शारदा अध्याय 10 संस्कृत-वाक्यानां प्राकृतानुवादः

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
पुस्तके दत्तानि षड् संस्कृत-वाक्यानि तेषां च प्राकृत-अनुवादान् लिखत, प्रतिवाक्यं पदशः विश्लेषणं च कुरुत।
उत्तर

पुस्तक की मूल तालिका (ज्यों की त्यों) —

क्र.संस्कृतम्प्राकृतम्
(१)अहं विद्यालयं गच्छामि।अहं विज्जालयं गच्छामि / गच्छमि / गच्छेमि / गच्छं।
(२)सः जलं पिबति।सो जलं पिवइ।
(३)बालकः पद्यं पठति।बालओ पोत्थं पढइ / पढए / पढदि / पढदे।
(४)भवान् कुत्र गच्छति।भवतो कत्थ गच्छउ।
(५)अहं फलानि खादामि।अहं फलाइं / फलाणि खामि।
(६)एतत् मम मित्रम् अस्ति।एसो मम / मज्झ मित्तो / मित्तं अत्थि।

अब पद-दर-पद —

संस्कृत-पदम्प्राकृत-पदम्क्या बदला और क्यों
विद्यालयम्विज्जालयंसंयुक्त द्य टिक नहीं सका — समीकरण होकर ज्ज बना (विद्या → विज्जा)। अन्त्य म् → अनुस्वार।
गच्छामिगच्छामि / गच्छमि / गच्छेमि / गच्छंउत्तमपुरुष एकवचन के प्राकृत में अनेक विकल्प — ‑आमि, ‑अमि, ‑एमि तथा केवल ‑ं। बोलचाल की भाषा में एक ही रूप नहीं जमता, इसीलिए विकल्प रहते हैं।
सःसोपुल्लिङ्ग प्रथमा एकवचन का ‑अः प्राकृत में सदा ‑ओ हो जाता है।
पिबतिपिवइदो स्वरों के बीच का ब् → व् (लघूकरण); और ‑ति का त् लुप्त होकर ‑इ बचा। यही प्राकृत का प्रसिद्ध ‘‑इ’ अन्त है।
बालकःबालओदो स्वरों के बीच का क् लुप्त (बालक → बाल-अ), और ‑अः → ‑ओ। यही नियम ‘लोके → लोए’ में भी लगा था।
पुस्तकम्पोत्थंपुस्तकम् → पोत्थ‑ : संयुक्त स्त → त्थ, और ‑क‑ लुप्त। (पुस्तक की संस्कृत-पंक्ति पर नीचे टिप्पणी देखिए।)
पठतिपढइ / पढए / पढदि / पढदेदो स्वरों के बीच का ठ् → ढ् (महाप्राण का घोषीकरण)। अन्त में चार विकल्प — ‑इ तथा ‑ए (अर्धमागधी/महाराष्ट्री), ‑दि तथा ‑दे (शौरसेनी)। अर्थात् एक ही क्रिया अलग-अलग प्राकृतों में अलग दिखती है।
कुत्रकत्थसंयुक्त त्र → त्थ; और उ → अ (कुत्र → कत्थ)।
फलानिफलाइं / फलाणिदो रूप — या तो न् लुप्त होकर ‑आइं, या न् → ण् होकर ‑आणि। नपुंसक बहुवचन के ये दोनों रूप प्राकृत में चलते हैं।
खादामिखामिदो स्वरों के बीच का द् पूरा लुप्त (खाद → खा)।
एतत् / एषःएसोष् → स् (तीनों ऊष्म वर्ण प्राकृत में एक ‘स’ हो जाते हैं); ‑अः → ‑ओ।
मम / मह्यम्मम / मज्झ‘मम’ ज्यों का त्यों भी चला, और ‘मह्यम्’ से मज्झ बना (ह्य → ज्झ, वही समीकरण जो ‘उपाध्याय → उवज्झाय’ में था)।
मित्रम्मित्तं / मित्तोसंयुक्त त्र → त्त। नपुंसक रखें तो ‘मित्तं’, पुल्लिङ्ग करें तो ‘मित्तो’ — प्राकृत में यह शब्द दोनों लिङ्गों में चलता है।
अस्तिअत्थिसंयुक्त स्त → त्थ (सिबिलैंट अपनी महाप्राणता आगे वाले वर्ण को दे देता है), और ‑ति → ‑थि।
छठे वाक्य पर विशेष ध्यान: संस्कृत में ‘एतत् मम मित्रम् अस्ति’ — दोनों पद नपुंसकलिङ्ग हैं। प्राकृत में पुस्तक ने ‘एसोमित्तो’ भी दिया है, जो पुल्लिङ्ग है। यह भूल नहीं — प्राकृत में नपुंसकलिङ्ग धीरे-धीरे घटता गया और बहुत-से नपुंसक शब्द पुल्लिङ्ग में चले गए। इसीलिए वही वाक्य दो रूपों में मिलता है — ‘एसो … मित्तो अत्थि’ (पुल्लिङ्ग) तथा ‘एअं … मित्तं अत्थि’ (नपुंसक)। यही प्रवृत्ति आगे बढ़कर हिन्दी तक पहुँची — इसीलिए हिन्दी में नपुंसकलिङ्ग बचा ही नहीं, केवल पुल्लिङ्ग और स्त्रीलिङ्ग रह गए। एक छोटी-सी तालिका भाषा-इतिहास का इतना बड़ा मोड़ दिखा देती है।
पुस्तक की एक विसंगति (ध्यान से पढ़िए): तीसरे वाक्य में संस्कृत पंक्ति है ‘बालकः पद्यं पठति’ और प्राकृत पंक्ति है ‘बालओ पोत्थं पढइ’। किन्तु ‘पोत्थ’ का मूल पुस्तक है, ‘पद्य’ नहीं — ‘पद्य’ से प्राकृत में ‘पज्जं’ बनता (द्य → ज्ज, जैसे विद्या → विज्जा)। अतः या तो संस्कृत पंक्ति ‘बालकः पुस्तकं पठति’ होनी चाहिए, या प्राकृत पंक्ति ‘बालओ पज्जं पढइ’। परीक्षा में पुस्तक की पंक्ति ज्यों की त्यों लिखिए, किन्तु यह अन्तर जान लीजिए — इसी से पता चलता है कि आपने नियम समझा है, केवल जोड़ी याद नहीं की। इसी प्रकार चौथे वाक्य का ‘गच्छउ’ रूप भी ध्यान देने योग्य है : प्रथमपुरुष एकवचन का सामान्य प्राकृत रूप ‘गच्छइ’ होता है (जैसे ‘पिवइ’, ‘पढइ’); ‘‑उ’ वाला अन्त अपभ्रंश की ओर झुकता है।
प्र2.
उपर्युक्तानां वाक्यानां तथा णमोकारमन्त्रस्य आधारेण संस्कृत-प्राकृत-सम्बन्धस्य नियमानां सङ्क्षिप्ता सारणी रचयत, नूतनानि उदाहरणानि च योजयत।
उत्तर

