शारदा अध्याय 10 पाठः

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
ऋषभदेवः किमर्थं भिक्षार्थं प्रस्थितः ? प्रजाः भिक्षायां किं दत्तवत्यः, तस्य च कः परिणामः अभवत् ?
उत्तर

अनुयायिनः वृक्षेभ्यः फलानि शाकानि वा चित्वा जीवनं यापयन्ति स्म। कदाचित् तेषाम् एतादृशं व्यवहारं दृष्ट्वा ‘जैनसन्न्यासिनः वृक्षेभ्यः फलानि शाकानि वा न चिनुयुः’ इति बोधनार्थं ऋषभदेवः स्वयं भिक्षार्थं प्रस्थितः।

(हिन्दी — उनके अनुयायी पेड़ों से फल या शाक तोड़कर जीवन चला रहे थे। कभी उनका ऐसा व्यवहार देखकर, ‘जैन सन्न्यासी पेड़ों से फल या शाक न तोड़ें’ — यह समझाने के लिए ऋषभदेव स्वयं भिक्षा के लिए निकल पड़े।)

परं तत्रत्याः जनाः तेषां प्रियं महाराजं दृष्ट्वा ‘भिक्षायां किं दातव्यम्’ इति सम्भ्रान्ताः सन्तः तस्मै आभरणानि अनर्घवस्तूनि च यच्छन्ति स्म। परं ‘भिक्षायां भोजनपदार्थः देयः’ इति न केनापि चिन्तितम्। फलतः ऋषभदेवस्य दिने दिने सकष्टम् उपवासः करणीयः आपतितम्। कदाचित् ऋषभदेवः भोज्यपदार्थानाम् अभावे चतुःशतं दिनानि नैरन्तर्येण उपवासं कृतवान्।

(हिन्दी — किन्तु वहाँ के लोग अपने प्रिय महाराज को देखकर ‘भिक्षा में क्या दें’ इस बात पर किंकर्तव्यविमूढ़ होकर उन्हें आभूषण तथा अनमोल वस्तुएँ देने लगे। पर ‘भिक्षा में तो भोजन देना चाहिए’ — यह किसी ने सोचा ही नहीं। फलस्वरूप ऋषभदेव को दिन-प्रतिदिन कष्टपूर्वक उपवास करना पड़ा। एक बार तो भोज्य पदार्थों के अभाव में उन्होंने लगातार चार सौ दिन उपवास किया।)

प्रश्नःपाठस्य उत्तरम्हिन्दी
भिक्षार्थं कुतः प्रस्थितः ?अनुयायिनः वृक्षेभ्यः फलानि न चिनुयुः इति बोधनार्थम्शिष्यों को यह सिखाने के लिए कि वृक्ष से स्वयं फल न तोड़ें — स्वयं आचरण करके
प्रजाः किं दत्तवत्यः ?आभरणानि अनर्घवस्तूनि चआभूषण तथा अनमोल वस्तुएँ
किं न दत्तम् ?भोजनपदार्थःभोजन — जो भिक्षा में देना चाहिए था
परिणामः कः ?दिने दिने सकष्टम् उपवासः; कदाचित् चतुःशतं दिनानि नैरन्तर्येण उपवासःरोज़ कष्टपूर्ण उपवास; एक बार लगातार चार सौ दिन का उपवास
यहाँ एक सूक्ष्म बात है: प्रजा ने अनादर नहीं किया — उलटे अति आदर किया, और वही भूल बन गई। वे ‘राजा’ को देख रहे थे, ‘भिक्षु’ को नहीं; इसलिए उन्होंने वही दिया जो राजा को शोभा देता है — आभूषण और अनर्घ वस्तुएँ। पाठ का शब्द ‘सम्भ्रान्ताः’ (किंकर्तव्यमूढाः) यही मनोदशा पकड़ता है। इससे दो बातें सीखने योग्य हैं — (१) दान वही सार्थक है जो लेने वाले की आवश्यकता के अनुसार हो, देने वाले की श्रद्धा के अनुसार नहीं; (२) ऋषभदेव ने न तो माँगा, न शिकायत की — उन्होंने उपवास स्वीकार कर लिया। शिष्यों को नियम सिखाने के लिए वे स्वयं पहले उसे जिए — यही ‘बोधनार्थं स्वयं प्रस्थितः’ का अर्थ है।
व्याकरण-सङ्केत: ‘चिनुयुः’ = √चि (चिनोति), विधिलिङ् लकार, प्र.पु.ब.व. — ‘तोड़ें/चुनें’; निषेध के साथ ‘न चिनुयुः’ = ‘न तोड़ें’। ‘यच्छन्ति स्म’ = √दा (यच्छति) + स्म — भूतकाल का अर्थ। ‘करणीयः’, ‘दातव्यम्’, ‘देयः’ — तीनों कृत्य प्रत्यय (अनीयर्, तव्यत्, यत्) हैं, जो ‘करना चाहिए/देना चाहिए’ का भाव देते हैं। ‘चतुःशतम्’ = चार सौ (विसर्गान्त ‘चतुः’ + शतम्)।
प्र2.
ऋषभदेवस्य दीर्घकालिकः उपवासः कथं समाप्तः ? ‘वर्षितप-पारणा-महोत्सवः’ इति कः उत्सवः, सः कुत्र कथं च आचर्यते ?
उत्तर

