शारदा अध्याय 10 णमोकारमहामन्त्रः

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
पाठे दत्तस्य णमोकार (नवकार) महामन्त्रस्य मूलपाठं लिखत, तस्य संस्कृतच्छायाम्, पदशः अर्थम्, हिन्दी-अर्थं भावं च स्पष्टीकुरुत — “णमो अरिहन्ताणं, णमो सिद्धाणं, णमो आयरियाणं, णमो उवज्झायाणं, णमो लोए सव्वसाहूणं”
उत्तर
“णमो अरिहन्ताणं,
णमो सिद्धाणं,
णमो आयरियाणं,
णमो उवज्झायाणं,
णमो लोए सव्वसाहूणं”

सर्वप्रथमं एकं महत्त्वपूर्णं तथ्यम् — पुस्तकम् एव कथयति ‘तेषां परमो मन्त्रः नवकारमन्त्रः इति प्रसिद्धः यच्च प्राकृतभाषायां वर्तते’। अतः अयं मन्त्रः संस्कृतभाषायां नास्ति, प्राकृतभाषायाम् (अर्धमागधीभाषायाम्) अस्ति। (हिन्दी — यह मन्त्र संस्कृत में नहीं, प्राकृत — अर्धमागधी में है; पुस्तक स्वयं यह कहती है। इसीलिए इसमें ‘न’ के स्थान पर ‘ण’, ‘लोके’ के स्थान पर ‘लोए’ और ‘सर्वसाधूनाम्’ के स्थान पर ‘सव्वसाहूणं’ दिखाई देता है।)

पदच्छेदः — णमो + अरिहन्ताणं । णमो + सिद्धाणं । णमो + आयरियाणं । णमो + उवज्झायाणं । णमो + लोए + सव्वसाहूणं ।

संस्कृतच्छाया (पुस्तकस्य अपनी छाया) — पुस्तकं स्वयम् एव अस्य अर्थं संस्कृतेन एवं ददाति — “नमामि अरिहन्तॄन्, नमामि सिद्धान्, नमामि आचार्यान्, नमामि उपाध्यायान्, नमामि लोके सर्वसाधून् इति।

शब्दशः संस्कृतच्छाया (व्याकरणानुसारम्) — नमः अर्हद्भ्यः (अरिहन्तेभ्यः) । नमः सिद्धेभ्यः । नमः आचार्येभ्यः । नमः उपाध्यायेभ्यः । नमः लोके सर्वसाधुभ्यः ।

प्राकृत-पदम्संस्कृत-रूपम्अर्थः (संस्कृतम्)हिन्दी अर्थ
णमोनमःप्रणामःनमस्कार हो
अरिहन्ताणंअर्हताम् / अरिहन्तानाम्जितशत्रूणाम् (पुस्तकस्य शब्दार्थः)अरिहन्तों को — जिन्होंने भीतर के शत्रु (राग, द्वेष, मोह) जीत लिए
सिद्धाणंसिद्धानाम्मुक्तात्मनाम्सिद्धों को — जो पूर्णता को प्राप्त हो चुके
आयरियाणंआचार्याणाम्धर्माचार्याणाम्आचार्यों को — जो संघ का नेतृत्व करते हैं
उवज्झायाणंउपाध्यायानाम्अध्यापकानाम्उपाध्यायों को — जो शास्त्र पढ़ाते हैं
लोएलोकेजगतिलोक में, संसार में
सव्वसाहूणंसर्वसाधूनाम्सर्वेषां साधूनाम्सब साधुओं को

हिन्दी अर्थ — अरिहन्तों को नमस्कार, सिद्धों को नमस्कार, आचार्यों को नमस्कार, उपाध्यायों को नमस्कार, और लोक के सभी साधुओं को नमस्कार।

