प्र1.
‘सर्वं शब्देन भासते’ इति तालिकायाः अन्तिमः स्तम्भः — ‘मातृभाषया अर्थं लिखत’ — रिक्तः अस्ति। पाठे प्रयुक्तानां शब्दानाम् अर्थान् ज्ञात्वा तं स्तम्भं पूरयत।
उत्तर
पुस्तक में यह अन्तिम स्तम्भ जान-बूझकर खाली छोड़ा गया है — विद्यार्थी को हर शब्द का अर्थ अपनी मातृभाषा में लिखना है। नीचे पूरी तालिका दी है और वह स्तम्भ हिन्दी (हमारी माध्यम-भाषा) में भर दिया गया है। जिनकी मातृभाषा मराठी, बाङ्ग्ला, गुजराती, तमिऴ, तेलुगु, कन्नड, ओड़िआ या कोई अन्य भारतीय भाषा है, वे इसी अर्थ के आधार पर अपनी भाषा का शब्द रखें।
| शब्दः | अर्थः | हिन्दी | English | मातृभाषया अर्थम् (भरा हुआ — हिन्दी) |
|---|---|---|---|---|
| अभिहितम् (अभि + √धा + क्त, नपुं.प्र.ए.व.) | उक्तम् | उक्त | Said | कहा गया, कहा हुआ |
| आकर्णय (आ + कर्ण + णिच् लोट्, म.पु.ए.व.) | शृणु | सुनो | Listen | सुनो, ध्यान से सुनो |
| आतिथेयः (पुं.प्र.ए.व.) | अतिथौ साधुः, अतिथिसेवाकारकः | अतिथि की सेवा करने वाला | Host | मेहमान की सेवा करने वाला, मेज़बान |
| आयोधनम् (नपुं.द्वि.ए.व.) | युद्धम् | युद्ध | Battle | लड़ाई, संग्राम |
| उत्फुल्लाक्षः (बहुब्रीहि, पुं.प्र.ए.व.) | उत्फुल्ले अक्षिणी यस्य सः, विकसितनयनः | विकसितनयन | One with wide-open eyes | खिली हुई/चौड़ी आँखों वाला |
| औदरिकः (उदर + इक्, पुं.प्र.ए.व.) | भोजनप्रियः | केवल पेट भरने वाला | One who just eats continuously | पेटू, खाने का शौकीन |
| कामम् (अव्ययम्) | निश्चयेन | निश्चित ही | Certainly | हाँ, अवश्य, बेशक |
| जठरस्थाय (पुं.च.ए.व.) | जठरे तिष्ठति इति, तस्मै | पेट में विद्यमान के लिए | For what is inside the stomach | पेट के भीतर बैठे हुए के लिए |
| निषूदकः (पुं.प्र.ए.व.) | विनाशकः | विनाशक | Destroyer | नाश करने वाला, संहारक |
| क्षुद्रमृगम् (पुं.द्वि.ए.व.) | क्षुद्रः मृगः तम् | छोटे पशु को | Small animal | मामूली/तुच्छ जानवर को |
| क्षत्रियाण्या (स्त्री.तृ.ए.व.) | क्षत्रियस्य पत्नी, तया | क्षत्रिय की पत्नी से | By the wife of Kshatriya | क्षत्राणी ने / क्षत्रिय की पत्नी के द्वारा |
| परिदेवयते (परि + √दिव् + णिच्, आ.प.प्र.पु.ए.व.) | विलपति | विलाप करता है | Laments | रो-रोकर दुख प्रकट करता है |
| परिवेषय (परि + √विष् + लोट्, म.पु.ए.व.) | स्थापय | तुम परोसो | (You) Serve | परोसो, थाली में रखो |
| पीवरौ (पुं.प्र.द्वि.व.) | स्थूलौ | (दो) स्थूल | (Two) Stout | दोनों मोटी/पुष्ट (भुजाएँ) |
| पौराः (पुं.प्र.ब.व.) | नागरिकाः | नागरिक | Citizens | नगर के लोग, नगरवासी |
| प्रतिवेशी (पुं.प्र.ए.व.) | निकट गृहवासी | पड़ोसी | Neighbour | पास के घर में रहने वाला, पड़ोसी |
| प्रतिश्रुतम् (प्रति + √श्रु + क्त, पुं.द्वि.ए.व.) | प्रतिज्ञातम् | प्रतिज्ञात | Promised | वचन दिया गया, वादा किया गया |
| प्रभूतम् (पुं.द्वि.ए.व.) | अधिकम् | अधिक | Abundant | बहुत सारा, प्रचुर |
| प्रतिश्रवः (पुं.प्र.ए.व.) | प्रतिज्ञा | वचन | Promise | वचन, ज़बान, प्रतिज्ञा |
