शारदा अध्याय 9 अभ्यासाद् जायते सिद्धिः

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
सम्यगनुष्ठितम्।
उत्तर

उत्तरम् — सम्यक् + अनुष्ठितम् ( व्यञ्जन-सन्धिः — जश्त्व-सन्धिः )। (हिन्दी — ‘भली-भाँति किया गया’।)

सम्यक् + अनुष्ठितम् → सम्यनुष्ठितम्
नियम — झलां जशोऽन्ते : पद के अन्त में आया वर्ग का प्रथम वर्ण (क्, च्, ट्, त्, प्) स्वर या घोष वर्ण के आने पर उसी वर्ग के तृतीय वर्ण (ग्, ज्, ड्, द्, ब्) में बदल जाता है।
यहाँ — क् + अ → ग्
यही नियम कहाँ-कहाँ लगेगा: इसी पाठ के प्रश्न ४ (च) में ‘यत् + उचितम् = यदुचितम्’ (त् → द्) तथा श्लोक के ‘भूयात् + एषः = भूयादेष’ (त् → द्) में भी यही जश्त्व-सन्धि है। एक बार नियम पकड़ लेने पर तीनों उत्तर अपने आप निकल आते हैं।
ध्यान दें: कुछ पुस्तकें इसे केवल ‘व्यञ्जन-सन्धि’ लिखती हैं, कुछ ‘जश्त्व-सन्धि’। दोनों शुद्ध हैं — जश्त्व व्यञ्जनसन्धि का ही एक भेद है। परीक्षा में ‘व्यञ्जन-सन्धिः (जश्त्वम्)’ लिख देना सबसे सुरक्षित है।
प्र2.
पुरस्यादूरवर्तिनि पर्वते वसति बकनामा दैत्यः।
उत्तर

उत्तरम् — पुरस्य + अदूरवर्तिनि ( दीर्घ-सन्धिः )। (हिन्दी — ‘नगर से थोड़ी दूर स्थित’।)

पुरस्य + अदूरवर्तिनि → पुरस्यदूरवर्तिनि
नियम — अकः सवर्णे दीर्घः : सवर्ण स्वर आपस में मिलकर दीर्घ हो जाते हैं।
यहाँ — अ + अ =
सन्धि तोड़ने की युक्ति: जहाँ ‘आ’ दिखे और उसके दोनों ओर अर्थ पूरा न बन रहा हो, वहाँ पहले ‘अ + अ’ या ‘अ + आ’ का प्रयास कीजिए। यहाँ ‘पुरस्यादूर…’ में यदि ‘आ’ को न तोड़ें तो ‘पुरस्यादूर’ का कोई अर्थ नहीं बनता; तोड़ते ही ‘पुरस्य’ (नगर का) + ‘अदूरवर्तिनि’ (पास स्थित) — दोनों सार्थक हो जाते हैं।
जोड़कर देखिए: ‘अदूरवर्तिनि’ ही अभ्यास के प्रश्न ८ (च) का उत्तर है — ‘न दूरे वर्तते’ का समस्तपद ‘अदूरवर्ति’ (सप्तमी में ‘अदूरवर्तिनि’)।
प्र3.
श्रुतं तस्य दुरात्मनो वृत्तम्।
उत्तर

उत्तरम् — दुरात्मनः + वृत्तम् ( विसर्ग-सन्धिः )। (हिन्दी — ‘उस दुष्ट का वृत्तान्त’।)

