शारदा अध्याय 10 सर्वं शब्देन भासते

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
‘सर्वं शब्देन भासते’ इति तालिकायाः अन्तिमः स्तम्भः — ‘मातृभाषया अर्थं लिखत’ — रिक्तः अस्ति। पाठे प्रयुक्तानां सर्वेषां शब्दानाम् अर्थान् ज्ञात्वा तं स्तम्भं पूरयत।
उत्तर

पुस्तक में यह अन्तिम स्तम्भ जान-बूझकर खाली छोड़ा गया है — विद्यार्थी को हर शब्द का अर्थ अपनी मातृभाषा में लिखना है। नीचे पूरी तालिका दी गई है और वह स्तम्भ हिन्दी (हमारी माध्यम-भाषा) में भर दिया गया है। जिनकी मातृभाषा मराठी, बाङ्ग्ला, गुजराती, तमिऴ, तेलुगु, कन्नड, ओड़िआ या कोई अन्य भारतीय भाषा है, वे इसी अर्थ के आधार पर अपनी भाषा का शब्द रखें।

शब्दःअर्थः (संस्कृतम्)हिन्दीEnglishमातृभाषया अर्थम् (भरा हुआ — हिन्दी)
अचिन्तयत् (√चिन्त्+लङ्, प्र.पु.ए.व.)चिन्तितवान्विचार कियाConsideredसोचा, मन में विचार किया
अधीतविद्यः (बहुव्रीहि, पुं.प्र.ए.व.)अधीता विद्या येनपढ़ा-लिखाLearnedजिसने विद्या पढ़ ली हो, विद्वान्
अनर्घवस्तूनि (कर्मधारय, नपुं.प्र.ब.व.)अनर्घाणि वस्तूनिअनमोल वस्तुएँPrecious itemsबहुमूल्य चीज़ें, जिनका मोल न आँका जा सके
अनुयायिनः (पुं.प्र.ब.व.)अनुगामिनःअनुयायीFollowersपीछे-पीछे चलने वाले, शिष्य
अनेकान्तवादः (पुं.प्र.ए.व.)सत्यस्य बहुपक्षवादःअनेकान्तवादDoctrine of multiplicity of view pointsयह मत कि सत्य के अनेक पक्ष होते हैं
अपरिग्रहः (नञ्-तत्पुरुषः, प्र.ए.व.)न परिग्रहःआवश्यकता से अधिक ग्रहण न करनाNon-possessionज़रूरत से ज़्यादा जोड़कर न रखना
अरिहन्ताणम् (पुं.ष.ब.व.)जितशत्रूणाम्अरिहन्तों काConquerors of enemies (Arihantas)उनका जिन्होंने भीतरी शत्रु (राग-द्वेष) जीत लिए
आरम्भे (पुं.स.ए.व.)आदौआरम्भ मेंAt the beginningशुरुआत में, सबसे पहले
आलस्यम् (नपुं.प्र.ए.व.)प्रमादःआलस्यLazinessसुस्ती, काम से जी चुराना
इक्षुक्षेत्रम् (षष्ठी-तत्पुरुषः, नपुं.प्र.ए.व.)इक्षोः (मधुदण्डस्य) क्षेत्रम्गन्ने का खेतSugarcane fieldईख का खेत
उत्पादनक्षमता (स्त्री.प्र.ए.व.)उत्पादनस्य क्षमताउत्पादन की क्षमताProductivityपैदा करने की शक्ति, उपज देने का सामर्थ्य
उपवासः (पुं.प्र.ए.व.)निराहारव्रतम्उपवासFastingबिना भोजन के रहने का व्रत
कठोरतपसा (कर्मधारय, पुं.तृ.ए.व.)कठोरेण तपसाकठोर तप सेWith severe penanceकड़ी तपस्या से
करुणाशालिनी (स्त्री.प्र.ए.व.)दयायुक्तादयालुCompassionateदया से भरी हुई, करुणामयी
केवलज्ञानम् (नपुं.प्र./द्वि.ए.व.)कैवल्यस्य ज्ञानम्केवलज्ञानAbsolute knowledgeपूर्ण, निरपेक्ष ज्ञान — जिसके आगे कुछ जानना शेष न रहे
तीर्थङ्करः (पुं.प्र.ए.व.)धर्ममार्गप्रदर्शकःतीर्थंकरTirthankaraधर्म का मार्ग दिखाने वाला, तीर्थ (घाट) बनाने वाला
दुर्भिक्षम् (अव्ययीभावः, नपुं.प्र.ए.व.)भिक्षायाः अभावःअकालFamineअन्न का अभाव, सूखा-अकाल
दैवाधीनम् (षष्ठी-तत्पुरुषः, नपुं.प्र./द्वि.ए.व.)दैवस्य अधीनम्भाग्य के अधीनDependent on fateनियति के वश में, भाग्य पर निर्भर
नवकारमन्त्रः (पुं.प्र.ए.व.)जैनप्रार्थनामन्त्रःनवकार मंत्रNavkar mantraजैन परम्परा का मूल प्रार्थना-मन्त्र (णमोकार मन्त्र)
नित्योपयोगिवस्तूनाम् (नपुं.ष.ब.व.)प्रतिदिनोपयोगिनां वस्तूनाम्नित्य उपयोग की वस्तुओं केDaily essentialsरोज़ काम आने वाली चीज़ों का
निराहारम् (पुं./नपुं.प्र./द्वि.ए.व.)भोजनरहितम्निराहारWithout foodबिना खाए, भोजन-रहित
न्यायिकव्यवस्था (स्त्री.प्र.ए.व.)न्यायसंबन्धिनी व्यवस्थान्याय व्यवस्थाJudicial systemन्याय करने का प्रबन्ध, अदालती व्यवस्था
