शारदा अध्याय 10 अभ्यासाद् जायते सिद्धिः

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
विग्रहवाक्यम् — महान् च असौ राजा च । समस्तपदम् लिखत।
उत्तर

महाराजः। (हिन्दी — महाराज।)

समासस्य नाम — कर्मधारयः (विशेषण-विशेष्यभावः, तत्पुरुषस्य एकः भेदः)।

यह कर्मधारय ही क्यों: कर्मधारय की पहचान यह है कि दोनों पद एक ही व्यक्ति/वस्तु के लिए आते हैं और एक ही विभक्ति में रहते हैं — यहाँ ‘महान्’ (विशेषण) तथा ‘राजा’ (विशेष्य) दोनों उसी एक राजा के लिए हैं। विग्रह में आया ‘च … च’ तथा ‘असौ’ भी इसी की पहचान है। समास बनते समय ‘महत्’ का ‘महा’ आदेश होता है (महत् + राजन् → महाराजः) — यही नियम ‘महाकविः’, ‘महाजनः’, ‘महाराष्ट्रम्’ में भी लगता है।
पाठ में कहाँ: ‘एतादृशस्य महाराजस्य पुत्राः अपि शौर्येण पराक्रमेण बुद्धिबलेन च विश्वप्रसिद्धाः आसन्।’ (पृ. 130); तथा प्रश्न ४ (क) में ‘महाराजेन राज्यं समर्पितम्’।
प्र2.
विग्रहवाक्यम् — प्रजानां सुखम् । समस्तपदम् लिखत।
उत्तर

प्रजासुखम्। (हिन्दी — प्रजा का सुख।)

समासस्य नाम — षष्ठी-तत्पुरुषः।

पहचान का सूत्र: विग्रह में जो विभक्ति दिखे, तत्पुरुष का नाम उसी विभक्ति पर पड़ता है। यहाँ ‘प्रजानाम्’ षष्ठी में है, अतः यह षष्ठी-तत्पुरुष है। समास बनते समय पूर्वपद की विभक्ति लुप्त हो जाती है — प्रजानाम् + सुखम् → प्रजासुखम्। इसी सूत्र से आगे (घ) ‘भोजनस्य निर्माणम्’ भी षष्ठी-तत्पुरुष है और (छ) ‘विधिना लिखितम्’ तृतीया-तत्पुरुष।
पाठ में कहाँ: श्लोक — ‘प्रजासुखे सुखं राज्ञः प्रजानां च हिते हितम्।’ (पृ. 129)
प्र3.
विग्रहवाक्यम् — मूलाः समस्याः । समस्तपदम् लिखत।
उत्तर

मूलसमस्याः। (हिन्दी — मूल समस्याएँ।)

समासस्य नाम — कर्मधारयः (विशेषण पूर्वपद)।

क्यों कर्मधारय, तत्पुरुष नहीं: ‘मूलाः’ तथा ‘समस्याः’ दोनों प्रथमा बहुवचन में हैं और दोनों एक ही वस्तु — समस्याओं — के लिए हैं। जहाँ पूर्वपद विशेषण हो और दोनों की विभक्ति समान हो, वहाँ कर्मधारय होता है। यदि विग्रह ‘मूलस्य समस्याः’ होता, तब वह षष्ठी-तत्पुरुष कहलाता। विग्रह की विभक्ति देखकर ही नाम तय कीजिए।
पाठ में कहाँ: ‘… चेत्येतादृश्यः मूलसमस्याः सन्ति इति। अतः सः मूलसमस्यानां परिष्काराय … योजनाः रचितवान्।’ (पृ. 128)
प्र4.
विग्रहवाक्यम् — भोजनस्य निर्माणम् । समस्तपदम् लिखत।
उत्तर

भोजननिर्माणम्। (हिन्दी — भोजन बनाना।)

समासस्य नाम — षष्ठी-तत्पुरुषः।

पाठ में कहाँ: ‘विशेषरूपेण कृषिकार्यं, विविधपदार्थैः भोजननिर्माणं, तन्तुभिः वस्त्रनिर्माणं …।’ (पृ. 128)
इसी ढाँचे के और शब्द पाठ में हैं: वस्त्रनिर्माणम् (वस्त्रस्य निर्माणम्), पात्रनिर्माणम् (पात्रस्य निर्माणम्), गृहनिर्माणम् (गृहस्य निर्माणम्), नगरनिर्माणम् (नगरस्य निर्माणम्) — सब षष्ठी-तत्पुरुष। एक ढाँचा पकड़ लेने पर पाँच शब्द अपने आप खुल जाते हैं; यही समास पढ़ने का सही तरीका है।
प्र5.
विग्रहवाक्यम् — आर्थिकी स्थितिः । समस्तपदम् लिखत।
उत्तर

आर्थिकस्थितिः। (हिन्दी — आर्थिक स्थिति।)