दुरात्मनः + वृत्तम् → दुरात्मन वृत्तम्
नियम — अकारपूर्व विसर्ग के बाद घोष व्यञ्जन (यहाँ ‘व्’) आने पर विसर्ग सहित अकार ‘ओ’ हो जाता है।
अः + व् →
यही सबसे अधिक आने वाली विसर्गसन्धि है: इसी नियम से पाठ में ‘वरिष्ठः + बाहुशालिनाम् = वरिष्ठो बाहुशालिनाम्’, ‘मानुषभोजी सः राक्षसः’ आदि बनते हैं। पहचान का सूत्र यह है — जहाँ बीच में अकेला ‘ओ’ पड़ा हो और अगला शब्द घोष व्यञ्जन से आरम्भ हो, वहाँ प्रायः विसर्ग छिपा है
शब्द-रचना: ‘दुरात्मनः’ = दुष्टः आत्मा यस्य सः = दुरात्मा (बहुव्रीहि), उसकी षष्ठी एकवचन ‘दुरात्मनः’। ‘दुर्’ उपसर्ग के बाद स्वर आने पर ‘दुर्’ का ‘र्’ बना रहता है — दुर् + आत्मा = दुरात्मा।
प्र4.
भोज्यसमाहारे मानुषोऽपि तस्मै प्रेषयितव्यः।
उत्तर

उत्तरम् — मानुषः + अपि ( विसर्ग-सन्धिः )। (हिन्दी — ‘एक मनुष्य भी’।)

मानुषः + अपि → मानुषोऽपि
नियम — अकारपूर्व विसर्ग के बाद आने पर विसर्ग सहित अकार ‘ओ’ हो जाता है और आगे वाला ‘अ’ लुप्त होकर उसके स्थान पर अवग्रह (ऽ) लगता है।
अः + अ → ओ + ऽ
अवग्रह क्यों लगाया जाता है: ‘ऽ’ चिह्न बताता है कि यहाँ एक ‘अ’ था जो सन्धि में लुप्त हो गया। इससे पढ़ने वाले को सन्धि तोड़ने में सहायता मिलती है। इसी नियम से पाठ में ‘आगतोऽहम्’, ‘युक्तोऽयम्’, ‘श्रोत्रियोऽयम्’, ‘क्षत्रियोऽस्मि’, ‘धनुर्धरोऽहम्’, ‘श्लाघनीयोऽसि’, ‘कौन्तेयोऽस्मि’ — सब बने हैं। जहाँ ‘ऽ’ दिखे, वहाँ आगे का अक्षर सदा ‘अ’ ही होगा।
अगला प्रश्न भी यही है: प्रश्न ४ (झ) ‘धर्मसङ्ग्रहोऽत्र’ भी ठीक इसी नियम पर है — धर्मसङ्ग्रहः + अत्र।
प्र5.
मातः ! नास्त्यत्र किमप्यनुशोचितव्यम्।
उत्तर

उत्तरम् — नास्ति + अत्र ( यण्-सन्धिः )। [भीतर एक और सन्धि छिपी है — न + अस्ति = नास्ति ( दीर्घ-सन्धिः )।] (हिन्दी — ‘यहाँ कुछ भी नहीं है’।)

पूरा विच्छेद — न + अस्ति + अत्र
चरण १ : न + अस्ति → नास्ति ( अ + अ = आ, दीर्घ-सन्धिः )
चरण २ : नास्ति + अत्र → नास्त्त्र ( इ + अ = य्, यण्-सन्धिः )
नियम — इको यणचि : इ/उ/ऋ/ऌ के बाद असवर्ण स्वर आने पर क्रमशः य्/व्/र्/ल् हो जाते हैं।
रेखाङ्कित पद के लिए मुख्य उत्तर कौन-सा है: पुस्तक ने केवल ‘नास्त्यत्र’ को रेखाङ्कित किया है और एक ही जोड़ी का स्थान दिया है, अतः वहाँ लिखिए — नास्ति + अत्र (यण्-सन्धिः)। भीतर की दूसरी सन्धि (न + अस्ति) को कोष्ठक में जोड़ देने से उत्तर और पूरा हो जाता है।
यही नियम आगे भी: इसी वाक्य का ‘किमप्यनुशोचितव्यम्’ भी दो सन्धियों से बना है — किम् + अपि = किमपि (व्यञ्जनसन्धि), फिर किमपि + अनुशोचितव्यम् = किमप्यनुशोचितव्यम् (इ + अ = य्, यण्-सन्धि)। इसे स्वयं तोड़कर अभ्यास कीजिए।
प्र6.
क्षत्रियाण्या यदुचितं तदनुष्ठितम्।
उत्तर