परित्यज्य (कृदन्त, परि+√त्यज्+ल्यप्)त्यक्त्वात्यागकरAbandoningछोड़कर, पूरी तरह त्याग देकर
परिष्काराय (पुं.च.ए.व.)निवारणायसमाधान के लिएFor rectificationसुधार के लिए, दूर करने के लिए
परिहृताः (पुं.प्र.ब.व.)निवारिताःनिवारण कियाSolvedदूर कर दी गईं, हल हो गईं
प्रजानाम् (स्त्री.ष.ब.व.)जनानाम्प्रजाओं काOf citizensप्रजा का, नागरिकों का
प्रशासनादिषु (नपुं.स.ब.व.)शासनक्रियासुप्रशासन आदि मेंIn administration etc.राज-काज चलाने के कामों में
ब्राह्मीलिपिः — मध्यपदलोपी (कर्मधारयः, स्त्री.प्र.ए.व.)ब्राह्मीनाम्नी लिपिःब्राह्मी लिपिBrahmi scriptब्राह्मी नाम की लिपि — भारत की प्राचीनतम लिपियों में से एक
भिक्षार्थम् (नपुं.द्वि.ए.व.)याच्ञायैभिक्षा के लिएFor almsभीख माँगने के लिए, भिक्षाटन हेतु
युद्धतन्त्रे (नपुं.स.ए.व.)संग्रामशास्त्रेयुद्ध-तंत्र मेंIn war-strategyयुद्ध की रणनीति में
राजनीतौ (स्त्री.स.ए.व.)राजधर्मेराजनीति मेंIn politicsशासन-नीति में, राजधर्म में
विद्वेषः (पुं.प्र.ए.व.)वैरम्द्वेषHatredआपसी बैर, दुश्मनी
विधिलिखितम् (तृतीया-तत्पुरुषः, नपुं.प्र./द्वि.ए.व.)विधिना लिखितम्नियति-निर्धारितPredestinedभाग्य का लिखा हुआ, पहले से तय
वियोगः (पुं.प्र.ए.व.)पृथक्करणम्वियोगSeparationबिछोह, अलग हो जाना
विक्षुब्धम् (नपुं.प्र./द्वि.ए.व.)उद्विग्नम्विचलितAgitatedबेचैन, हिल गया हुआ
शाश्वतम् (नपुं.प्र./द्वि.ए.व.)नित्यम्शाश्वतEternalसदा रहने वाला, अमर
शिलालेखाः (पुं.प्र.ब.व.)शिलासु लिखिताः लेखाःशिला-लेखInscriptionsपत्थरों पर खुदे हुए लेख
सङ्घः (पुं.प्र.ए.व.)समूहःसंघCommunityसमुदाय, संगठित समूह
समाधानोपायाः (पुं.प्र.ब.व.)निवारणमार्गाःसमाधान के उपायSolutionsहल करने के रास्ते
सम्भ्रान्ताः (पुं.प्र.ब.व.)किंकर्तव्यमूढाःविस्मय के साथPerplexedकिंकर्तव्यविमूढ़ — यह न सूझना कि क्या करें
संयोगः (पुं.प्र.ए.व.)मेलनम्संयोगUnionमिलन, साथ आ जाना
सुप्रतिष्ठितम् (नपुं.प्र./द्वि.ए.व.)दृढरूपेण स्थापितम्अच्छी तरह स्थापितWell establishedमज़बूती से जमा हुआ
नमूना उत्तर (अन्य मातृभाषाओं में) — मराठी: उपवासः = ‘उपास’, विद्वेषः = ‘द्वेष / वैर’, शिलालेखाः = ‘शिलालेख’, आलस्यम् = ‘आळस’। गुजराती: इक्षुक्षेत्रम् = ‘शेरडी नुं खेतर’, अनर्घवस्तूनि = ‘अमूल्य वस्तुओ’। बाङ्ग्ला: सङ्घः = ‘संघ’, दुर्भिक्षम् = ‘दुर्भिक्ष’, शाश्वतम् = ‘चिरन्तन’। तमिऴ: केवलज्ञानम् = ‘मुऴु अऱिवु’, अहिंसा = ‘अहिंसै’। ध्यान रखिए कि अपनी भाषा में लिखते समय अर्थ वही रहे जो संस्कृत स्तम्भ में दिया गया है।
तालिका पर एक नज़र डालिए और देखिए वह क्या सिखा रही है: ४२ में से लगभग आधे शब्द समास हैं और तालिका ने कोष्ठक में उनका प्रकार भी दे रखा है — कर्मधारय (अनर्घवस्तूनि, कठोरतपसा), षष्ठी-तत्पुरुष (इक्षुक्षेत्रम्, दैवाधीनम्), तृतीया-तत्पुरुष (विधिलिखितम्), नञ्-तत्पुरुष (अपरिग्रहः), अव्ययीभाव (दुर्भिक्षम्), बहुव्रीहि (अधीतविद्यः) तथा मध्यपदलोपी कर्मधारय (ब्राह्मीलिपिः)। अर्थात् यह केवल अर्थ-सूची नहीं, अभ्यास के प्रश्न ३ की तैयारी है। शब्दार्थ रटने के बजाय हर शब्द का विग्रह बोलकर देखिए — तब समास अपने आप याद रह जाएगा।
प्र2.
शब्दार्थ-तालिकायां कोष्ठके ये सङ्केताः दत्ताः — यथा ‘(नपुं.प्र./द्वि.ए.व.)’, ‘(पुं.ष.ब.व.)’, ‘(कृदन्त, परि+√त्यज्+ल्यप्)’ — तेषाम् अर्थं स्पष्टीकुरुत। एतैः सङ्केतैः कः लाभः ?
उत्तर

