शारदा अध्याय 9 अत्र इदम् अवधेयम्

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
‘अत्र इदम् अवधेयम्’ इति खण्डे प्रदत्तं प्रथमश्लोकस्य भावार्थं लिखत तथा तं स्पष्टयत — “वयं नागरिकैः बहुकालं भिक्षा-प्रदानेन पोषिताः। उपकृतमेतत् प्रत्युपकृतं भवेत् इति एषः शाश्वतः धर्मः।”
उत्तर

भावार्थः (पुस्तक का) — “वयं नागरिकैः बहुकालं भिक्षा-प्रदानेन पोषिताः। उपकृतमेतत् प्रत्युपकृतं भवेत् इति एषः शाश्वतः धर्मः।”

(हिन्दी — नगरवासियों ने भिक्षा देकर बहुत समय तक हमारा पालन किया है। उनका किया हुआ यह उपकार बदले में चुकाया जाए — यही शाश्वत धर्म है।)

यह भावार्थ किस श्लोक का है — ‘भैक्षप्रदानेन चिरं परैरुपकृता वयम्। कृतं प्रतिकृतं भूयादेष धर्मः सनातनः॥’ (पृष्ठ ११४, भीम का कथन)।

श्लोक का पदभावार्थ का पदक्या स्पष्ट हुआ
परैःनागरिकैः‘परैः’ (दूसरों के द्वारा) अस्पष्ट था; भावार्थ बताता है कि वे ‘दूसरे’ एकचक्रा के नगरवासी हैं — विशेषतः वह ब्राह्मण-परिवार।
चिरम्बहुकालम्यह उपकार एक दिन का नहीं, लम्बे समय का है — इसीलिए ऋण भी बड़ा है।
उपकृताःपोषिताः‘उपकृत’ का ठोस रूप — पाला-पोसा गया। भिक्षा का अन्न ही पाण्डवों का जीवन था।
कृतं प्रतिकृतं भूयात्उपकृतमेतत् प्रत्युपकृतं भवेत्वही बात सरल शब्दों में — किया हुआ उपकार लौटाया जाए।
सनातनः धर्मःशाश्वतः धर्मः‘सनातन’ = ‘शाश्वत’ — जो युग बदलने पर भी न बदले, ऐसा नित्य नियम।
भावार्थ पढ़ने से क्या लाभ: यह पुस्तक का अपना स्पष्टीकरण है, इसलिए परीक्षा में इसी को प्रमाण मानकर उत्तर लिखिए। ध्यान दीजिए कि भावार्थ में ‘भिक्षा-प्रदानेन पोषिताः’ शब्द जोड़कर बात और गहरी कर दी गई है — ब्राह्मण ने केवल उपकार नहीं किया, उसने पाण्डवों का पालन किया। जिसने पाला हो, उसके प्रति ऋण चुकाना केवल शिष्टाचार नहीं, धर्म है।
ध्यान दें: पुस्तक में ‘भवेत् इति एष: शाश्वतः धर्मः’ इस प्रकार छपा है, जहाँ ‘एषः’ के बाद अतिरिक्त स्थान है। शुद्ध पाठ है — ‘भवेत् इति एषः शाश्वतः धर्मः।’ सन्धि करके — ‘भवेदित्येष शाश्वतो धर्मः।’
प्र2.
द्वितीयश्लोकस्य भावार्थं लिखत तथा तं स्पष्टयत — “एतौ हि, पुष्टौ, भुजौ, मम सहजातौ उपकारकौ। सिंहः तुच्छं वन्यप्राणिनमिव, अहं, बकनामानम् असुरं विनाशयिष्यामि।”
उत्तर

भावार्थः (पुस्तक का) — “एतौ हि, पुष्टौ, भुजौ, मम सहजातौ उपकारकौ। सिंहः तुच्छं वन्यप्राणिनमिव, अहं, बकनामानम् असुरं विनाशयिष्यामि।”

(हिन्दी — ये दोनों पुष्ट भुजाएँ ही मेरे साथ जन्मे हुए उपकारक — सहायक — हैं। जैसे सिंह किसी तुच्छ वन्य प्राणी को नष्ट कर देता है, वैसे ही मैं बक नामक असुर को नष्ट कर दूँगा।)

यह भावार्थ किस श्लोक का है — ‘इमौ हि पीवरौ बाहू सहायौ सहजौ मम। बकं विध्वंसयिष्यामि सिंहः क्षुद्रमृगं यथा॥’ (पृष्ठ ११६, भीम का कथन)।

श्लोक का पदभावार्थ का पदक्या स्पष्ट हुआ
पीवरौपुष्टौ‘पीवर’ का अर्थ यहाँ ‘मोटा’ नहीं, बलिष्ठ/पुष्ट है — यह भावार्थ ही स्पष्ट करता है।
सहजौसहजातौ‘सहज’ = ‘सह जातौ’ अर्थात् साथ ही जन्मे हुए — भुजाएँ ही भीम के जन्मसिद्ध साथी हैं।
सहायौउपकारकौये केवल अङ्ग नहीं, उपकार करने वाले साथी हैं — इसीलिए अर्जुन की सहायता अनावश्यक है।
क्षुद्रमृगम्तुच्छं वन्यप्राणिनम्बक भीम की दृष्टि में राक्षस नहीं, केवल एक तुच्छ जंगली जानवर है।
विध्वंसयिष्यामिविनाशयिष्यामिक्रिया का सीधा पर्याय — ‘नष्ट कर दूँगा’।
दोनों भावार्थों का सम्बन्ध: पहला भावार्थ बताता है क्यों जाना है (कृतज्ञता का धर्म), दूसरा बताता है कैसे जाना है (अपने बल पर, बिना सहायक के)। इस प्रकार दोनों श्लोक मिलकर भीम के चरित्र के दो पक्ष दिखाते हैं — धर्मनिष्ठा तथा आत्मबल। कोई भी वीर केवल बलवान् होने से महान् नहीं होता; वह तभी महान् होता है जब उसका बल किसी धर्म की सेवा में लगे।
ध्यान देने योग्य बात: पुस्तक ने ‘अत्र इदम् अवधेयम्’ में केवल दो श्लोकों का भावार्थ दिया है। तीसरे श्लोक ‘रक्षिता साधुलोकानां…’ का भावार्थ यहाँ नहीं है — उसका अर्थ विद्यार्थी को स्वयं निकालना है (इसी पृष्ठ-समूह के ‘श्लोकाः’ खण्ड में वह ऊपर दिया गया है)। साथ ही भावार्थ में जो अल्पविराम (‘एतौ हि, पुष्टौ, भुजौ, मम …’) छपे हैं, वे मुद्रण की विशेषता हैं; अर्थ पर उनका कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
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