शारदा अध्याय 9 अभ्यासाद् जायते सिद्धिः

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
भीमस्य जननी का ?
उत्तर

उत्तरम् — कुन्ती। (हिन्दी — भीम की माता कुन्ती हैं।)

पाठ का आधार — ‘तत्र गता पाण्डवानां माता कुन्ती रोदनकारणं पृच्छति।’ (पृष्ठ ११२)
प्रश्न ‘का’ = स्त्रीलिङ्ग · प्रथमा · एकवचन
अतः उत्तर भी उसी रूप में — कुन्ती
नियम — कर्तरि प्रथमा: ‘जननी’ यहाँ कर्ता है, इसलिए वह प्रथमा विभक्ति में है; प्रश्नवाचक ‘का’ भी प्रथमा में है। एकपदेन उत्तर देते समय भी प्रश्न की विभक्ति ही उत्तर की विभक्ति तय करती है — इसलिए ‘कुन्त्याः’ या ‘कुन्तीम्’ लिखना अशुद्ध होगा।
जोड़कर देखिए: पाठ में भीम कुन्ती को ‘मातः!’ कहकर पुकारता है और कुन्ती उसे ‘पुत्र!’, ‘वत्स भीम!’ कहती है; युधिष्ठिर उन्हें ‘अम्ब!’ कहते हैं। ‘अम्ब’ का पर्याय ‘जननी’ ही है — यही अभ्यास के प्रश्न ५ (घ) में पूछा गया है।
प्र2.
कुन्त्या निश्चितं कः न समर्थयति ?
उत्तर

उत्तरम् — युधिष्ठिरः। (हिन्दी — कुन्ती के निश्चय का समर्थन युधिष्ठिर नहीं करते।)

पाठ की पंक्ति — ‘न खलु भवत्या अध्यवसितं समर्थये।’ (युधिष्ठिरः, पृष्ठ ११५)
‘अध्यवसितम्’ = निश्चितम् · ‘समर्थये’ = मैं समर्थन करता हूँ (उत्तमपुरुष)
वक्ता युधिष्ठिरः → उत्तर युधिष्ठिरः (कर्तरि प्रथमा)
क्यों युधिष्ठिर ही: उनका कारण भी उसी वाक्य में है — ‘यस्य वीरस्य भुजबलमाश्रित्य वयं सुखं शेमहे … तस्य भीमस्य प्रेषणं कथं नु त्वया सङ्कल्पितम्?’ अर्थात् जिसके बल पर हम निश्चिन्त हैं, उसी को संकट में क्यों भेजा जाए। ध्यान दीजिए — यह विरोध नहीं, असहमति है; भीम उसका उत्तर ‘न हि मातुराज्ञा प्रत्यादेशमर्हति’ कहकर देता है।
ध्यान दें: ‘कुन्त्या’ में कर्तरि तृतीया है, क्योंकि ‘निश्चितम्’ क्तप्रत्ययान्त कर्मवाच्य रूप है। ‘कुन्ती’ ईकारान्त स्त्रीलिङ्ग है, अतः तृतीया एकवचन ‘कुन्त्या’ बनता है (नदी → नद्या इव)।
प्र3.
पाण्डवानाम् उपकर्ता कः ?
उत्तर

उत्तरम् — ब्राह्मणः (प्रतिवेशी विप्रः)। (हिन्दी — पाण्डवों का उपकार करने वाला वह पड़ोसी ब्राह्मण है।)

पाठ की पंक्ति — ‘आतिथेयः किल तत्र भवान् उपकर्ता वसति प्रदानेन।’ (भीमः, पृष्ठ ११२)
‘प्रदानेन’ = अन्नदान से (करणे तृतीया)
वह कौन है ? — प्रतिवेशी ब्राह्मणः → उत्तर ब्राह्मणः
यही उत्तर पूरे पाठ की जड़ है: ब्राह्मण ने भिक्षा देकर पाण्डवों को पाला — इसी ‘कृत’ उपकार का ‘प्रतिकार’ करने भीम बकासुर के पास जाता है। इसीलिए भावार्थ भी कहता है — ‘वयं नागरिकैः बहुकालं भिक्षा-प्रदानेन पोषिताः।’ यदि यह उपकार न होता, तो पूरा नाटक ही न होता।
शब्द-रचना: ‘उपकर्ता’ = उप + √कृ + तृच् प्रत्यय — ‘उपकार करने वाला’। इसी प्रत्यय से पाठ में ‘रक्षिता’ (रक्षा करने वाला) तथा ‘हन्ता’ (मारने वाला) भी बने हैं। तृच्-प्रत्ययान्त शब्दों का प्रथमा एकवचन ‘-ता’ पर समाप्त होता है (कर्ता, दाता, नेता की तरह)।
प्र4.
कं चिन्तयन् दुर्योधनः निद्रां न लभते ?
उत्तर

उत्तरम् — भीमम्। (हिन्दी — भीम का ध्यान करते हुए दुर्योधन को नींद नहीं आती।)