ये कोष्ठक-सङ्केत शब्द का ‘पता’ बताते हैं — अर्थात् वह शब्द किस लिङ्ग, किस विभक्ति और किस वचन में पाठ में आया है। इन्हें पढ़ना आना चाहिए, तभी शब्दार्थ का पूरा उपयोग होता है।

सङ्केतःपूर्ण रूपअर्थतालिका का उदाहरण
पुं. / स्त्री. / नपुं.पुंलिङ्गम् / स्त्रीलिङ्गम् / नपुंसकलिङ्गम्लिङ्गकरुणाशालिनी (स्त्री.), आलस्यम् (नपुं.)
प्र. / द्वि. / तृ. / च. / पं. / ष. / स.प्रथमा, द्वितीया, तृतीया, चतुर्थी, पञ्चमी, षष्ठी, सप्तमीविभक्तिपरिष्काराय (.ए.व. — ‘के लिए’), राजनीतौ (.ए.व. — ‘में’)
ए.व. / द्वि.व. / ब.व.एकवचनम् / द्विवचनम् / बहुवचनम्वचनअनुयायिनः (ब.व. — अनेक), उपवासः (ए.व.)
प्र.पु.प्रथमपुरुषःक्रिया का पुरुषअचिन्तयत् (√चिन्त् + लङ्, प्र.पु.ए.व.)
लङ्लङ् लकारःअनद्यतन भूतकालअचिन्तयत् = ‘उसने विचार किया’
धातुःक्रिया का मूल√चिन्त्, √त्यज्
ल्यप्क्त्वा-प्रत्ययस्य आदेशः (उपसर्गयुक्ते)उपसर्ग हो तो ‘क्त्वा’ के स्थान पर ‘ल्यप्’परि + √त्यज् + ल्यप् = परित्यज्य
प्र./द्वि.प्रथमा अथवा द्वितीयानपुंसकलिङ्ग में दोनों रूप समान होते हैं, अतः दोनों लिखे जाते हैंकेवलज्ञानम्, शाश्वतम्, विक्षुब्धम्
इन सङ्केतों का असली लाभ: संस्कृत में उत्तर उसी विभक्ति में देना पड़ता है जिस विभक्ति में प्रश्न पूछा गया है। तालिका पहले ही बता देती है कि ‘परिष्काराय’ चतुर्थी है (‘किसके लिए?’ का उत्तर), ‘राजनीतौ’ सप्तमी है (‘किसमें?’ का उत्तर) और ‘प्रजानाम्’ षष्ठी है (‘किसका?’ का उत्तर)। इसीलिए अभ्यास के प्रश्न १ में ‘कस्यां लिप्याम्’ पूछने पर उत्तर ब्राह्मीलिप्याम् (सप्तमी) आएगा, ‘कस्मै’ पूछने पर भरताय (चतुर्थी) और ‘किं राज्यम्’ पूछने पर तक्षशिलाम् (द्वितीया)। प्रश्न का विभक्ति-रूप ही उत्तर का विभक्ति-रूप तय करता है — यह नियम याद रख लीजिए, आधा अभ्यास इसी से सध जाता है।
ध्यान दें: ‘नपुं.प्र./द्वि.ए.व.’ ऐसा दो-में-से-एक वाला सङ्केत इसलिए दिया जाता है क्योंकि नपुंसकलिङ्ग में प्रथमा तथा द्वितीया के रूप सदा समान होते हैं (फलम् — प्रथमा भी, द्वितीया भी)। किस विभक्ति में है, यह वाक्य में क्रिया देखकर तय होता है — ‘केवलज्ञानं प्राप्तवान्’ में यह कर्म है, अतः द्वितीया।
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