शारदा अध्याय 9 अभ्यासाद् जायते सिद्धिः

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
“भैक्षप्रदानेन……..” इति श्लोकानुसारं सनातनः धर्मः कः ?
उत्तर

उत्तरम् — कृतस्य उपकारस्य प्रत्युपकारः एव सनातनः धर्मः अस्ति। अर्थात् — ‘कृतं प्रतिकृतं भूयात्’ इति एव सनातनः धर्मः। (हिन्दी — किए हुए उपकार का बदला चुकाना ही सनातन धर्म है।)

श्लोक — भैक्षप्रदानेन चिरं परैरुपकृता वयम्।
कृतं प्रतिकृतं भूयादेष धर्मः सनातनः॥
‘कृतम्’ = किया हुआ उपकार · ‘प्रतिकृतम्’ = बदले में किया गया उपकार
‘भूयात्’ = हो जाए (आशीर्लिङ् लकार)
पुस्तक का समर्थन: ‘अत्र इदम् अवधेयम्’ का भावार्थ १ यही कहता है — ‘उपकृतमेतत् प्रत्युपकृतं भवेत् इति एषः शाश्वतः धर्मः।’ अर्थात् दूसरों ने जो उपकार किया, उसे लौटाना ही शाश्वत नियम है। ध्यान रखिए — यह ‘बदला’ (प्रतिशोध) नहीं, ‘प्रत्युपकार’ है; संस्कृत में ‘प्रतिकृतम्’ का यहाँ यही अर्थ है।
पूर्ण वाक्य कैसे बनाएँ: प्रश्न में ‘सनातनः धर्मः कः?’ है, अतः उत्तर में भी ‘… एव सनातनः धर्मः अस्ति’ रखिए। प्रश्नवाचक ‘कः’ के स्थान पर उत्तर-पद बैठाइए और अन्त में क्रिया ‘अस्ति’ जोड़ दीजिए — यही ‘पूर्णवाक्येन उत्तरम्’ की सीधी विधि है।
प्र2.
बकनामा दैत्यः कुत्र वसति ?
उत्तर

उत्तरम् — बकनामा दैत्यः एकचक्रस्य पुरस्य अदूरवर्तिनि पर्वते वसति। (हिन्दी — बक नामक दैत्य एकचक्रा नगर से थोड़ी ही दूर स्थित पर्वत पर रहता है।)

पाठ की पंक्ति — ‘आकर्णय, अस्य एकचक्रस्य पुरस्यादूरवर्तिनि पर्वते वसति बकनामा दैत्यः।’ (कुन्ती, पृष्ठ ११२)
सन्धिविच्छेदः — पुरस्य + अदूरवर्तिनि (दीर्घ सन्धिः)
‘कुत्र’ का उत्तर → अधिकरणे सप्तमी : पर्वते
‘अदूरवर्तिनि’ शब्द क्यों महत्त्वपूर्ण है: यह केवल स्थान नहीं बताता, भय की निकटता भी बताता है — राक्षस दूर नहीं, पास ही रहता है, इसीलिए नगर उसकी शर्त मानने को विवश है। पूर्वकथा में भी यही शब्द ‘नातिदूरस्थितेन बकनाम्ना असुरेण’ के रूप में आया है। यही पद अभ्यास के प्रश्न ८ (च) में समस्तपद बनाने के लिए दिया गया है।
‘बकनामा’ क्या है: बकः नाम यस्य सः = बकनामा — यह बहुव्रीहि समास है, नकारान्त पुंलिङ्ग (नामन् शब्द), प्रथमा एकवचन। इसी प्रकार पाठ में ‘बकनामानम् असुरम्’ (द्वितीया) भावार्थ में आया है।
प्र3.
कुन्ती किं प्रतिश्रुतवती ?
उत्तर

उत्तरम् — कुन्ती प्रतिश्रुतवती यत् स्वपुत्रेषु एकं बकासुरस्य समीपं प्रेषयिष्यति। (हिन्दी — कुन्ती ने वचन दिया कि वह अपने पुत्रों में से एक को बकासुर के पास भेजेगी।)