उत्तरम् — यत् + उचितम् ( व्यञ्जन-सन्धिः — जश्त्व-सन्धिः )। (हिन्दी — ‘जो उचित था’।)

यत् + उचितम् → यदुचितम्
नियम — झलां जशोऽन्ते : पदान्त ‘त्’ के बाद स्वर आने पर ‘त्’ का ‘द्’ हो जाता है।
त् + उ → द्
उसी वाक्य में दूसरी बार: इसी वाक्य का अगला पद ‘तदनुष्ठितम्’ भी ठीक यही सन्धि है — तत् + अनुष्ठितम् = तदनुष्ठितम्। संस्कृत में ‘यत्…तत्’ की जोड़ी बहुत आती है, और स्वर आने पर दोनों का ‘त्’ ‘द्’ हो जाता है — यत् + अपि = यदपि, तत् + अपि = तदपि (यह भी पाठ में है)।
पहचान की युक्ति: यदि किसी पद के बीच अचानक ‘द’ दिखे और उससे पहले का अंश ‘य’/‘त’/‘सम्य’ जैसा हो, तो वहाँ प्रायः पदान्त ‘त्’ या ‘क्’ छिपा है — यही जश्त्व-सन्धि का चिह्न है।
प्र7.
स खल्वेकपुत्रस्तपस्वी भृशं परिदेवयते।
उत्तर

उत्तरम् — पुत्रः + तपस्वी ( विसर्ग-सन्धिः )। (हिन्दी — ‘इकलौते पुत्र वाला तपस्वी (ब्राह्मण)’।)

एकपुत्रः + तपस्वी → एकपुत्रस्तपस्वी
नियम — विसर्ग के बाद खर् वर्ण में से ‘त्’ अथवा ‘थ्’ आने पर विसर्ग का ‘स्’ हो जाता है (विसर्जनीयस्य सः)।
अः + त → अस्
यह नियम किन वर्णों के आगे लगता है: विसर्ग के बाद जब त्, थ् आएँ तो ‘स्’; जब च्, छ् आएँ तो ‘श्’ (जैसे इसी पाठ का ‘मृत्युश्चास्मि’ = मृत्युः + च); और जब ट्, ठ् आएँ तो ‘ष्’। तीनों एक ही सूत्र के भेद हैं — विसर्ग अपने बाद वाले वर्ण के अनुरूप ऊष्म वर्ण बन जाता है
पूरे वाक्य की सन्धियाँ: ‘स खल्वेकपुत्रस्तपस्वी’ = सः + खलु + एकपुत्रः + तपस्वी — (१) ‘सः’ का विसर्ग व्यञ्जन से पहले लुप्त होकर ‘स’ बना (एतत्तदोः सुलोपः), (२) खलु + एकपुत्रः = खल्वेकपुत्रः (उ + ए = व्, यण्-सन्धिः), (३) एकपुत्रः + तपस्वी = एकपुत्रस्तपस्वी (विसर्गसन्धि)। एक ही वाक्यांश में तीन सन्धियाँ — इसीलिए यह अच्छा अभ्यास है।
प्र8.
कथं नु त्वया सङ्कल्पितम्।
उत्तर

उत्तरम् — सम् + कल्पितम् ( व्यञ्जन-सन्धिः — परसवर्ण/अनुस्वार-सन्धिः )। (हिन्दी — ‘संकल्प किया गया’।)

सम् + कल्पितम् → सङ्कल्पितम्
नियम — मोऽनुस्वारः तथा अनुस्वारस्य ययि परसवर्णः : पदान्त ‘म्’ के बाद व्यञ्जन आने पर वह पहले अनुस्वार बनता है, फिर उस व्यञ्जन के वर्ग का पञ्चम वर्ण हो जाता है।
यहाँ अगला वर्ण ‘क्’ (कवर्ग) है → ‘म्’ → ङ्
इसी नियम से पाठ के तीन और शब्द बने हैं: सम् + ग्रहः = सङ्ग्रहः (धर्मसङ्ग्रहः), सम् + कल्पितम् = सङ्कल्पितम्, तथा सम् + चितम् = सञ्चितम् प्रकार के शब्द। सूत्र सरल है — म् के बाद जिस वर्ग का व्यञ्जन हो, म् उसी वर्ग का पञ्चम वर्ण बन जाता है : क-वर्ग → ङ्, च-वर्ग → ञ्, ट-वर्ग → ण्, त-वर्ग → न्, प-वर्ग → म्।
लिखने की छूट: ‘सङ्कल्पितम्’ को ‘संकल्पितम्’ भी लिखा जाता है — अनुस्वार और परसवर्ण दोनों रूप शुद्ध हैं। पुस्तक ने परसवर्ण रूप छापा है, इसलिए उत्तर में भी वही रखना अच्छा है।
प्र9.
धर्मसङ्ग्रहोऽत्र द्रष्टव्यः।
उत्तर

