भावार्थः (पुस्तक का) — “वयं नागरिकैः बहुकालं भिक्षा-प्रदानेन पोषिताः। उपकृतमेतत् प्रत्युपकृतं भवेत् इति एषः शाश्वतः धर्मः।”
(हिन्दी — नगरवासियों ने भिक्षा देकर बहुत समय तक हमारा पालन किया है। उनका किया हुआ यह उपकार बदले में चुकाया जाए — यही शाश्वत धर्म है।)
यह भावार्थ किस श्लोक का है — ‘भैक्षप्रदानेन चिरं परैरुपकृता वयम्। कृतं प्रतिकृतं भूयादेष धर्मः सनातनः॥’ (पृष्ठ ११४, भीम का कथन)।
| श्लोक का पद | भावार्थ का पद | क्या स्पष्ट हुआ |
|---|---|---|
| परैः | नागरिकैः | ‘परैः’ (दूसरों के द्वारा) अस्पष्ट था; भावार्थ बताता है कि वे ‘दूसरे’ एकचक्रा के नगरवासी हैं — विशेषतः वह ब्राह्मण-परिवार। |
| चिरम् | बहुकालम् | यह उपकार एक दिन का नहीं, लम्बे समय का है — इसीलिए ऋण भी बड़ा है। |
| उपकृताः | पोषिताः | ‘उपकृत’ का ठोस रूप — पाला-पोसा गया। भिक्षा का अन्न ही पाण्डवों का जीवन था। |
| कृतं प्रतिकृतं भूयात् | उपकृतमेतत् प्रत्युपकृतं भवेत् | वही बात सरल शब्दों में — किया हुआ उपकार लौटाया जाए। |
| सनातनः धर्मः | शाश्वतः धर्मः | ‘सनातन’ = ‘शाश्वत’ — जो युग बदलने पर भी न बदले, ऐसा नित्य नियम। |