भावः — इस मन्त्र की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें किसी व्यक्ति का नाम नहीं है। यह न ऋषभदेव को नमस्कार करता है, न महावीर को — यह गुण को नमस्कार करता है : जिसने भीतरी शत्रु जीत लिए (अरिहन्त), जो पूर्ण हो गया (सिद्ध), जो मार्ग दिखाता है (आचार्य), जो पढ़ाता है (उपाध्याय), और जो साधना कर रहा है (साधु)। इसीलिए पुस्तक कहती है — ‘वसुधैवकुटुम्बकम् इत्यस्य अनुरूपेण विश्वशान्त्यै कोटिशैः जनैः गीयमानः परमो मन्त्रः अयं णमोकारमन्त्रः’, अर्थात् वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना के अनुरूप विश्वशान्ति के लिए करोड़ों लोगों द्वारा गाया जाने वाला परम मन्त्र। पाँच पदों का क्रम भी सोचा हुआ है — ऊपर से नीचे नहीं, बल्कि सिद्धि से साधना तक, ताकि साधक स्वयं को उसी श्रेणी की अन्तिम कड़ी में देख सके।
दो व्याकरण-टिप्पणियाँ: (१) संस्कृत में ‘नमः’ के योग में चतुर्थी विभक्ति आती है — नियम है «नमःस्वस्तिस्वाहास्वधालंवषड्योगाच्च» — इसीलिए शुद्ध संस्कृत छाया ‘नमः अर्हद्भ्यः’ है। पुस्तक ने सरलता के लिए ‘नमामि + द्वितीया’ (नमामि अरिहन्तॄन्) रूप चुना है, जो भी प्रयुक्त होता है (√नम् धातु के साथ कर्म द्वितीया में)। (२) प्राकृत का ‘-आणं’ अन्त षष्ठी/चतुर्थी बहुवचन है; पुस्तक की शब्दार्थ-तालिका भी ‘अरिहन्ताणम् (पुं.ष.ब.व.) = जितशत्रूणाम्’ ही लिखती है। वर्तनी-सङ्केत: पाठ के भीतर मन्त्र में अन्त्य अनुस्वार है — ‘अरिहन्ताणं’; किन्तु पाठ का शीर्षक संस्कृतीकृत रूप में ‘णमो अरिहन्ताणम्’ छपा है। दोनों एक ही पद हैं।
प्र2.
मन्त्रस्य प्राकृत-पदानि संस्कृत-पदेभ्यः कथं जातानि ? ध्वनिपरिवर्तनस्य नियमान् उदाहरणसहितं लिखत।
उत्तर

मूल बात पहले: प्राकृत संस्कृत का ‘बिगड़ा हुआ रूप’ नहीं है — वह उसी धारा का सरल, बोलचाल वाला प्रवाह है, जैसा पुस्तक स्वयं कहती है : ‘संस्कृतं यदि स्रोतस्विनी नदी, तर्हि प्राकृतं तस्या एव सरलः प्रवाहः अस्ति’। बोलचाल में जीभ कठिन ध्वनियों को सरल कर देती है, और यह सरलीकरण नियमबद्ध होता है — मनमाना नहीं। नीचे पहले नियम, फिर उसी नियम से मन्त्र का हर पद।

प्राकृत के मुख्य ध्वनि-नियम (संस्कृत → प्राकृत) —

क्र.नियमउदाहरण
दो स्वरों के बीच का क्, ग्, च्, ज्, त्, द्, प्, य्, व् प्रायः लुप्त हो जाता हैलोके → लो · बालकः → बाल · खादामि → खामि · पिबति → पिव
दो स्वरों के बीच का महाप्राण ख्, घ्, थ्, ध्, फ्, भ् → ह्साधु → साहु · मुखम् → मुहं · मेघः → मेहो
संयुक्त व्यंजन नहीं टिकते — या तो समीकरण होकर द्वित्व बनता है, या स्वरभक्ति से वे अलग हो जाते हैंसर्व → सव्व · विद्यालय → विज्जालय · मित्रम् → मित्तं · अस्ति → अत्थि · आचार्य → आयरिय
‘र्’ किसी व्यंजन से पहले हो तो लुप्त हो जाता है और आगे वाला व्यंजन दुगुना हो जाता हैसर्व → सव्व · कर्म → कम्म · धर्म → धम्म
‘न्’ प्रायः ण् हो जाता है (जैन प्राकृत की पहचान)नमः → मो · सिद्धानाम् → सिद्धाणं · फलानि → फलाणि
तीनों ऊष्म वर्ण श्, ष्, स् मिलकर एक स् रह जाते हैंएषः → सो · पुरुषः → पुरिसो
ऋ, ऐ, औ स्वर नहीं रहते — उनके स्थान पर अ/इ/उ अथवा ए/ओ आते हैंऋषभः → उसहो · अर्हत् → अरिहन्त
शब्द के अन्त में केवल अनुस्वार बचता है, शेष व्यंजन गिर जाते हैंमित्रम् → मित्तं · -आनाम् → -आणं

