शारदा अध्याय 10 अत्र इदम् अवधेयम्

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
‘अत्र इदम् अवधेयम्’ इति शीर्षकाधः दत्तस्य ‘प्राकृतभाषा’ इति गद्यांशस्य आशयं लिखत।
उत्तर

पुस्तकस्य शब्दाः — “भारते भाषासम्पदा अतीव समृद्धा अस्ति। कस्मिंश्चित् कालघट्टे अनेकाः प्राकृतभाषाः सामान्यजनानां संवादोपयोगिन्यः आसन्।”

आशयः — भारतस्य भाषासम्पत् अतीव समृद्धा अस्ति। कस्मिंश्चित् कालखण्डे अनेकाः प्राकृतभाषाः सामान्यजनानां परस्परसंवादाय उपयोगिन्यः आसन्। जैनागमाः अर्धमागधीभाषायां लिखिताः। महाराष्ट्रीप्राकृते महाकविः हालः ‘गाथासप्तशती’ इति सुप्रसिद्धं काव्यं लिखितवान्। शौरसेनीप्राकृते बहवः नाट्यग्रन्थाः रचिताः सन्ति। अनेन ज्ञायते यत् प्राकृतभाषा न केवलं संवादोपयोगिनी, अपितु उच्चकोटिसाहित्यस्य वाहिनी आसीत्।

(हिन्दी — भारत में भाषाओं की सम्पत्ति अत्यन्त समृद्ध है। किसी कालखण्ड में अनेक प्राकृत भाषाएँ साधारण लोगों की बोलचाल के काम आती थीं। जैन आगम अर्धमागधी में लिखे गए। महाराष्ट्री प्राकृत में महाकवि हाल ने ‘गाथासप्तशती’ नाम का सुप्रसिद्ध काव्य लिखा। शौरसेनी प्राकृत में अनेक नाट्यग्रन्थ रचे गए। इससे जाना जाता है कि प्राकृत भाषा केवल बातचीत के काम की नहीं थी, बल्कि उच्च कोटि के साहित्य की वाहिका भी थी।)

तथ्यम्पाठस्य वाक्यम्हिन्दी
प्राकृत किसकी भाषा थीसामान्यजनानां संवादोपयोगिन्यः आसन्आम लोगों की बोलचाल की भाषाएँ
जैनागम किसमेंजैनागमाः अर्धमागधीभाषायां लिखिताःजैन आगम अर्धमागधी में लिखे गए
गाथासप्तशतीमहाराष्ट्रीप्राकृते महाकविः हालः … लिखितवान्महाराष्ट्री प्राकृत में महाकवि हाल की रचना
नाट्यग्रन्थशौरसेनीप्राकृते बहवः नाट्यग्रन्थाः रचिताःशौरसेनी प्राकृत में अनेक नाटक-ग्रन्थ
निष्कर्षन केवलं संवादोपयोगिनी अपितु उच्चकोटिसाहित्यस्य वाहिनी आसीत्केवल बोलचाल नहीं, ऊँचे दर्जे के साहित्य की वाहक भी
यह अंश इसी पाठ में क्यों है: पाठ का शीर्षक ही प्राकृत का वाक्य है — ‘णमो अरिहन्ताणं’। यदि विद्यार्थी को यह न बताया जाए कि प्राकृत क्या है, तो शीर्षक ही अबूझ रह जाएगा। इसीलिए पुस्तक ने ठीक शब्दार्थ-तालिका के बाद यह टिप्पणी रखी। और ध्यान दीजिए — पुस्तक प्राकृत को छोटी भाषा नहीं कहती; वह जोर देकर कहती है ‘न केवलं संवादोपयोगिनी अपितु उच्चकोटिसाहित्यस्य वाहिनी’। भाषा का बड़ा-छोटा होना उसके बोलने वालों की सामाजिक स्थिति से नहीं, उसमें रचे गए साहित्य से तय होता है — यही इस वाक्य का सन्देश है।
‘आगम’ शब्द: जैन परम्परा में मूल शास्त्रों को ‘आगम’ कहते हैं (आ + √गम् — ‘जो परम्परा से चला आया’)। पुस्तक कहती है कि वे अर्धमागधी में हैं — इसीलिए णमोकार मन्त्र भी उसी भाषा में है। ‘कालघट्टे’ = कालखण्डे, ‘किसी कालखण्ड में’ — ‘घट्ट’ का अर्थ है खण्ड/पड़ाव।
प्र2.
पाठे कति प्राकृतभाषाः उल्लिखिताः ? तासां नामानि लिखत तथा च प्रत्येकस्याः विषये यत् पाठे उक्तं तत् लिखत।
उत्तर

पाठे सप्त प्राकृतभाषाः नामतः उल्लिखिताः, अन्ते ‘इत्यादयः’ इति पदेन सूचितं यत् एताः एव न, अपराः अपि सन्ति।