पूर्वकथा — ‘स्वपुत्रेषु एकं बकासुरस्य समीपं प्रेषयामि इति कुन्ती प्रतिज्ञां कृतवती।’ (पृष्ठ ११२)
संवाद — ‘मत्पुत्रेषु कोऽपि प्रेषयिष्यत इति भवत्या प्रतिश्रुतम्।’ (भीमः, पृष्ठ ११३)
दोनों स्थान एक ही बात कहते हैं
यही वचन पूरे नाटक का कारण है: ध्यान दीजिए कि कुन्ती ने ‘भीम को भेजूँगी’ नहीं कहा — उसने ‘पुत्रों में से एक को’ कहा। पर भीम स्वयं आगे आ जाता है, और जब वह कहता है ‘मत्पुत्रेषु कोऽपि प्रेषयिष्यते इति भवत्या प्रतिश्रुतम्’, तब कुन्ती मौन रह जाती है — वह मौन ही स्वीकृति है। पात्र-चयन कुन्ती ने नहीं, भीम ने स्वयं किया।
व्याकरण: ‘प्रतिश्रुतवती’ = प्रति + √श्रु + क्तवतु प्रत्यय, स्त्रीलिङ्ग प्रथमा एकवचन — यह कर्तृवाच्य भूतकालिक रूप है। इसी का कर्मवाच्य रूप है ‘भवत्या प्रतिश्रुतम्’ (क्त प्रत्यय + कर्ता तृतीया में)। यही जोड़ी अभ्यास के प्रश्न १० (वाच्यपरिवर्तन) का ‘यथा’ बनी है।
प्र4.
भीमस्य अग्रजः कः ?
उत्तर

उत्तरम् — भीमस्य अग्रजः युधिष्ठिरः अस्ति। (हिन्दी — भीम के बड़े भाई युधिष्ठिर हैं।)

पाठ की पंक्ति — ‘ओष्ठौ स्फुरतः इवाग्रजस्य।’ (नकुलः, पृष्ठ ११५)
यहाँ ‘अग्रजस्य’ का अर्थ है ‘बड़े भाई (भीम) का’ — नकुल की दृष्टि से
किन्तु प्रश्न पूछता है ‘भीमस्य अग्रजः कः?’ → पाण्डवों में भीम से बड़े केवल युधिष्ठिर हैं
सावधान — यहाँ एक जाल है: पाठ में ‘अग्रजस्य’ शब्द भीम के लिए आया है (क्योंकि नकुल भीम से छोटा है)। पर प्रश्न ‘भीम का अग्रज’ पूछ रहा है, अतः उत्तर युधिष्ठिर है। पाण्डवों का क्रम है — युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव। इसीलिए भीम का एकमात्र अग्रज युधिष्ठिर ही है, और वही पाठ में ‘वत्स भीमसेन!’ कहकर उसे सम्बोधित करते हैं।
शब्द-रचना: अग्रजः = अग्रे जायते इति (पहले जन्मा) — उपपद तत्पुरुष। इसका विलोम है अनुजः (अनु जायते इति = बाद में जन्मा), जो अभ्यास के प्रश्न ६ (ख) का उत्तर है।
प्र5.
का प्रत्यादेशं न अर्हति ?
उत्तर

उत्तरम् — मातुः आज्ञा प्रत्यादेशं न अर्हति। (हिन्दी — माता की आज्ञा अवज्ञा के योग्य नहीं होती।)

पाठ की पंक्ति — ‘न हि मातुराज्ञा प्रत्यादेशमर्हति।’ (भीमः, पृष्ठ ११५)
सन्धिविच्छेदः — मातुः + आज्ञा = मातुराज्ञा (विसर्गसन्धिः — विसर्ग का ‘र्’)
प्रश्न ‘का’ = स्त्रीलिङ्ग प्रथमा → उत्तर ‘आज्ञा’ (स्त्रीलिङ्ग प्रथमा)
यह वाक्य पाठ का दूसरा सूत्र-वाक्य है: युधिष्ठिर का सारा तर्क ‘भीम को मत भेजिए’ पर टिका था; भीम एक ही वाक्य में उसे समाप्त कर देता है — माता वचन दे चुकी हैं, अब विचार का प्रश्न ही नहीं। पहला सूत्र था ‘कृतं प्रतिकृतं भूयात्’ (कृतज्ञता), दूसरा यह (मातृ-आज्ञापालन)। दोनों मिलकर वह ‘धर्मसङ्ग्रह’ बनते हैं जिसकी ओर भीम ने इसी वाक्य से पहले संकेत किया — ‘धर्मं विजानता भवता धर्मसङ्ग्रहोऽत्र द्रष्टव्यः।’
व्याकरण: ‘अर्हति’ के योग में कर्म द्वितीया में आता है — ‘प्रत्यादेशम् अर्हति’ (कर्मणि द्वितीया)। पाठ में यही रचना दो बार है — ‘प्रत्युपकारमर्हति’ तथा ‘प्रत्यादेशमर्हति’। ‘हि’ अव्यय यहाँ कारण/निश्चय बताता है — ‘क्योंकि निश्चय ही…’।
प्र6.
पौराः बकासुराय कथं बलिम् आहरन्ति ?
उत्तर