अब इन्हीं नियमों से मन्त्र का प्रत्येक पद —

प्राकृत-पदम्संस्कृत-रूपम्कौन-कौन-सा नियम लगा
णमोनमःनियम ५ — शब्दारम्भ का न् → ण्; और ‘नमः’ का सन्धिज रूप ‘नमो’ ज्यों का त्यों बना रहा
अरिहन्ताणंअर्हताम् (अरिहन्तानाम्)नियम ७ — ‘अर्’ में स्वरभक्ति से ‘अरि’; नियम ५ + ८ — षष्ठी बहुवचन -आनाम् → -आणं (न् → ण्, अन्त्य म् → अनुस्वार)
सिद्धाणंसिद्धानाम्नियम ५ + ८ — -आनाम् → -आणं। ‘सिद्ध’ में द्ध पहले से ही सवर्ण-द्वित्व है, अतः वह अपरिवर्तित रहा
आयरियाणंआचार्याणाम्नियम १ — स्वरों के बीच का च् घिसकर य् हो गया (आचा → आया); नियम ३ — संयुक्त ‘र्य’ स्वरभक्ति से ‘रिय’ बना; नियम ५ + ८ — -आणं
उवज्झायाणंउपाध्यायानाम्नियम १ — प् → व् (उपा → उव); नियम ३ — संयुक्त ‘ध्य’ का समीकरण होकर ज्झ बना (अध्या → ज्झा); नियम ५ + ८ — -आणं
लोएलोकेनियम १ — दो स्वरों के बीच का क् पूरा लुप्त (लो-के → लो-ए); सप्तमी एकवचन का ‘-ए’ बना रहा
सव्वसाहूणंसर्वसाधूनाम्नियम ४ — सर्व → सव्व (र् लुप्त, व् दुगुना); नियम २ — साधु → साहु (ध् → ह्); नियम ५ + ८ — -ऊनाम् → -ऊणं
एक नियम पूरा खोलकर देखिए — ‘लोके → लोए’: संस्कृत में ‘लो-के’ के बीच में क् है। बोलते समय दो स्वरों के बीच का व्यंजन सबसे कमज़ोर होता है, क्योंकि जीभ को वहाँ रुकना पड़ता है। पहले वह क् घिसकर ‘ग’ जैसा मृदु हुआ, फिर पूरा गिर गया — बचे केवल दो स्वर : लो + ए = लोए। यही प्रक्रिया हिन्दी तक चली आई है — संस्कृत ‘लोक’ से प्राकृत ‘लोअ’ और आगे ‘लोग’; संस्कृत ‘कर्म’ से प्राकृत ‘कम्म’ और हिन्दी ‘काम’; संस्कृत ‘सर्व’ से प्राकृत ‘सव्व’ और हिन्दी ‘सब’। इसलिए प्राकृत पढ़ना संस्कृत और अपनी आज की भाषा के बीच का लुप्त पुल देख लेना है।
अर्धमागधी क्यों कहलाती है: पुस्तक कहती है ‘जैनागमाः अर्धमागधीभाषायां लिखिताः’। ‘अर्ध-मागधी’ का अर्थ है ‘आधी मागधी’ — इसमें मागधी प्राकृत के कुछ लक्षण हैं (जैसे पुल्लिङ्ग प्रथमा एकवचन में ‘-ए’ रूप भी मिलता है), किन्तु मागधी के दो प्रसिद्ध लक्षण — र् → ल् तथा स् → श् (जैसे शुद्ध मागधी में ‘पुरुषः’ → ‘पुलिशे’) — इसमें नहीं मिलते। इसीलिए हमारे मन्त्र में ‘अरिहन्त’ का र् ज्यों का त्यों है और ‘सव्वसाहूणं’ का स् भी ‘स’ ही रहा — यदि यह शुद्ध मागधी होती तो ‘अलिहन्त’ और ‘शव्वशाहूणं’ मिलता। यही अन्तर पहचानना कक्षा ९ के स्तर की असली परख है।
प्र3.
‘पञ्चपरमेष्ठिनः’ के ? ‘नवकारमहामन्त्रदिवसः’ इति कः दिवसः, सः कदा कथं च आचर्यते ? — पाठस्य आधारेण लिखत।
उत्तर

