शारदा अध्याय 10 अभ्यासाद् जायते सिद्धिः

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
देशे काः समस्याः सन्ति इति ऋषभदेवस्य कल्पना प्राप्ता ?
उत्तर

जनानाम् आलस्यम्, कृषिकार्ये न्यूनता, प्रजासु उत्पादनक्षमतायाः अभावः च — एताः एव देशस्य मूलसमस्याः सन्ति इति ऋषभदेवस्य स्पष्टा कल्पना प्राप्ता।

(हिन्दी — लोगों का आलस्य, खेती में कमी और प्रजा में उत्पादन-क्षमता का अभाव — यही देश की मूल समस्याएँ हैं, ऐसी स्पष्ट धारणा ऋषभदेव को प्राप्त हुई।)

पाठस्य प्रमाणम् — ‘तेन काचित् स्पष्टकल्पना प्राप्ता यत् जनानाम् आलस्यं, कृषिकार्ये न्यूनता, प्रजासु उत्पादनक्षमतायाः अभावः चेत्येतादृश्यः मूलसमस्याः सन्ति इति।’ (पृ. 128)

ध्यान देने योग्य बात: ऋषभदेव ने दुर्भिक्ष को समस्या नहीं, समस्या का लक्षण माना। असली जड़ें तीन थीं और तीनों मनुष्य के अपने व्यवहार में थीं — आलस्य, खेती की उपेक्षा और उत्पादन-क्षमता का अभाव। इसीलिए आगे उन्होंने अन्न नहीं बाँटा, कौशल सिखाया। उत्तर लिखते समय तीनों समस्याएँ गिनाना आवश्यक है — एक भी छूटी तो उत्तर अधूरा है।
प्र2.
महाराजः केषु कार्येषु प्रजाः प्रशिक्षितवान् ?
उत्तर

महाराजः ऋषभदेवः कृषिकार्ये, विविधपदार्थैः भोजननिर्माणे, तन्तुभिः वस्त्रनिर्माणे, गवाम् अश्वादीनां पशूनां पालने, काष्ठैः धातुभिः शिलाभिः च गृहोपयोगिनां वस्तूनां निर्माणे, पात्रनिर्माणे, गृहनिर्माणे नगरनिर्माणे च — एतेषु जीवनकौशलेषु प्रजाः प्रशिक्षितवान्।

(हिन्दी — महाराज ऋषभदेव ने प्रजा को खेती, तरह-तरह के पदार्थों से भोजन बनाना, धागों से वस्त्र बनाना, गाय-घोड़े आदि पशुओं का पालन, लकड़ी-धातु-पत्थर से घर की उपयोगी वस्तुएँ बनाना, बर्तन बनाना, घर बनाना और नगर बसाना — इन जीवन-कौशलों में प्रशिक्षित किया।)

पाठस्य प्रमाणम् — ‘विशेषरूपेण कृषिकार्यं, विविधपदार्थैः भोजननिर्माणं, तन्तुभिः वस्त्रनिर्माणं, गवाम् अश्वादीनां पशूनां पालनं चेत्यादीनि जीवनकौशलानि प्रशिक्षितवान्। काष्ठैः धातुभिः शिलाभिः च गृहोपयोगिनां वस्तूनां निर्माणं, पात्रनिर्माणं, गृहनिर्माणं, नगरनिर्माणादिकं च प्रशिक्षितवान्।’ (पृ. 128–129)

व्याकरण-सङ्केत: प्रश्न ‘केषु कार्येषु’ — सप्तमी बहुवचन। अतः उत्तर के सब पद भी सप्तमी बहुवचन/एकवचन में रखिए — ‘कृषिकार्ये, भोजननिर्माणे, वस्त्रनिर्माणे …’। यदि पाठ के वाक्य को ज्यों का त्यों उतारेंगे तो वे द्वितीया (कृषिकार्यं, वस्त्रनिर्माणं) में मिलेंगे, क्योंकि वहाँ वे ‘प्रशिक्षितवान्’ के कर्म हैं। प्रश्न के अनुसार विभक्ति बदलना ही पूर्णवाक्य-उत्तर की कसौटी है।
प्र3.
ऋषभदेवस्य जीवनपरिवर्तिनी घटना का आसीत् ?
उत्तर

राजप्रासादे आयोजिते नृत्यकलाप्रदर्शने काचित् नर्तकी नृत्यकलां प्रदर्शयन्ती सहसा भूमौ पतित्वा मृता — इयम् एव ऋषभदेवस्य जीवनपरिवर्तिनी घटना आसीत्।

(हिन्दी — राजमहल में आयोजित नृत्यकला-प्रदर्शन में कोई नर्तकी नृत्य दिखाते-दिखाते अचानक भूमि पर गिरकर मर गई — यही ऋषभदेव के जीवन को बदल देने वाली घटना थी।)

पाठस्य प्रमाणम् — ‘एकदा ऋषभदेवः राजप्रासादे नृत्यकलाप्रदर्शनम् आयोजितवान्। तत्र आगता काचित् नर्तकी नृत्यकलां प्रदर्शयन्ती सहसा भूमौ पतित्वा मृता। अनया घटनया ऋषभदेवस्य मनः सहसा विक्षुब्धम् अभवत्।’ (पृ. 131)

