेज़
४. न्यायसभा तथा कोटरःधर्माधिकारिणः सभा, वनप्रदेशःवनदेवता का निर्णय; पिता का कोटर में छिपना; साक्षी-श्लोक‘शमीवृक्ष’ के लिए एक बड़ा गत्ते का तना; पिता उसके पीछे
५. सत्यप्रकाशःतत्रैवकोटर में आग; पिता का सत्य-कथन तथा मृत्यु; दण्ड तथा नीतिवाक्यलाल-नारंगी कपड़ों तथा प्रकाश से ‘आग’ दिखाइए — वास्तविक अग्नि कदापि नहीं

आदर्श उत्तरम् (नमूना पटकथा — दृश्य ५ का अंश)

सूत्रधारः — (मञ्चस्य पार्श्वे स्थित्वा) अथ प्रातःकाले सर्वे जनाः वनप्रदेशं गताः। पापबुद्धिः वनदेवतायाः समीपम् उपागतः।

पापबुद्धिः — (हस्तौ संयोज्य, उच्चैः) आदित्यचन्द्रावनिलोऽनलश्च द्यौर्भूमिरापो हृदयं यमश्च।
अहश्च रात्रिश्च उभे च संध्ये धर्मो हि जानाति नरस्य वृत्तम्॥
भगवति वनदेवते ! आवयोर्मध्ये यः चौरः, त्वं कथय।

पिता — (कोटरात् गम्भीरस्वरेण) भोः! शृणुत, शृणुत! धर्मबुद्धिना हृतम् एतद्धनम्।

सर्वे जनाः — (विस्मयेन, परस्परं पश्यन्तः) अहो! वनदेवता स्वयं वदति!

धर्मबुद्धिः — (स्थिरः, शान्तः) इदं मिथ्याभाषितम् अस्ति। नाहं चोरितवान्। अहम् एतत् शमीकोटरं वह्निभोज्यद्रव्यैः परिवेष्ट्य वह्निना प्रज्वालयामि। (तथा करोति)

सूत्रधारः — अथ ज्वलति तस्मिन् शमीकोटरे अर्धदग्धशरीरः स्फुटितेक्षणः करुणं विलपन् पापबुद्धिपिता बहिरागतः।

जनाः — (साश्चर्यम्) भोः! किमिदम् ? किमिदम् ?

पिता — (क्षीणस्वरेण) एतत् सर्वमपि पापबुद्धेः चेष्टितम्। (इत्युक्त्वा मृतः)

धर्माधिकारी — (उत्थाय) एष पापबुद्धिः दण्डनीयः।

सर्वे जनाः — (समवेतस्वरेण) भो धर्मबुद्धे! त्वया सम्यक् कृतम्। पापबुद्धेः व्यर्थपाण्डित्यात् पिता वह्निना घातितः। अतः साधूक्तम् —
उपायं चिन्तयेत् प्राज्ञस्तथापायं च चिन्तयेत्।

(यवनिकापातः)

(हिन्दी सङ्केत —) सूत्रधार दृश्य जोड़ता है; पापबुद्धि हाथ जोड़कर ऊँचे स्वर में साक्षी-श्लोक पढ़ता है; कोटर से पिता की गम्भीर आवाज़ आती है; लोग चकित होते हैं; धर्मबुद्धि शान्त स्वर में सत्य कहकर कोटर में आग लगाता है; आधा जला पिता बाहर आकर सच बताता है और मर जाता है; धर्माधिकारी दण्ड सुनाता है और सब लोग एक स्वर में नीतिवाक्य दोहराते हैं। परदा गिरता है।

प्रस्तुति को उत्कृष्ट बनाने वाली पाँच बातें —
  • उच्चारण-शुद्धि: संयुक्ताक्षर पूरे बोलिए — ‘वह्निभोज्यद्रव्यैः’, ‘स्फुटितेक्षणः’, ‘मिथ्याभाषितम्’। हलन्त ‘म्’ को ‘म’ मत बनाइए।
  • श्लोक-वाचन: चारों श्लोक सस्वर पढ़िए, संवाद की तरह नहीं। यति (विराम) आधी पंक्ति पर लीजिए।
  • रङ्ग-सङ्केत: कोष्ठकों में जो लिखा है, वह बोलने के लिए नहीं, करने के लिए है — ‘शिरस्ताडयन्’, ‘साश्चर्यम्’, ‘इत्युक्त्वा मृतः’। यही चूक सबसे आम है।
  • सुरक्षा: अग्नि का दृश्य केवल प्रकाश, लाल कपड़े तथा ध्वनि से दिखाइए। मञ्च पर असली आग कभी नहीं।
  • अन्तिम पंक्ति: नीतिवाक्य सब मिलकर एक साथ बोलें और वहीं परदा गिरे — दर्शक के मन में यही पंक्ति बचनी चाहिए।
मूल्यांकन-सङ्केत (स्वयं जाँचने के लिए): इस पाठ में पुस्तक ने कोई अङ्कयोजना-तालिका नहीं दी है, इसलिए नीचे दी गई कसौटी अभ्यास के लिए है — उच्चारण-शुद्धि (५), अभिनय तथा हाव-भाव (५), श्लोक-वाचन (५), समूह-समन्वय (५) तथा मञ्च-सज्जा एवं वेशभूषा (५)। पहले तीन बिन्दु भाषा के हैं और दो प्रस्तुति के — इसलिए अभ्यास का अधिक समय पहले तीन पर लगाइए।
क्या यह उपयोगी रहा? त्रुटि बताएँ