पाठ की पंक्ति — ‘यच्च चिन्तयन् दुर्योधनो निद्रां न लभते, तस्य भीमस्य प्रेषणं…’ (पृष्ठ ११५)
प्रश्न ‘कम्’ = पुंलिङ्ग · द्वितीया · एकवचन
‘चिन्तयन्’ (√चिन्त् का कर्म) → कर्मणि द्वितीया → भीमम्
विभक्ति की सावधानी: प्रश्न ‘कम्’ है, ‘कः’ नहीं — इसलिए उत्तर द्वितीया में चाहिए, ‘भीमः’ नहीं ‘भीमम्’। नियम है ‘कर्मणि द्वितीया’ — जिसका चिन्तन किया जा रहा है, वही कर्म है। ध्यान दीजिए, पाठ में यही बात ‘यत् … तस्य’ के रूप में है, पर प्रश्न ने उसे ‘कम्’ बनाकर पूछा है, अतः रूप बदलेगा।
‘चिन्तयन्’ क्या है: यह √चिन्त् (णिच्) + शतृ प्रत्यय है, अर्थात् ‘चिन्तन करता हुआ’। शतृ-प्रत्ययान्त पद अपने कर्ता (यहाँ ‘दुर्योधनः’) के लिङ्ग-वचन-विभक्ति का अनुसरण करते हैं — इसीलिए ‘चिन्तयन्’ पुंलिङ्ग प्रथमा एकवचन में है। इसी प्रकार पाठ में ‘भावयन्’ तथा ‘परिमृजन्’ भी आए हैं।
प्र5.
पाण्डवाः कुत्र निवसन्ति स्म ?
उत्तर

उत्तरम् — एकचक्रनगरे (ब्राह्मणस्य गृहे)। (हिन्दी — पाण्डव एकचक्रा नगरी में एक ब्राह्मण के घर रहते थे।)

पाठ की पंक्ति — ‘पाण्डवाः एकचक्रनगरे कस्यचित् ब्राह्मणस्य गृहे निवसन्ति।’ (पृष्ठ ११२)
प्रश्न ‘कुत्र’ = कहाँ ? → उत्तर अधिकरण (सप्तमी) में
अतः — एकचक्रनगरे / ब्राह्मणस्य गृहे
नियम — अधिकरणे सप्तमी: जहाँ क्रिया घटित हो, वह अधिकरण कहलाता है और उसमें सप्तमी विभक्ति आती है। ‘कुत्र’ का उत्तर सदा सप्तमी में या स्थानवाचक अव्यय में होता है — ‘एकचक्रनगरम्’ (द्वितीया) लिखना अशुद्ध है।
‘निवसन्ति स्म’ का अर्थ भूतकाल है: लट् लकार (वर्तमान) के साथ ‘स्म’ अव्यय लगते ही अर्थ भूतकाल का हो जाता है — ‘रहते थे’। संस्कृत में कथा-वर्णन के लिए यह प्रयोग बहुत होता है (‘पठति स्म’ = पढ़ता था)। इसीलिए प्रश्न में भी ‘निवसन्ति स्म’ लिखा है।
प्र6.
भरतवंशप्रदीपः कः ?
उत्तर

उत्तरम् — भीमः (भीमसेनः)। (हिन्दी — भरतवंश का दीपक भीम है।)

पाठ की पंक्ति — ‘वत्स भीम ! अनुरूपमभिहितं भरतवंशप्रदीपेन मम पुत्रेण।’ (कुन्ती, पृष्ठ ११४)
वहाँ पद तृतीया में है (भरतवंशप्रदीपेन)
प्रश्न ‘कः’ = प्रथमा · एकवचन → उत्तर भीमः
यह पद किसने, कब कहा: जब भीम ने ‘अहमेव बकासुरमभिगमिष्यामि’ कहकर स्वयं जाने का निश्चय किया, तब कुन्ती ने प्रसन्न होकर उसे ‘भरतवंशप्रदीप’ कहा। दीपक अपने को जलाकर दूसरों को उजाला देता है — भीम भी अपने प्राण दाँव पर लगाकर एक परिवार को बचाने जा रहा है। इसी रूपक अलङ्कार के कारण यह विशेषण अत्यन्त सार्थक है।
समास: भरतवंशप्रदीपः = भरतवंशस्य प्रदीपः — षष्ठी-तत्पुरुष समास। ऐसे ही पाठ के अन्य तत्पुरुष हैं — मृगाधिपः (मृगाणाम् अधिपः), धर्मसङ्ग्रहः (धर्माणां सङ्ग्रहः), व्याघ्रगह्वरम् (व्याघ्रस्य गह्वरम्)।
प्र7.
कः भृशं परिदेवयते ?
उत्तर

उत्तरम् — तपस्वी (ब्राह्मणः / एकपुत्रः विप्रः)। (हिन्दी — वह इकलौते पुत्र वाला बेचारा ब्राह्मण बहुत विलाप कर रहा है।)

पाठ की पंक्ति — ‘स खल्वेकपुत्रस्तपस्वी भृशं परिदेवयते।’ (कुन्ती, पृष्ठ ११५)
सन्धिविच्छेदः — सः + खलु + एकपुत्रः + तपस्वी
‘कः’ = प्रथमा एकवचन → उत्तर तपस्वी (नकारान्त पुंलिङ्ग, प्रथमा एकवचन)
‘तपस्वी’ का दोहरा अर्थ: यह शब्द यहाँ (१) तपस्या करने वाला ब्राह्मण और (२) बेचारा, दयनीय — दोनों अर्थ देता है। संस्कृत नाटकों में दूसरा अर्थ बहुत चलता है, और यहाँ वही अधिक मार्मिक है : जिसका एक ही पुत्र है, उसी की बलि की बारी आ गई — इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या होगा! ‘भृशम्’ (अत्यन्त) शब्द उसी पीड़ा की तीव्रता बताता है।
व्याकरण: ‘परिदेवयते’ = परि + √दिव् + णिच्, लट् लकार, आत्मनेपद, प्रथमपुरुष एकवचन — ‘विलाप करता है’। पहले भी पाठ में इसी अर्थ में ‘शोचति’ आया है (‘तस्माद् बालकस्य पिता तपस्वी शोचति’) — दोनों वाक्य एक ही व्यक्ति के विषय में हैं।
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