एषः मन्त्रः पञ्चपरमेष्ठिभ्यः — अरिहन्तारः, सिद्धाः, आचार्याः, उपाध्यायाः, सर्वे साधवः च — प्रणामं समर्पयति। (पुस्तकस्य शब्दाः)

(हिन्दी — यह मन्त्र पाँच परमेष्ठियों को — अरिहन्त, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय तथा सभी साधु — प्रणाम अर्पित करता है।)

क्र.परमेष्ठीपुस्तक/परम्परा के अनुसार कौनमन्त्र की पंक्ति
अरिहन्तारःजितशत्रवः — जिन्होंने भीतरी शत्रु जीत लिएणमो अरिहन्ताणं
सिद्धाःजो पूर्णता (सिद्धि) को प्राप्त हो चुकेणमो सिद्धाणं
आचार्याःधर्मसंघ का मार्गदर्शन करने वालेणमो आयरियाणं
उपाध्यायाःशास्त्र पढ़ाने वालेणमो उवज्झायाणं
सर्वे साधवःलोक के सब साधु — जो साधना-पथ पर हैंणमो लोए सव्वसाहूणं

नवकारमहामन्त्रदिवसः — पुस्तकं कथयति — ‘प्रतिवर्षम् अप्रैल-मासस्य नवमे दिनाङ्के जैनजनाः सामूहिकरूपेण अस्य मन्त्रस्य जपादिकं कृत्वा उत्सवम् आचरन्ति। अतः अस्य दिवसस्य ‘नवकारमहामन्त्रदिवसः’ इति ख्यातिः वर्तते।’

(हिन्दी — हर वर्ष 9 अप्रैल को जैन लोग सामूहिक रूप से इस मन्त्र का जप आदि करके उत्सव मनाते हैं; इसीलिए इस दिन को ‘नवकार महामन्त्र दिवस’ कहा जाता है। यही प्रश्न ‘यस्तु क्रियावान् मनुजः स विद्वान्’ के तीसरे क्रियाकलाप में कक्षा के सामने बोलने के लिए दिया गया है।)

‘परमेष्ठी’ शब्द को खोलिए: परमे + स्थी = ‘जो परम (सर्वोच्च) स्थान पर स्थित है’। ध्यान दीजिए कि यह सूची पद की सूची नहीं, अवस्था की सूची है — इनमें से चार तो अभी भी साधना कर रहे मनुष्य हैं (आचार्य, उपाध्याय, साधु और अरिहन्त)। इसीलिए मन्त्र में कोई नाम नहीं आता : जो भी उस अवस्था तक पहुँचे, नमस्कार उसी को है। पुस्तक इसी कारण इसे ‘सर्वेषां जैनानां परमपावनः मन्त्रः’ कहती है।
प्र4.
जैनमतस्य प्रमुखान् सिद्धान्तान्, त्रीणि रत्नानि, पञ्चमहाव्रतानि च पाठस्य आधारेण लिखत।
उत्तर