नियम-सारणी (संस्कृत → प्राकृत) — पाठ के अपने उदाहरणों सहित

क्र.नियमपाठ का उदाहरणएक और उदाहरण (अभ्यास हेतु)
दो स्वरों के बीच का क्, ग्, च्, ज्, त्, द्, प्, य्, व् — लुप्त या दुर्बललोके → लोए · बालकः → बालओ · खादामि → खामि · पिबति → पिवइ · आचार्य → आयरिय · उपाध्याय → उवज्झायनगरम् → णअरं · लता → लआ · कपोतः → कवोओ
दो स्वरों के बीच का महाप्राण ख्, घ्, थ्, ध्, फ्, भ् → ह्साधूनाम् → साहूणंमुखम् → मुहं · मेघः → मेहो · कथा → कहा
संयुक्त व्यंजन का समीकरण — द्वित्व बन जाता हैविद्या → विज्जा · मित्रम् → मित्तं · अस्ति → अत्थि · कुत्र → कत्थ · अध्याय → ज्झाय · मह्यम् → मज्झकर्म → कम्म · धर्म → धम्म · शब्दः → सद्दो
व्यंजन से पहले का र् लुप्त, आगे वाला व्यंजन दुगुनासर्वसाधूनाम् → सव्वसाहूणंसूर्यः → सुज्जो · अर्थः → अत्थो
कठिन संयुक्त कभी स्वरभक्ति से खुल भी जाता हैआचार्याणाम् → आयरियाणं (र्य → रिय)स्नेहः → सिणेहो · रत्नम् → रयणं
न् → ण्नमः → णमो · ‑आनाम् → ‑आणं · फलानि → फलाणिनरः → णरो · ज्ञानम् → णाणं
श्, ष्, स् — तीनों मिलकर एक स्एषः → एसोपुरुषः → पुरिसो · शतम् → सयं
ऋ, ऐ, औ नहीं रहते; उनके स्थान पर अ/इ/उ या ए/ओअर्हत् → अरिहन्तऋषभः → उसहो · कृतम् → कयं
शब्दान्त में केवल अनुस्वार बचता हैमित्रम् → मित्तं · विद्यालयम् → विज्जालयंफलम् → फलं · गृहम् → घरं
१०रूप-प्रत्यय भी सरल होते हैं — ‑अः → ‑ओ, ‑ति → ‑इ, ‑आनाम् → ‑आणंसः → सो · पठति → पढइ · सिद्धानाम् → सिद्धाणंगजः → गओ · वदति → वयइ
इन दस नियमों में एक ही प्रवृत्ति है — कम मेहनत में बोलना ध्यान दीजिए, हर नियम जीभ का काम घटाता है : संयुक्त व्यंजन बोलने में कठिन हैं, इसलिए वे दुगुने सरल वर्ण बन गए (कर्म → कम्म); स्वरों के बीच रुकना कठिन है, इसलिए बीच का व्यंजन गिर गया (लोके → लोए); महाप्राण कण्ठ से ज़ोर माँगते हैं, इसलिए वे केवल ‘ह’ रह गए (मुख → मुह)। भाषा-परिवर्तन मनमाना नहीं होता — वह इसी श्रम-लाघव के नियम से चलता है। और यही प्रक्रिया प्राकृत पर रुकी नहीं : ‘कम्म’ आगे चलकर हिन्दी का ‘काम’ बना, ‘मुह’ से ‘मुँह’, ‘घरं’ से ‘घर’, ‘सव्व’ से ‘सब’। अर्थात् आप जब हिन्दी बोलते हैं, तब भी उसी नदी का पानी बह रहा होता है जिसे पुस्तक ने ‘स्रोतस्विनी’ कहा।
स्वयं करके देखिए (अभ्यास): इन नियमों से निम्न संस्कृत शब्दों के प्राकृत रूप बनाइए और फिर मिलाइए — धर्मः (→ धम्मो), ज्ञानम् (→ णाणं), राजा (→ राया), वचनम् (→ वयणं), सत्यम् (→ सच्चं), भगवान् (→ भयवं)। नियम बताइए कि कौन-सा लगा — यही उत्तर का असली अंश है, केवल रूप नहीं।
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