एकदा पर्यटनावसरे सः हस्तिनापुरस्य समीपे स्थितस्य इक्षुक्षेत्रस्य पार्श्वमार्गात् गच्छति स्म। तच्च इक्षुक्षेत्रं तस्यैव प्रपौत्रस्य श्रेयांसस्य आसीत्। सः श्रेयांसः प्रपितामहाय पानार्थम् इक्षुरसं दत्तवान्। अनेन ऋषभदेवस्य दीर्घकालिकः उपवासः समाप्तः। तच्च वैशाखमासस्य अक्षयतृतीया-दिनम् आसीत्।

(हिन्दी — एक बार भ्रमण के अवसर पर वे हस्तिनापुर के पास स्थित एक गन्ने के खेत के बगल के रास्ते से जा रहे थे। वह गन्ने का खेत उन्हीं के प्रपौत्र श्रेयांस का था। श्रेयांस ने अपने प्रपितामह को पीने के लिए गन्ने का रस दिया। इसी से ऋषभदेव का दीर्घकालीन उपवास समाप्त हुआ। और वह दिन वैशाख मास की अक्षयतृतीया का दिन था।)

अतः जैनसम्प्रदाये ‘वर्षितप-पारणा-महोत्सवः’ अधुनापि गुजराते पदलिप्तपुरम् (पालीताणा), उत्तरप्रदेशे हस्तिनापुरं चेत्यादिषु पवित्रतीर्थेषु आचर्यते। अत्र त्रयोदशमासानां वैकल्पिकदिनेषु उपवासं कुर्वन्ति। अन्ते अक्षयतृतीयादिने इक्षुरसेन उपवासस्य समापनं कुर्वन्ति।

(हिन्दी — इसीलिए जैन सम्प्रदाय में ‘वर्षितप-पारणा-महोत्सव’ आज भी गुजरात के पदलिप्तपुर — पालीताणा — तथा उत्तर प्रदेश के हस्तिनापुर आदि पवित्र तीर्थों में मनाया जाता है। इसमें तेरह महीनों तक एक दिन छोड़कर एक दिन उपवास किया जाता है और अन्त में अक्षयतृतीया के दिन गन्ने के रस से उपवास का समापन (पारणा) किया जाता है।)

पदम्अर्थःक्यों महत्त्वपूर्ण
इक्षुक्षेत्रम्इक्षोः (मधुदण्डस्य) क्षेत्रम् — गन्ने का खेतपुस्तक की शब्दार्थ-तालिका में यही विग्रह दिया है (षष्ठी-तत्पुरुष)
प्रपौत्रः / प्रपितामहःपुत्रस्य पुत्रस्य पुत्रः / पितुः पितुः पिताश्रेयांस ऋषभदेव के प्रपौत्र थे — इसीलिए ऋषभदेव उनके ‘प्रपितामह’
पारणाउपवासस्य समापनम्व्रत तोड़ने की क्रिया — ‘वर्षितप की पारणा’ इसी दिन होती है
वैकल्पिकदिनेषुएकान्तरदिनेषुएक दिन उपवास, एक दिन आहार — तेरह मास तक
कथा और उत्सव का जोड़: ध्यान दीजिए कि उत्सव में जो-जो होता है, वह कथा के हर विवरण से मेल खाता है — तेरह मास का तप (क्योंकि ऋषभदेव का उपवास बहुत लम्बा था), पारणा इक्षुरस से (क्योंकि श्रेयांस ने गन्ने का रस ही दिया था), और अक्षयतृतीया के दिन (क्योंकि वही दिन था)। स्थान भी वही चुना गया — हस्तिनापुर, जहाँ यह घटना घटी। इस तरह एक परम्परा अपनी मूल कथा को हर वर्ष दोहराकर स्मृति को जीवित रखती है। यह प्रश्न अभ्यास के प्रश्न २ (घ) में सीधे पूछा गया है।
ध्यान दें: ‘तस्यैव’ = तस्य + एव (वृद्धि सन्धि नहीं, यण्/दीर्घ नहीं — यह ‘अ + ए → ऐ’ वृद्धि सन्धि है : तस्य + एव → तस्यैव)। ‘पानार्थम्’, ‘पर्यटनावसरे’ — समासबहुल शैली के उदाहरण। पुस्तक में यह उत्सव-नाम कहीं-कहीं ‘वर्षपपपारणामहोत्सवः’ जैसा अशुद्ध रूप में स्कैन होता है; शुद्ध रूप वर्षितप-पारणा-महोत्सवः है, जैसा मुद्रित पृष्ठ पर दिखता है।
प्र3.
ऋषभदेवः कदा कुत्र च केवलज्ञानं प्राप्तवान् ? ‘आदिनाथः’ इति नाम कथं प्रसिद्धम् ? जनानां मार्गदर्शनार्थं सः कं क्रमं रचितवान् ?
उत्तर

