शारदा अध्याय 9 यस्तु क्रियावान् मनुजः स विद्वान्

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
अस्य रूपकस्य अभिनय-अंशान् ज्ञात्वा स्वशालायाम् अभिनयं कुरुत।
उत्तर

यह क्रियात्मक (अभिनय) कार्य है — पूरे पाठ को कक्षा या विद्यालय के मंच पर नाटक के रूप में खेलना है। इसका उत्तर कॉपी में नहीं, मंच पर दिया जाता है। नीचे वह विधि दी है जिससे अभिनय शुद्ध और प्रभावी बने।

पात्र-विभाजन (कुल ७ पात्र) —

पात्रम्स्वभावःस्वरः तथा मुद्रा
कुन्तीधीर, वचन की पक्की, भीतर से व्यथित मातास्वर शान्त और धीमा; ‘मौनमवलम्बते’ पर पूरी तरह चुप — केवल दृष्टि नीचे
भीमःबलशाली, विनोदप्रिय, निर्भयस्वर ऊँचा और खुला; श्लोक बोलते समय भुजाओं की मुद्रा
युधिष्ठिरःगम्भीर, विवेकी, चिन्तित अग्रजस्वर सन्तुलित; ‘कथं नु त्वया सङ्कल्पितम्?’ पर स्वर में पीड़ा
अर्जुनःउत्साही, साथ खड़ा रहने वाला‘धनुर्धरोऽहमनुगमिष्यामि’ पर आगे बढ़कर दृढ़ स्वर
नकुलः / सहदेवःपरिहासप्रिय छोटे भाईहल्का, चंचल स्वर; मुस्कान के साथ संवाद
बकःदर्पयुक्त, क्रूर, पर तर्क करने वालाभारी, गूँजता स्वर; ‘मानुषापसद’ पर तिरस्कार की मुद्रा

अभिनय की विधि —

  1. दो दृश्य बनाइए: पहला ब्राह्मण के घर का (पृष्ठ ११२–११५), दूसरा वन में शकट के पास का (पृष्ठ ११६–११७)। बीच में एक छोटा विराम या पर्दा-परिवर्तन रखिए।
  2. नेपथ्य-निर्देश बोले नहीं जाते, किए जाते हैं: ‘(विलोक्य)’, ‘(मौनमवलम्बते)’, ‘(सहासमुदरं परिमृजन्)’, ‘(उभौ प्रहरतः)’ — इन्हें पढ़ना नहीं, करके दिखाना है। एक विद्यार्थी ‘सूत्रधार’ बनकर केवल आरम्भ का परिचय पढ़े।
  3. श्लोकों पर विशेष ध्यान: तीनों श्लोक सामान्य संवाद से भिन्न, थोड़ा धीमा और लयबद्ध बोलिए — यही उन्हें उभारेगा। ‘कृतं प्रतिकृतं भूयादेष धर्मः सनातनः’ पर सबसे अधिक बल दीजिए, क्योंकि वही पाठ का नाम है।
  4. उच्चारण की सावधानी: संयुक्ताक्षर न निगलिए — प्रत्युपकारमर्हति, धर्मसङ्ग्रहोऽत्र, त्वन्मस्तकास्थिभिदुरः, शस्त्रग्रहणविडम्बनेन, मृत्युश्चास्मि। हलन्त ‘म्’ को पूरा बोलिए।
  5. सामग्री (सरल): एक टोकरी या ठेला (शकट), कुछ बर्तन, बक के लिए एक गदा जैसा दण्ड। भारी सज्जा की आवश्यकता नहीं — स्पष्ट संवाद ही सर्वोत्तम सज्जा है
  6. मल्लयुद्ध का दृश्य: वास्तविक प्रहार कदापि न कीजिए। दोनों पात्र दूर-दूर खड़े होकर मुद्रा बनाएँ, प्रकाश मन्द हो और बक धीरे-धीरे गिर जाए। सुरक्षा सबसे पहले।
अभिनय से क्या सीखते हैं: संस्कृत सुनकर समझने की क्षमता कक्षा में पढ़ने से नहीं, बोलने से आती है। जब विद्यार्थी ‘बाढम्’, ‘ततस्ततः’, ‘अलं विशङ्कया’, ‘मा मैवम्’ जैसे छोटे संवाद बार-बार बोलता है, तब ये पद उसके अपने हो जाते हैं। साथ ही नाटक भाव सिखाता है — अभ्यास का प्रश्न ९ (हास्य, निराशा, ग्लानि, अधिकार, ओज, धैर्य) मंच पर स्वयं ही समझ में आ जाता है।
Try This: अभिनय के बाद कक्षा में एक छोटी चर्चा कीजिए — ‘यदि भीम न होता तो क्या होता?’ और ‘क्या बक का तर्क कहीं भी ठीक था?’ इससे पाठ का धर्म-विवाद और गहरा समझ में आएगा।
प्र2.
अस्मिन् रूपके विद्यमानानां पात्राणां नामानि विलिख्य तेषां विषये टिप्पणीं लिखत।
उत्तर