उत्तरम् — पौराः पर्यायक्रमेण बकासुराय बलिम् आहरन्ति। (हिन्दी — नगरवासी बारी-बारी से बकासुर के लिए बलि ले जाते हैं।)

पाठ की पंक्ति — ‘पर्यायक्रमेण तस्मै बलिमाहरन्ति पौराः।’ (भीमः, पृष्ठ ११२)
प्रश्न ‘कथम्’ = किस प्रकार ? → उत्तर रीति/प्रकार बताने वाले पद से
‘पर्यायक्रमेण’ — तृतीया विभक्ति (प्रकारे तृतीया)
‘पर्यायक्रमेण’ ही क्यों: ‘कथम्’ का उत्तर सदा क्रिया-विशेषण या तृतीया-विभक्त्यन्त पद में आता है, संज्ञा में नहीं। सन्धि की शर्त यही थी — ‘प्रतिदिनं कश्चित् नगरवासी स्वेच्छया असुरस्य भक्ष्यं भवेत्’, अर्थात् हर दिन एक व्यक्ति, बारी-बारी से। इसीलिए ब्राह्मण-परिवार की बारी को पाठ ‘पर्यायपतितम्’ भी कहता है।
एक शब्द, तीन रूप: यह पाठ ‘पर्याय’ शब्द को तीन रूपों में दिखाता है — पर्यायक्रमेण (बारी-बारी से), पर्यायः (‘श्वः प्रभाते भवत्यस्य विप्रस्य पर्यायः’ = बारी), तथा पर्यायपतितम् (बारी से आ पड़ा)। तीनों का मूल अर्थ एक ही है — क्रम, बारी।
प्र7.
क्षत्रियाणां धर्मः कः ?
उत्तर

उत्तरम् — नररक्षणं नाम भूमिपालानां क्षत्रियाणां धर्मः अस्ति। (हिन्दी — मनुष्यों की रक्षा करना ही पृथ्वी का पालन करने वाले क्षत्रियों का धर्म है।)

पाठ की पंक्ति — ‘नररक्षणं नाम भूमिपालानां क्षत्रियाणां धर्मः।’ (भीमः, पृष्ठ ११६)
यह वाक्य बक के कथन का सीधा उत्तर है —
बकः : ‘नरभक्षणं नाम मांसाशिनां राक्षसानां धर्मः।’
वक्तावाक्यम्धर्म का आधार
बकःनरभक्षणं नाम मांसाशिनां राक्षसानां धर्मः।अपनी जाति का स्वभाव
भीमःनररक्षणं नाम भूमिपालानां क्षत्रियाणां धर्मः।दूसरों की रक्षा का कर्तव्य
उत्तर देने की कला देखिए: भीम बक के वाक्य का साँचा वही रखता है और केवल एक शब्द बदल देता है — ‘भक्षण’ के स्थान पर ‘रक्षण’। इससे दो लाभ होते हैं : उत्तर याद रखने में सरल हो जाता है, और यह भी सिद्ध हो जाता है कि दोनों के ‘धर्म’ आमने-सामने खड़े हैं। जिस धर्म से दूसरे का प्राण जाए वह धर्म नहीं; जिससे दूसरे का प्राण बचे, वही धर्म है — यही पाठ का निष्कर्ष है।
समास: ‘नररक्षणम्’ = नराणां रक्षणम् (षष्ठी-तत्पुरुषः); ‘भूमिपालाः’ = भूमिं पालयन्ति इति (उपपद-तत्पुरुषः)। ‘नाम’ यहाँ अव्यय है, जिसका अर्थ है ‘तो’, ‘निश्चय ही’ — नाम नहीं।
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