| प्रत्यादेशम् (पुं.द्वि.ए.व.) | अनुल्लङ्घनम् | अवज्ञा | Disobedience | अवज्ञा, कही हुई बात को टालना |
| बाढम् (अव्ययम् पुं.द्वि.ए.व.) | नूनम् | निश्चित | Certainly | हाँ, ठीक है, निश्चय ही |
| मल्लयुद्धम् (पुं.द्वि.ए.व.) | मल्लानां युद्धम् | पहलवानों का युद्ध | Wrestling | कुश्ती, बिना शस्त्र का दंगल |
| मानुषापसद (सप्तमी-तत्पुरुषः, पुं.सं.ए.व.) | मानुषेषु अपसद | हे ! निकृष्ट मानव | O’ Human of low cadre | अरे नीच आदमी! अरे अधम मनुष्य! |
| मृष्टान्नम् (कर्मधारय) | मृष्टम् अन्नम् | स्वादिष्ट भोजन | Tasty Food | स्वादिष्ट खाना, बढ़िया पकवान |
| वाचाट (पुं.सं.ए.व.) | प्रलापक | हे ! डींग मारने वाले | O’ Boastful | अरे बकवादी! अरे बड़बोले! |
| विप्रस्य (पुं.ष.ए.व.) | ब्राह्मणस्य | ब्राह्मण का | Of Brahmana | ब्राह्मण का, विप्र का |
| विशङ्कया (स्त्री.तृ.ए.व.) | विशेषसंशयेन | विशिष्ट संशय से | By the doubt | विशेष सन्देह से, आशङ्का से |
| व्याघ्रगह्वरम् (पुं.द्वि.ए.व.) | व्याघ्रस्य गह्वरम् | बाघ का निवास स्थान | Tiger-Cave | बाघ की गुफा/माँद |
| श्रोत्रियः (पुं.प्र.ए.व.) | श्रोत्रम् अधीते इति | जिसने वेद पढ़ा हो | One who has read the Vedas | वेद पढ़ा हुआ विद्वान् ब्राह्मण |
| हनिष्यामि (√हन् + लृट्, उ.पु.ए.व.) | वधं करिष्यामि | मार दूँगा | Will kill | मैं मार डालूँगा |
| हुताशनाय (पुं.च.ए.व.) | हुतम् अशनम् यस्य, तस्मै | अग्नि को | For the Fire | अग्निदेव के लिए |
नमूना उत्तर (अन्य मातृभाषाओं में) — मराठी: पौराः = ‘नागरिक’, प्रतिवेशी = ‘शेजारी’, मृष्टान्नम् = ‘चविष्ट अन्न’, मल्लयुद्धम् = ‘कुस्ती’। बाङ्ग्ला: प्रतिवेशी = ‘प्रतिबेशी’, आयोधनम् = ‘युद्ध’, हुताशनः = ‘आगुन’। गुजराती: पीवरौ = ‘जाडा/पुष्ट’, विशङ्कया = ‘शंकाथी’। तमिऴ: पौराः = ‘नगर मक्कळ्’, हुताशनः = ‘तीयवन्/अग्नि’। अपनी भाषा में लिखते समय ध्यान रखिए कि अर्थ वही रहे जो संस्कृत तथा हिन्दी स्तम्भ में दिया है।
इस तालिका को पढ़ने का ढंग: केवल अर्थ रट लेना पर्याप्त नहीं। कोष्ठक में दिया गया व्याकरण-परिचय ही असली सामग्री है — ‘आकर्णय (आ + कर्ण + णिच् लोट्)’ बताता है कि यह आज्ञा है; ‘क्षत्रियाण्या (स्त्री.तृ.ए.व.)’ बताता है कि आगे क्रिया कर्मवाच्य होगी; ‘उत्फुल्लाक्षः (बहुब्रीहि)’ बताता है कि यह विशेषण है, संज्ञा नहीं। इसी परिचय के सहारे अभ्यास के प्रश्न ४, ७, ८ तथा १० हल हो जाते हैं।
पुस्तक में छपी कुछ बातें, जिन पर ध्यान दें: (१) ‘प्रत्यादेशम्’ का संस्कृत अर्थ ‘अनुल्लङ्घनम्’ छपा है, जबकि हिन्दी ‘अवज्ञा’ तथा अंग्रेज़ी ‘Disobedience’ है — शुद्ध पर्याय ‘उल्लङ्घनम्’ अथवा ‘अवज्ञा’ ही बनता है। (२) ‘बाढम्’ के आगे ‘अव्ययम्’ भी लिखा है और ‘पुं.द्वि.ए.व.’ भी — अव्यय का लिङ्ग-विभक्ति नहीं होता, अतः केवल ‘अव्ययम्’ ठीक है। (३) ‘प्रभूतम्’, ‘मल्लयुद्धम्’, ‘व्याघ्रगह्वरम्’ तथा ‘प्रतिश्रुतम्’ वस्तुतः नपुंसकलिङ्ग हैं (पुं. नहीं), और पाठ में ‘प्रभूतम्’ तथा ‘प्रतिश्रुतम्’ प्रथमा में हैं। परीक्षा में पाठ का प्रयोग ही प्रमाण मानिए।