उत्तरम् — अस्मिन् पाठ्यभागे सप्त पात्राणि सन्ति — कुन्ती, भीमः (भीमसेनः), युधिष्ठिरः, अर्जुनः, नकुलः, सहदेवः, बकः च। तेषु पञ्च पाण्डवाः, एका माता, एकः च राक्षसः।

पात्रम्परिचयः (संस्कृतम्)टिप्पणी (हिन्दी)पाठ का प्रमाण
कुन्तीपाण्डवानां माता, क्षत्रियाणी, प्रतिज्ञापालिका।पड़ोसी के दुःख में स्वयं आगे आकर वचन देती है, पर पुत्र को भेजते समय बोल नहीं पाती — मौन ही उसकी स्वीकृति है। करुणा और कर्तव्य दोनों उसमें साथ हैं।‘मौनमवलम्बते’ (११३); ‘क्षत्रियाण्या यदुचितं तदनुष्ठितम्’ (११४)
भीमः (भीमसेनः)कुन्तीपुत्रः, बलशाली, भरतवंशप्रदीपः, राक्षसध्वंसी।पाठ का नायक। कृतज्ञ, मातृभक्त, निर्भय और विनोदप्रिय — चारों गुण एक साथ। मृत्यु के मुख जाते हुए भी भोजन पर हँसी कर लेता है, पर धर्म पर तनिक समझौता नहीं करता।‘अहमेव बकासुरमभिगमिष्यामि’ (११४); ‘न हि मातुराज्ञा प्रत्यादेशमर्हति’ (११५)
युधिष्ठिरःज्येष्ठः पाण्डवः, धर्मज्ञः, विवेकी अग्रजः।माता का विरोध नहीं करते, केवल असहमति जताते हैं — ‘न खलु भवत्या अध्यवसितं समर्थये’। उनकी चिन्ता स्वार्थ की नहीं, भाई के प्राणों की है।‘तस्य भीमस्य प्रेषणं कथं नु त्वया सङ्कल्पितम्?’ (११५)
अर्जुनःधनुर्धरः, भ्रातृस्नेही, उत्साही।पहले भीम की भूख पर हँसी करता है (‘स्थाने खलु प्रहर्षः औदरिकस्य’), पर संकट सुनते ही सबसे पहले साथ चलने को तैयार हो जाता है — यही सच्चा भ्रातृ-स्नेह है।‘धनुर्धरोऽहमनुगमिष्यामि’ (११५)
नकुलःकनिष्ठः पाण्डवः, परिहासप्रियः।छोटा भाई, जो बड़े भाई की भूख पर चुटकी लेता है — ‘ओष्ठौ स्फुरतः इवाग्रजस्य’। उसका एक ही संवाद है, पर वही दृश्य में हास्य ले आता है।पृष्ठ ११५
सहदेवःकनिष्ठतमः पाण्डवः, विनोदप्रियः।‘अपि हस्तद्वयेन भोक्ष्यसे?’ — यह पाठ का सबसे हल्का-फुल्का वाक्य है। नकुल और सहदेव मिलकर वीररस के बीच हास्य की राहत देते हैं।पृष्ठ ११५
बकःमानुषभोजी राक्षसः, हिडिम्बस्य मित्रम्, दर्पयुक्तः।प्रतिनायक। मूर्ख नहीं — वह तर्क करता है (‘नरभक्षणं नाम मांसाशिनां राक्षसानां धर्मः’)। पर उसका दर्प ही उसका नाश करता है : वह भीम को ‘मृग’ समझता है, जबकि भीम स्वयं को ‘सिंह’ कह चुका है।पृष्ठ ११६–११७

