प्र1.
पुस्तके दत्तानि षड् संस्कृत-वाक्यानि तेषां च प्राकृत-अनुवादान् लिखत, प्रतिवाक्यं पदशः विश्लेषणं च कुरुत।
उत्तर
पुस्तक की मूल तालिका (ज्यों की त्यों) —
| क्र. | संस्कृतम् | प्राकृतम् |
|---|---|---|
| (१) | अहं विद्यालयं गच्छामि। | अहं विज्जालयं गच्छामि / गच्छमि / गच्छेमि / गच्छं। |
| (२) | सः जलं पिबति। | सो जलं पिवइ। |
| (३) | बालकः पद्यं पठति। | बालओ पोत्थं पढइ / पढए / पढदि / पढदे। |
| (४) | भवान् कुत्र गच्छति। | भवतो कत्थ गच्छउ। |
| (५) | अहं फलानि खादामि। | अहं फलाइं / फलाणि खामि। |
| (६) | एतत् मम मित्रम् अस्ति। | एसो मम / मज्झ मित्तो / मित्तं अत्थि। |
अब पद-दर-पद —
| संस्कृत-पदम् | प्राकृत-पदम् | क्या बदला और क्यों |
|---|---|---|
| विद्यालयम् | विज्जालयं | संयुक्त द्य टिक नहीं सका — समीकरण होकर ज्ज बना (विद्या → विज्जा)। अन्त्य म् → अनुस्वार। |
| गच्छामि | गच्छामि / गच्छमि / गच्छेमि / गच्छं | उत्तमपुरुष एकवचन के प्राकृत में अनेक विकल्प — ‑आमि, ‑अमि, ‑एमि तथा केवल ‑ं। बोलचाल की भाषा में एक ही रूप नहीं जमता, इसीलिए विकल्प रहते हैं। |
| सः | सो | पुल्लिङ्ग प्रथमा एकवचन का ‑अः प्राकृत में सदा ‑ओ हो जाता है। |
| पिबति | पिवइ | दो स्वरों के बीच का ब् → व् (लघूकरण); और ‑ति का त् लुप्त होकर ‑इ बचा। यही प्राकृत का प्रसिद्ध ‘‑इ’ अन्त है। |
| बालकः | बालओ | दो स्वरों के बीच का क् लुप्त (बालक → बाल-अ), और ‑अः → ‑ओ। यही नियम ‘लोके → लोए’ में भी लगा था। |
| पुस्तकम् | पोत्थं | पुस्तकम् → पोत्थ‑ : संयुक्त स्त → त्थ, और ‑क‑ लुप्त। (पुस्तक की संस्कृत-पंक्ति पर नीचे टिप्पणी देखिए।) |
| पठति | पढइ / पढए / पढदि / पढदे | दो स्वरों के बीच का ठ् → ढ् (महाप्राण का घोषीकरण)। अन्त में चार विकल्प — ‑इ तथा ‑ए (अर्धमागधी/महाराष्ट्री), ‑दि तथा ‑दे (शौरसेनी)। अर्थात् एक ही क्रिया अलग-अलग प्राकृतों में अलग दिखती है। |
| कुत्र | कत्थ | संयुक्त त्र → त्थ; और उ → अ (कुत्र → कत्थ)। |
| फलानि | फलाइं / फलाणि | दो रूप — या तो न् लुप्त होकर ‑आइं, या न् → ण् होकर ‑आणि। नपुंसक बहुवचन के ये दोनों रूप प्राकृत में चलते हैं। |
| खादामि | खामि | दो स्वरों के बीच का द् पूरा लुप्त (खाद → खा)। |
| एतत् / एषः | एसो | ष् → स् (तीनों ऊष्म वर्ण प्राकृत में एक ‘स’ हो जाते हैं); ‑अः → ‑ओ। |
| मम / मह्यम् | मम / मज्झ | ‘मम’ ज्यों का त्यों भी चला, और ‘मह्यम्’ से मज्झ बना (ह्य → ज्झ, वही समीकरण जो ‘उपाध्याय → उवज्झाय’ में था)। |
| मित्रम् | मित्तं / मित्तो | संयुक्त त्र → त्त। नपुंसक रखें तो ‘मित्तं’, पुल्लिङ्ग करें तो ‘मित्तो’ — प्राकृत में यह शब्द दोनों लिङ्गों में चलता है। |
| अस्ति | अत्थि | संयुक्त स्त → त्थ (सिबिलैंट अपनी महाप्राणता आगे वाले वर्ण को दे देता है), और ‑ति → ‑थि। |
छठे वाक्य पर विशेष ध्यान: संस्कृत में ‘एतत् मम मित्रम् अस्ति’ — दोनों पद नपुंसकलिङ्ग हैं। प्राकृत में पुस्तक ने ‘एसो … मित्तो’ भी दिया है, जो पुल्लिङ्ग है। यह भूल नहीं — प्राकृत में नपुंसकलिङ्ग धीरे-धीरे घटता गया और बहुत-से नपुंसक शब्द पुल्लिङ्ग में चले गए। इसीलिए वही वाक्य दो रूपों में मिलता है — ‘एसो … मित्तो अत्थि’ (पुल्लिङ्ग) तथा ‘एअं … मित्तं अत्थि’ (नपुंसक)। यही प्रवृत्ति आगे बढ़कर हिन्दी तक पहुँची — इसीलिए हिन्दी में नपुंसकलिङ्ग बचा ही नहीं, केवल पुल्लिङ्ग और स्त्रीलिङ्ग रह गए। एक छोटी-सी तालिका भाषा-इतिहास का इतना बड़ा मोड़ दिखा देती है।
पुस्तक की एक विसंगति (ध्यान से पढ़िए): तीसरे वाक्य में संस्कृत पंक्ति है ‘बालकः पद्यं पठति’ और प्राकृत पंक्ति है ‘बालओ पोत्थं पढइ’। किन्तु ‘पोत्थ’ का मूल पुस्तक है, ‘पद्य’ नहीं — ‘पद्य’ से प्राकृत में ‘पज्जं’ बनता (द्य → ज्ज, जैसे विद्या → विज्जा)। अतः या तो संस्कृत पंक्ति ‘बालकः पुस्तकं पठति’ होनी चाहिए, या प्राकृत पंक्ति ‘बालओ पज्जं पढइ’। परीक्षा में पुस्तक की पंक्ति ज्यों की त्यों लिखिए, किन्तु यह अन्तर जान लीजिए — इसी से पता चलता है कि आपने नियम समझा है, केवल जोड़ी याद नहीं की। इसी प्रकार चौथे वाक्य का ‘गच्छउ’ रूप भी ध्यान देने योग्य है : प्रथमपुरुष एकवचन का सामान्य प्राकृत रूप ‘गच्छइ’ होता है (जैसे ‘पिवइ’, ‘पढइ’); ‘‑उ’ वाला अन्त अपभ्रंश की ओर झुकता है।