यह क्रियात्मक (अभिनय) कार्य है — पूरे पाठ को कक्षा या विद्यालय के मंच पर नाटक के रूप में खेलना है। इसका उत्तर कॉपी में नहीं, मंच पर दिया जाता है। नीचे वह विधि दी है जिससे अभिनय शुद्ध और प्रभावी बने।
पात्र-विभाजन (कुल ७ पात्र) —
| पात्रम् | स्वभावः | स्वरः तथा मुद्रा |
|---|---|---|
| कुन्ती | धीर, वचन की पक्की, भीतर से व्यथित माता | स्वर शान्त और धीमा; ‘मौनमवलम्बते’ पर पूरी तरह चुप — केवल दृष्टि नीचे |
| भीमः | बलशाली, विनोदप्रिय, निर्भय | स्वर ऊँचा और खुला; श्लोक बोलते समय भुजाओं की मुद्रा |
| युधिष्ठिरः | गम्भीर, विवेकी, चिन्तित अग्रज | स्वर सन्तुलित; ‘कथं नु त्वया सङ्कल्पितम्?’ पर स्वर में पीड़ा |
| अर्जुनः | उत्साही, साथ खड़ा रहने वाला | ‘धनुर्धरोऽहमनुगमिष्यामि’ पर आगे बढ़कर दृढ़ स्वर |
| नकुलः / सहदेवः | परिहासप्रिय छोटे भाई | हल्का, चंचल स्वर; मुस्कान के साथ संवाद |
| बकः | दर्पयुक्त, क्रूर, पर तर्क करने वाला | भारी, गूँजता स्वर; ‘मानुषापसद’ पर तिरस्कार की मुद्रा |
अभिनय की विधि —
- दो दृश्य बनाइए: पहला ब्राह्मण के घर का (पृष्ठ ११२–११५), दूसरा वन में शकट के पास का (पृष्ठ ११६–११७)। बीच में एक छोटा विराम या पर्दा-परिवर्तन रखिए।
- नेपथ्य-निर्देश बोले नहीं जाते, किए जाते हैं: ‘(विलोक्य)’, ‘(मौनमवलम्बते)’, ‘(सहासमुदरं परिमृजन्)’, ‘(उभौ प्रहरतः)’ — इन्हें पढ़ना नहीं, करके दिखाना है। एक विद्यार्थी ‘सूत्रधार’ बनकर केवल आरम्भ का परिचय पढ़े।
- श्लोकों पर विशेष ध्यान: तीनों श्लोक सामान्य संवाद से भिन्न, थोड़ा धीमा और लयबद्ध बोलिए — यही उन्हें उभारेगा। ‘कृतं प्रतिकृतं भूयादेष धर्मः सनातनः’ पर सबसे अधिक बल दीजिए, क्योंकि वही पाठ का नाम है।
- उच्चारण की सावधानी: संयुक्ताक्षर न निगलिए — प्रत्युपकारमर्हति, धर्मसङ्ग्रहोऽत्र, त्वन्मस्तकास्थिभिदुरः, शस्त्रग्रहणविडम्बनेन, मृत्युश्चास्मि। हलन्त ‘म्’ को पूरा बोलिए।
- सामग्री (सरल): एक टोकरी या ठेला (शकट), कुछ बर्तन, बक के लिए एक गदा जैसा दण्ड। भारी सज्जा की आवश्यकता नहीं — स्पष्ट संवाद ही सर्वोत्तम सज्जा है।
- मल्लयुद्ध का दृश्य: वास्तविक प्रहार कदापि न कीजिए। दोनों पात्र दूर-दूर खड़े होकर मुद्रा बनाएँ, प्रकाश मन्द हो और बक धीरे-धीरे गिर जाए। सुरक्षा सबसे पहले।