उत्तरम् — धर्मसङ्ग्रहः + अत्र ( विसर्ग-सन्धिः )। (हिन्दी — ‘यहाँ धर्मों का संग्रह’।)

धर्मसङ्ग्रहः + अत्र → धर्मसङ्ग्रहोऽत्र
नियम — अकारपूर्व विसर्ग + अ → ‘ओ’ तथा आगे का ‘अ’ लुप्त, स्थान पर अवग्रह (ऽ)
अः + अ → ओ + ऽ
प्रश्न ४ (घ) से तुलना कीजिए: वहाँ ‘मानुषः + अपि = मानुषोऽपि’ था, यहाँ ‘धर्मसङ्ग्रहः + अत्र = धर्मसङ्ग्रहोऽत्र’ — नियम बिल्कुल वही। परीक्षा में ऐसी दोहराई गई सन्धियाँ मुफ़्त के अंक हैं, बशर्ते नियम एक बार ठीक से समझ लिया हो।
समास भी देख लीजिए: ‘धर्मसङ्ग्रहः’ = धर्माणां सङ्ग्रहः — षष्ठी-तत्पुरुष समास। यही अभ्यास के प्रश्न ८ (ख) का उत्तर है। भीम इसे इसलिए कहता है कि यहाँ एक साथ दो धर्म सध रहे हैं — प्रत्युपकार तथा मातृ-आज्ञापालन।
प्र10.
मानुषभोजी स राक्षस इति श्रूयते।
उत्तर

उत्तरम् — राक्षसः + इति ( विसर्ग-सन्धिः — विसर्गलोपः )। [साथ ही — सः + राक्षसः = स राक्षसः ( एतत्तदोः सुलोपः )।] (हिन्दी — ‘वह राक्षस — ऐसा सुना जाता है’।)

राक्षसः + इति → राक्षस इति
नियम — अकारपूर्व विसर्ग के बाद अ से भिन्न स्वर (यहाँ ‘इ’) आने पर विसर्ग का लोप हो जाता है और दोनों शब्द अलग-अलग ही लिखे जाते हैं।
अः + इ → अ + इ (विसर्ग लुप्त, कोई जोड़ नहीं)
‘सः’ का ‘स’ क्यों हुआ: ‘सः’ तथा ‘एषः’ — इन दोनों का विसर्ग व्यञ्जन से पहले लुप्त हो जाता है (सूत्र — एतत्तदोः सुलोपोऽकोरनञ्समासे हलि)। इसीलिए ‘सः राक्षसः’ → ‘स राक्षसः’ तथा ‘एषः धर्मः’ → ‘एष धर्मः’ बनता है। यही कारण है कि पाठ का शीर्षक ‘कृतं प्रतिकृतं भूयादेष धर्मः सनातनः’ है, ‘भूयात् एषः धर्मः’ नहीं।
ध्यान दें: पृष्ठ ११५ पर वाक्य ‘मानुषभोजी स राक्षसः इति श्रूयते’ इस रूप में (विसर्ग सहित) छपा है, जबकि अभ्यास में वही वाक्य सन्धि करके ‘स राक्षस इति’ दिया गया है। दोनों शुद्ध हैं — पहला विच्छिन्न रूप, दूसरा सन्धियुक्त रूप। अभ्यास का प्रश्न सन्धियुक्त रूप को ही तोड़ने को कहता है।
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