उत्तर में यह जोड़ना उत्तम रहेगा: केवल घटना बताकर रुकिए मत — उसका परिणाम भी एक वाक्य में जोड़िए : ‘अनया घटनया तस्य मनः विक्षुब्धम् अभवत्, “इह संसारे किमपि शाश्वतं नास्ति” इति विचिन्त्य सः सर्वं परित्यज्य भिक्षुरूपेण प्रस्थितवान्।’ इससे उत्तर पूरा हो जाता है — घटना, प्रभाव और निर्णय, तीनों।
प्र4.
ऋषभदेवस्य दीर्घकालिकस्य उपवासस्य समाप्तिः कथम् अभवत् ?
उत्तर

एकदा पर्यटनावसरे ऋषभदेवः हस्तिनापुरस्य समीपे स्थितस्य इक्षुक्षेत्रस्य पार्श्वमार्गात् गच्छति स्म। तत् इक्षुक्षेत्रं तस्यैव प्रपौत्रस्य श्रेयांसस्य आसीत्। सः श्रेयांसः प्रपितामहाय पानार्थम् इक्षुरसं दत्तवान्। अनेन इक्षुरसेन ऋषभदेवस्य दीर्घकालिकः उपवासः समाप्तः अभवत्।

(हिन्दी — एक बार भ्रमण के समय ऋषभदेव हस्तिनापुर के पास स्थित गन्ने के खेत के बगल के मार्ग से जा रहे थे। वह खेत उन्हीं के प्रपौत्र श्रेयांस का था। श्रेयांस ने अपने प्रपितामह को पीने के लिए गन्ने का रस दिया। इसी गन्ने के रस से ऋषभदेव का दीर्घकालीन उपवास समाप्त हुआ।)

अधिकं ज्ञातव्यम् — तत् दिनं वैशाखमासस्य अक्षयतृतीया आसीत्। अतः जैनसम्प्रदाये ‘वर्षितप-पारणा-महोत्सवः’ अधुनापि गुजराते पदलिप्तपुरम् (पालीताणा), उत्तरप्रदेशे हस्तिनापुरम् इत्यादिषु पवित्रतीर्थेषु आचर्यते।

ध्यान दें: प्रश्न ‘कथम्’ पूछता है — अर्थात् ‘किस प्रकार’। इसलिए उत्तर में क्रिया-क्रम आना चाहिए : कहाँ जा रहे थे → किसका खेत था → किसने क्या दिया → उससे क्या हुआ। केवल ‘इक्षुरसेन’ लिख देना अधूरा उत्तर है।
प्र5.
ऋषभदेवः कदा कुत्र च केवलज्ञानं प्राप्तवान् ?
उत्तर

ऋषभदेवः फाल्गुनमासस्य कृष्णपक्षे एकादश्यां तिथौ प्रयागराजे अक्षयवटवृक्षस्य अधः केवलज्ञानं प्राप्तवान्।

(हिन्दी — ऋषभदेव ने फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को प्रयागराज में अक्षयवट वृक्ष के नीचे केवलज्ञान प्राप्त किया।)

पाठस्य प्रमाणम् — ‘एवं दीर्घकालिकोपवासेन निरन्तराध्ययनेन कठोरतपसा च ऋषभदेवः फाल्गुनमासस्य कृष्णपक्षे एकादश्यां तिथौ प्रयागराजे अक्षयवटवृक्षस्य अधः केवलज्ञानं प्राप्तवान्।’ (पृ. 133)

प्रश्न में दो प्रश्न छिपे हैं: ‘कदा’ (कब) तथा ‘कुत्र’ (कहाँ)। इसलिए उत्तर में दोनों होने चाहिए — समय (फाल्गुन कृष्ण एकादशी) और स्थान (प्रयागराज, अक्षयवट के नीचे)। साथ में साधन भी जोड़ दें तो उत्तर और पूर्ण होगा : ‘दीर्घकालिकोपवासेन निरन्तराध्ययनेन कठोरतपसा च’ — केवलज्ञान अचानक नहीं मिला, तप से मिला
प्र6.
जनानां मार्गदर्शनार्थं कं क्रमं रचितवान् ?
उत्तर

ऋषभदेवः जनानां मार्गदर्शनार्थं भिक्षुः, भिक्षुणी, श्रावकः, श्राविका चेति चतुर्विधं क्रमं रचितवान्। स एव क्रमः ‘जैनसङ्घः’ इति प्रसिद्धः वर्तते।

(हिन्दी — ऋषभदेव ने लोगों के मार्गदर्शन के लिए भिक्षु, भिक्षुणी, श्रावक और श्राविका — यह चार प्रकार का क्रम बनाया। वही क्रम ‘जैनसंघ’ नाम से प्रसिद्ध है।)

पाठस्य प्रमाणम् — ‘ऋषभदेवः जनानां मार्गदर्शनार्थं भिक्षुः भिक्षुणी श्रावकः श्राविका चेति क्रमं रचितवान्। स एव क्रमः जैनसङ्घः इति प्रसिद्धः वर्तते।’ (पृ. 133)

उत्तर में ‘जैनसङ्घः’ अवश्य लिखिए — पाठ का अगला वाक्य यही जोड़ता है, और प्रश्न ‘कं क्रमम्’ का पूरा उत्तर तभी बनता है। शब्दार्थ-तालिका में ‘सङ्घः = समूहः’ (Community) दिया है।
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