अन्ये उल्लिखिताः (मञ्चे न आगच्छन्ति) —

नामकः / का
प्रतिवेशी ब्राह्मणः (तपस्वी विप्रः)वह पड़ोसी, जिसके परिवार की बलि की बारी थी; पाण्डवों का उपकर्ता। उसका उल्लेख है, पर वह मंच पर नहीं आता।
हिडिम्बःबक का मित्र राक्षस, जिसे भीम पहले मार चुका है।
दुर्योधनःकौरव, जो भीम का स्मरण करके नींद नहीं ले पाता।
पौराःएकचक्रा नगरी के नागरिक, जो बारी-बारी से बलि देते हैं।
टिप्पणी लिखने की विधि: किसी पात्र पर टिप्पणी लिखते समय तीन बातें अवश्य आनी चाहिए — (१) वह कौन है (सम्बन्ध, स्थान), (२) उसका स्वभाव एक या दो विशेषणों में, और (३) पाठ से एक प्रमाण-वाक्य। बिना प्रमाण के लिखी गई टिप्पणी केवल अनुमान रह जाती है। ऊपर की तालिका इसी क्रम में बनी है — इसे देखकर आप किसी भी पात्र पर पाँच-सात पंक्तियों की टिप्पणी लिख सकते हैं।
नमूना टिप्पणी (आदर्श उत्तरम् — भीमः) —भीमः अस्य रूपकस्य नायकः। सः कुन्त्याः द्वितीयः पुत्रः, अतुलबलशाली, राक्षसध्वंसी च। ब्राह्मणेन कृतम् उपकारं स्मरन् सः स्वयम् एव बकासुरस्य समीपं गन्तुम् उद्युक्तः भवति — ‘अहमेव बकासुरमभिगमिष्यामि’ इति। मातुः आज्ञां सः अनुल्लङ्घनीयां मन्यते — ‘न हि मातुराज्ञा प्रत्यादेशमर्हति’। अर्जुनस्य साहाय्यम् अपि सः नैव इच्छति, यतः ‘न हि खरदंष्ट्रो मृगाधिपः सहायमपेक्षते’। एवं कृतज्ञता, मातृभक्तिः, आत्मविश्वासः, विनोदप्रियता च — एते तस्य प्रमुखाः गुणाः।’ (हिन्दी — भीम इस रूपक का नायक है। वह कुन्ती का दूसरा पुत्र, अतुलित बलशाली और राक्षसों का नाश करने वाला है। ब्राह्मण के किए उपकार को याद करके वह स्वयं बकासुर के पास जाने को तैयार होता है। माता की आज्ञा को वह अनुल्लङ्घनीय मानता है। अर्जुन की सहायता भी वह नहीं चाहता, क्योंकि सिंह सहायक नहीं ढूँढ़ता। इस प्रकार कृतज्ञता, मातृभक्ति, आत्मविश्वास और विनोदप्रियता — ये उसके मुख्य गुण हैं।)
प्र3.
विद्यालयस्य ग्रन्थालयं गत्वा महाभारतस्य विविधपात्राणां विषये पठित्वा मित्रैः सह आलोचनां कुरुत।
उत्तर

यह ग्रन्थालय-अध्ययन तथा समूह-चर्चा का कार्य है — विद्यालय के पुस्तकालय में जाकर महाभारत के विभिन्न पात्रों के विषय में पढ़ना है और फिर मित्रों के साथ उस पर चर्चा करनी है। इसका कोई एक ‘सही’ उत्तर नहीं है, पर अच्छी चर्चा की एक विधि अवश्य है।

कार्य कैसे कीजिए (विधि) —

  1. पात्र बाँट लीजिए: चार-पाँच के समूह बनाइए और हर समूह एक-एक पात्र ले — कुन्ती, भीम, युधिष्ठिर, अर्जुन, कर्ण, द्रौपदी, विदुर, घटोत्कच।
  2. तीन प्रश्नों के उत्तर खोजिए: (क) यह पात्र किस कुल का है और उसकी मुख्य कथा क्या है? (ख) उसका सबसे बड़ा गुण तथा सबसे बड़ी दुर्बलता क्या है? (ग) उसका एक निर्णय, जिससे कथा की दिशा बदल गई।
  3. स्रोत लिखिए: जिस पुस्तक से पढ़ा, उसका नाम और पृष्ठ अवश्य लिख लीजिए — यही ‘स्वाध्याय’ को ‘अध्ययन’ बनाता है
  4. प्रस्तुति: हर समूह पाँच मिनट में अपने पात्र का परिचय दे। अन्त में एक साझा प्रश्न पर चर्चा हो — ‘इस पात्र से आज हम क्या सीख सकते हैं?’
  5. संस्कृत में एक-दो वाक्य: प्रस्तुति के अन्त में अपने पात्र पर कम-से-कम दो वाक्य संस्कृत में बोलने का प्रयास कीजिए। यही इस पाठ का असली लाभ है।