एवं दीर्घकालिकोपवासेन, निरन्तराध्ययनेन कठोरतपसा च ऋषभदेवः फाल्गुनमासस्य कृष्णपक्षे एकादश्यां तिथौ प्रयागराजे अक्षयवटवृक्षस्य अधः केवलज्ञानं प्राप्तवान्।

(हिन्दी — इस प्रकार दीर्घकालीन उपवास से, निरन्तर अध्ययन से और कठोर तप से ऋषभदेव ने फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को प्रयागराज में अक्षयवट वृक्ष के नीचे केवलज्ञान प्राप्त किया।)

प्रश्नःउत्तरम् (पाठस्य शब्दैः)हिन्दी
कदा ?फाल्गुनमासस्य कृष्णपक्षे एकादश्यां तिथौफाल्गुन मास, कृष्ण पक्ष, एकादशी तिथि
कुत्र ?प्रयागराजे अक्षयवटवृक्षस्य अधःप्रयागराज में, अक्षयवट वृक्ष के नीचे
किम् ?केवलज्ञानम् (कैवल्यस्य ज्ञानम्)केवलज्ञान — पूर्ण, निरपेक्ष ज्ञान
केन साधनेन ?दीर्घकालिकोपवासेन, निरन्तराध्ययनेन, कठोरतपसा चलम्बे उपवास, निरन्तर अध्ययन तथा कठोर तप से

‘आदिनाथः’ इति नाम — अयमेव जैनसम्प्रदाये आदिमः तीर्थङ्करः, अतः ‘प्रभुः नाथः’ इत्यतः ‘आदिनाथः’ इति ख्यातः। (हिन्दी — यही जैन सम्प्रदाय के प्रथम तीर्थंकर हैं, और ‘प्रभु-नाथ’ होने के कारण ‘आदिनाथ’ नाम से प्रसिद्ध हुए। ‘आदि’ = प्रथम, ‘नाथ’ = स्वामी — अर्थात् ‘पहले स्वामी’।)

चतुर्विधः सङ्घः — ऋषभदेवः जनानां मार्गदर्शनार्थं भिक्षुः, भिक्षुणी, श्रावकः, श्राविका — चेति क्रमं रचितवान्। स एव क्रमः ‘जैनसङ्घः’ इति प्रसिद्धः वर्तते।

अङ्गम्कः / काहिन्दी
भिक्षुःगृहत्यागी सन्न्यासीसाधु (मुनि)
भिक्षुणीगृहत्यागिनी सन्न्यासिनीसाध्वी
श्रावकःगृहस्थः उपासकःगृहस्थ अनुयायी (पुरुष)
श्राविकागृहस्था उपासिकागृहस्थ अनुयायिनी (स्त्री)
इस ‘क्रम’ की बनावट पर ध्यान दीजिए: संघ में केवल त्यागी ही नहीं, गृहस्थ भी हैं; और दोनों वर्गों में स्त्री तथा पुरुष दोनों हैं। अर्थात् मार्ग किसी एक वर्ग के लिए बन्द नहीं रखा गया — जो सब छोड़ सकता है वह भिक्षु बने, जो घर में रहकर चलना चाहे वह श्रावक बने। इसीलिए पाठ ने इसे ‘जनानां मार्गदर्शनार्थं क्रमः’ कहा है — यह एक व्यवस्था है, जिससे हर स्थिति का व्यक्ति अपने योग्य स्थान पाए। अभ्यास का प्रश्न २ (च) यही पूछता है।
व्याकरण-सङ्केत: ‘दीर्घकालिकोपवासेन’ = दीर्घकालिक + उपवासेन (गुण सन्धि — अ + उ → ओ)। ‘निरन्तराध्ययनेन’ = निरन्तर + अध्ययनेन (दीर्घ सन्धि)। ‘एकादश्याम्’, ‘तिथौ’ — अधिकरणे सप्तमी (‘कब’ का उत्तर)। ‘अक्षयवटवृक्षस्य अधः’ में ‘अधः’ अव्यय है, उसके योग में षष्ठी आती है।
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