क्र.प्राकृतभाषापाठ में इसके विषय में क्या कहा गया
आर्षप्राकृतम्केवल नाम दिया गया है। (‘आर्ष’ = ऋषियों की — सबसे पुरानी प्राकृत, जिसे अर्धमागधी से जोड़ा जाता है)
मागधीप्राकृतम्केवल नाम। (मगध की भाषा; ‘अर्धमागधी’ नाम इसी से बना है — ‘आधी मागधी’)
शौरसेनीप्राकृतम्शौरसेनीप्राकृते बहवः नाट्यग्रन्थाः रचिताः सन्ति — इसमें अनेक नाटक-ग्रन्थ रचे गए (शूरसेन = मथुरा का क्षेत्र)
महाराष्ट्रीप्राकृतम्महाकविः हालः ‘गाथासप्तशती’ इति सुप्रसिद्धं काव्यं लिखितवान् — इसमें महाकवि हाल ने गाथासप्तशती लिखी
पैशाचिप्राकृतम्केवल नाम दिया गया है
चूलिकाप्राकृतम्केवल नाम दिया गया है
अपभ्रंशप्राकृतम्‘इत्यादयः’ के साथ अन्तिम नाम — प्राकृत की सबसे बाद की अवस्था

तथा — जैनागमाः अर्धमागधी भाषायां लिखिताः — इति अष्टमी भाषा नामतः पाठे आगता, यद्यपि सा सूचीमध्ये न गणिता।

इस सूची को क्रम में देखिए: यह केवल नामों की सूची नहीं, भारतीय भाषा-इतिहास का एक पूरा सोपान है। सबसे ऊपर संस्कृत; उससे निकली अनेक प्राकृतें (मागधी, शौरसेनी, महाराष्ट्री …); उनकी अन्तिम अवस्था अपभ्रंश; और अपभ्रंश से आगे आज की भाषाएँ — हिन्दी, मराठी, गुजराती, बाङ्ग्ला, पंजाबी आदि। इसीलिए सूची में ‘अपभ्रंशप्राकृतम्’ अन्त में रखा गया है — वही आज की भाषाओं की माँ है। इस दृष्टि से देखिए तो ‘णमो’ का ‘ण’ और हिन्दी के ‘काम’ (कर्म → कम्म → काम) में एक ही यात्रा दिख जाएगी।
प्र3.
“एवं संस्कृतं यदि स्रोतस्विनी नदी, तर्हि प्राकृतं तस्या एव सरलः प्रवाहः अस्ति। उभयोर्मध्ये अविच्छिन्नः सम्बन्धः अस्ति।” — अस्य वाक्यस्य आशयं भावं च स्पष्टीकुरुत।
उत्तर

आशयः — यदि संस्कृतं वेगवती स्रोतस्विनी नदी अस्ति, तर्हि प्राकृतं तस्याः एव सरलः, मन्दः, सुखेन प्रवहमाणः प्रवाहः अस्ति। उभयोः मध्ये अविच्छिन्नः — कदापि न विच्छिन्नः — सम्बन्धः अस्ति।

(हिन्दी — यदि संस्कृत एक बहती हुई नदी है, तो प्राकृत उसी नदी का सरल प्रवाह है। दोनों के बीच का सम्बन्ध कभी टूटा नहीं है — वह अविच्छिन्न है।)

उपमा का अंशकिसके लिएक्या कहना चाहता है
स्रोतस्विनी नदीसंस्कृतम्मूल स्रोत, जिससे जल निकलता है — व्याकरण से बँधी, परिष्कृत भाषा
सरलः प्रवाहःप्राकृतम्उसी जल का सहज बहाव — बोलने में आसान, जन-जन तक पहुँची भाषा
अविच्छिन्नः सम्बन्धःउभयोःदोनों अलग नदियाँ नहीं, एक ही जलधारा के दो रूप
भावः — उपमा इतनी सटीक क्यों है: नदी और उसका प्रवाह दो वस्तुएँ नहीं हैं — जल एक ही है, बस कहीं वह पहाड़ में तेज़ और सँकरा है, कहीं मैदान में धीमा और चौड़ा। ठीक वैसे ही संस्कृत और प्राकृत दो अलग भाषाएँ नहीं, एक ही भाषिक धारा की दो अवस्थाएँ हैं। ‘सर्व’ का ‘सव्व’, ‘लोके’ का ‘लोए’, ‘साधु’ का ‘साहु’ — इन्हें देखकर तुरन्त समझ आता है कि शब्द वही है, केवल बहाव सरल हो गया है। और उपमा का अन्तिम शब्द ‘अविच्छिन्नः’ सबसे महत्त्वपूर्ण है : प्राकृत संस्कृत से टूटकर नहीं बनी, वह उसी से लगातार बहती रही — और आज भी बह रही है, क्योंकि हमारी हिन्दी उसी प्रवाह का अगला मोड़ है।
व्याकरण-सङ्केत: ‘स्रोतस्विनी’ = स्रोतस् + विनी — ‘जिसमें धारा हो’, नदी का पर्याय। ‘उभयोर्मध्ये’ = उभयोः + मध्ये (विसर्गसन्धि — अः के स्थान पर र्, फिर र् + म्)। ‘अविच्छिन्नः’ = न विच्छिन्नः (नञ्-तत्पुरुष) — ‘जो टूटा हुआ न हो’। ‘तस्या एव’ = तस्याः + एव (विसर्गलोप)।
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