चर्चा के लिए तालिका (नमूना) —

पात्रम्मुख्यः गुणःनिर्णायकः क्षणःआजके लिए सीख
कुन्तीवचनपालनम्, परदुःखकातरताबकासुर को पुत्र भेजने की प्रतिज्ञादूसरे के दुःख में आगे आना, और दिए वचन से न हटना
भीमःकृतज्ञता तथा निर्भयता‘अहमेव बकासुरमभिगमिष्यामि’बल का उपयोग रक्षा के लिए, दर्प के लिए नहीं
युधिष्ठिरःधर्मनिष्ठा, विवेकःमाता के निर्णय पर संयत असहमतिविरोध भी शालीन भाषा में किया जा सकता है
अर्जुनःएकाग्रता, भ्रातृस्नेहःभाई के साथ चलने का प्रस्तावसंकट में साथ खड़ा होना ही मित्रता है
विदुरःनीतिज्ञता, निर्भीक परामर्शःलाक्षागृह से पाण्डवों को सावधान करनासत्य कहना, चाहे वह अप्रिय हो
घटोत्कचःत्यागः, पितृभक्तिःमहाभारत-युद्ध में आत्मबलिदानबड़े उद्देश्य के लिए स्वयं को समर्पित करना

आदर्श उत्तरम् (नमूना — चर्चा का निष्कर्ष) —

महाभारतस्य पात्राणि विषये अस्माकं समूहः एवं निश्चितवान् —
प्रथमम् — महाभारते न कोऽपि पूर्णतया साधुः, न च कोऽपि पूर्णतया असाधुः; प्रत्येकं पात्रं गुणैः दोषैश्च युक्तम्।
द्वितीयम् — पात्रस्य महत्त्वं तस्य बलेन न, अपि तु तस्य निर्णयैः ज्ञायते। भीमस्य महत्त्वं तस्य भुजबलेन न, अपि तु ‘कृतं प्रतिकृतं भूयात्’ इति निर्णयेन।
तृतीयम् — यत्र धर्मः तत्र जयः। बकः बलवान् आसीत्, किन्तु तस्य ‘धर्मः’ परपीडायाम् आधृतः आसीत्, अतः सः नष्टः।
अतः वयं मन्यामहे यत् महाभारतम् केवलं युद्धस्य कथा न, अपि तु निर्णयानां शास्त्रम् अस्ति।

(हिन्दी — महाभारत के पात्रों के विषय में हमारे समूह ने यह निश्चय किया — पहला, महाभारत में न कोई पूर्णतः अच्छा है, न कोई पूर्णतः बुरा; हर पात्र गुण और दोष दोनों से युक्त है। दूसरा, पात्र का महत्त्व उसके बल से नहीं, उसके निर्णयों से जाना जाता है — भीम की महानता उसके भुजबल में नहीं, ‘कृतं प्रतिकृतं भूयात्’ इस निर्णय में है। तीसरा, जहाँ धर्म है वहीं विजय है; बक बलवान् था, पर उसका ‘धर्म’ दूसरों को पीड़ा देने पर टिका था, इसलिए वह नष्ट हुआ। अतः हम मानते हैं कि महाभारत केवल युद्ध की कथा नहीं, निर्णयों का शास्त्र है।)

यह उत्तर अच्छा क्यों है: इसमें तीनों बातें पाठ से निकली हैं (कृतज्ञता → श्लोक १, बल का सदुपयोग → श्लोक २, धर्म बनाम अधर्म → भीम-बक संवाद), तीनों सामान्य निष्कर्ष हैं जो किसी एक पात्र तक सीमित नहीं, और अन्तिम पंक्ति चर्चा को एक वाक्य में समेट देती है। समूह-चर्चा का उत्तर तभी पूरा माना जाता है जब वह पढ़ने से आरम्भ होकर निष्कर्ष पर समाप्त हो।
ग्रन्थालय में क्या देखें: महाभारत का कोई सरल संस्कृत या हिन्दी संस्करण, ‘महाभारत-कथा’ जैसी बालोपयोगी पुस्तकें, तथा संस्कृत नाटकों के संग्रह। यदि विद्यालय में उपलब्ध हो तो कवि रङ्गनाथशर्मा का ‘एकचक्रम्’ पूरा पढ़िए — तभी पता चलेगा कि यह पाठ उसके तीसरे-चौथे अङ्क का ही अंश है और आगे-पीछे क्या होता है।
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