जैनमतस्य प्रमुखाः सिद्धान्ताः (पुस्तकस्य शब्दैः) —

सिद्धान्तःपुस्तकस्य व्याख्याहिन्दी
अहिंसा परमो धर्मःमनसा, वाचा, कर्मणा च अहिंसापालनम्अहिंसा ही सबसे बड़ा धर्म है — मन से, वाणी से और कर्म से अहिंसा का पालन
अनेकान्तवादःसत्यस्य अनेके पक्षाः भवन्तिसत्य के अनेक पक्ष होते हैं — कोई एक दृष्टि पूरा सत्य नहीं
स्याद्वादःप्रत्येकं वचनं सापेक्षं ‘स्यादिति’ रूपेण ग्राह्यम्हर कथन सापेक्ष है, उसे ‘स्यात्’ (किसी अपेक्षा से) लगाकर ग्रहण करना चाहिए
अपरिग्रहःआवश्यकात् अधिकं संग्रहः न करणीयःआवश्यकता से अधिक संग्रह नहीं करना चाहिए

त्रीणि रत्नानि — एतेषां दर्शनानां मध्ये सम्यग्दर्शनम्, सम्यग्ज्ञानम्, सम्यक्चरित्रम् इति त्रीणि रत्नानि उच्यन्ते।

रत्नम्अर्थःहिन्दी
सम्यग्दर्शनम्सम्यक् दृष्टिः, यथार्थश्रद्धासही दृष्टि — वस्तु को जैसी है वैसा देखना
सम्यग्ज्ञानम्यथार्थं ज्ञानम्सही ज्ञान
सम्यक्चरित्रम्यथार्थम् आचरणम्सही आचरण

पञ्चमहाव्रतानि — तथा च प्राणिमात्रहिताय सत्यम्, अहिंसा, अस्तेयम्, अपरिग्रहः, ब्रह्मचर्यं च आचरितुं कल्याणकरम् इति निगद्यते।

महाव्रतम्अर्थः (संस्कृतम्)हिन्दी अर्थ
सत्यम्यथार्थवचनम्सच बोलना
अहिंसाप्राणिनां पीडनस्य वर्जनम्किसी प्राणी को मन-वचन-कर्म से न सताना
अस्तेयम्न स्तेयम् — अदत्तस्य अग्रहणम्चोरी न करना — बिना दी हुई वस्तु न लेना
अपरिग्रहःआवश्यकात् अधिकं संग्रहस्य वर्जनम्आवश्यकता से अधिक संग्रह न करना
ब्रह्मचर्यम्इन्द्रियसंयमःसंयम का पालन
अनेकान्तवाद और स्याद्वाद का अन्तर: दोनों जुड़े हुए हैं पर एक नहीं। अनेकान्तवाद वस्तु के विषय में कहता है — सत्य के अनेक पक्ष हैं। स्याद्वाद उसे बोलने का ढंग बताता है — इसलिए हर कथन ‘स्यात्’ (किसी अपेक्षा से) जोड़कर कहो। जैसे — ‘स्यात् घटः अस्ति’ अर्थात् ‘एक दृष्टि से घड़ा है’। इसका व्यावहारिक फल यह है कि विवाद घटता है : मैं जो देख रहा हूँ वह सत्य का एक पक्ष है, दूसरे का देखा हुआ भी एक पक्ष हो सकता है। कक्षा में, घर में और समाज में यह बहुत काम की दृष्टि है। ध्यान रखिए — ये सब पुस्तक द्वारा दिए गए जैनदर्शन के सिद्धान्त हैं; उत्तर लिखते समय ‘जैनमतस्य सिद्धान्ताः’ कहकर ही लिखिए, जैसा पाठ करता है।
व्याकरण-सङ्केत: ‘अस्तेयम्’ = न + स्तेयम् (नञ्-तत्पुरुष) — ‘स्तेय’ का अर्थ चोरी। ‘अपरिग्रहः’ भी नञ्-तत्पुरुष है, पुस्तक की शब्दार्थ-तालिका में यही समास-नाम दिया गया है। ‘सम्यग्दर्शनम्’ = सम्यक् + दर्शनम् (क् + द → ग्, व्यञ्जनसन्धि / जश्त्व)। ‘मनसा, वाचा, कर्मणा’ — तीनों तृतीया एकवचन (करण), अर्थात् ‘मन से, वाणी से, कर्म से’।
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