समासस्य नाम — कर्मधारयः (विशेषण पूर्वपद)।

‘आर्थिकी’ का ‘आर्थिक’ क्यों हो गया — यह प्रश्न का असली मर्म है: विग्रह में विशेषण स्त्रीलिङ्ग है (आर्थिक स्थितिः), क्योंकि ‘स्थिति’ स्त्रीलिङ्ग है। किन्तु समास बनते समय कर्मधारय में पुंवद्भाव हो जाता है — अर्थात् स्त्रीलिङ्ग विशेषण अपना पुल्लिङ्ग रूप ले लेता है। इसीलिए ‘आर्थिकी’ → ‘आर्थिक’ और समस्तपद बना आर्थिकस्थितिः। यही कारण है कि पाठ भी ‘आर्थिकस्थितिः’ ही लिखता है, ‘आर्थिकीस्थितिः’ नहीं।
पाठ में कहाँ: ‘क्रमशः जनानाम् आर्थिकस्थितिः अपि सुदृढा जाता।’ (पृ. 129)
प्र6.
विग्रहवाक्यम् — प्राप्तः आनन्दः येन सः । समस्तपदम् लिखत।
उत्तर

प्राप्तानन्दः। (हिन्दी — जिसे आनन्द प्राप्त हो गया हो, वह।)

समासस्य नाम — बहुव्रीहिः।

बहुव्रीहि की अचूक पहचान: विग्रह में ‘येन सः’, ‘यस्य सः’, ‘यस्मिन् सः’ जैसा सम्बन्धवाचक पद आ जाए — तो समास बहुव्रीहि है। कारण यह है कि बहुव्रीहि में अर्थ किसी तीसरे का होता है, दोनों पदों में से किसी का नहीं। यहाँ न ‘प्राप्त’ का अर्थ मुख्य है, न ‘आनन्द’ का — मुख्य है वह व्यक्ति जिसे आनन्द प्राप्त हुआ, अर्थात् ऋषभदेव। इसी तालिका में एक और बहुव्रीहि है — ‘अधीतविद्यः’ (अधीता विद्या येन सः)।
पाठ में कहाँ: ‘एवं सर्वोन्मुखसमृद्ध्या ऋषभदेवः जीवने प्राप्तानन्दः परमसुखी च आसीत्।’ (पृ. 130)
प्र7.
विग्रहवाक्यम् — विधिना लिखितम् । समस्तपदम् लिखत।
उत्तर

विधिलिखितम्। (हिन्दी — भाग्य का लिखा हुआ।)

समासस्य नाम — तृतीया-तत्पुरुषः।

नाम विभक्ति से तय होता है: विग्रह में ‘विधिना’ तृतीया विभक्ति में है (‘विधि के द्वारा’), इसलिए समास तृतीया-तत्पुरुष कहलाया। इस समास में उत्तरपद प्रायः कृदन्त होता है — लिखितम्, कृतम्, युक्तम्, पीडितम्। जैसे — ‘हरिणा त्रातः = हरित्रातः’, ‘शङ्कुलया खण्डः = शङ्कुलाखण्डः’। पुस्तक की शब्दार्थ-तालिका भी यही नाम देती है — ‘विधिलिखितम् (तृतीया-तत्पुरुषः)’।
पाठ में कहाँ: ‘परं को वा जानाति विधिलिखितम्।’ (पृ. 130) — अर्थात् ‘पर भाग्य का लिखा कौन जानता है!’
प्र8.
विग्रहवाक्यम् — गृहं गृहं प्रति । समस्तपदम् लिखत।
उत्तर

प्रतिगृहम्। (हिन्दी — घर-घर, प्रत्येक घर में।)

समासस्य नाम — अव्ययीभावः (वीप्सायाम् — पुनरावृत्ति के अर्थ में)।

अव्ययीभाव क्यों और कैसे: जिस समास का पूर्वपद अव्यय हो और पूरा समास ही अव्यय बन जाए, वह अव्ययीभाव है। यहाँ पूर्वपद ‘प्रति’ अव्यय है। और अर्थ है वीप्सा — अर्थात् ‘बार-बार, हर एक’। इसीलिए विग्रह में ‘गृहं गृहम्’ दो बार आया है। समस्तपद सदा नपुंसकलिङ्ग, एकवचन, द्वितीया रूप में रहता है — ‘प्रतिगृहम्’। इसी प्रकार — ‘दिनं दिनं प्रति = प्रतिदिनम्’, ‘वर्षं वर्षं प्रति = प्रतिवर्षम्’ (यह शब्द भी पाठ में है — ‘प्रतिवर्षम् अप्रैल-मासस्य नवमे दिनाङ्के …’)।
पाठ में कहाँ: ‘ग्रामेषु प्रतिगृहं गत्वा भिक्षां प्राप्य जीवनं निर्वर्तयन्ति स्म।’ तथा ‘मौनेन प्रतिगृहं भिक्षायाचनम् आरब्धवान्।’ (पृ. 132)
प्र9.
विग्रहवाक्यम् — ब्राह्मीनामा लिपिः । समस्तपदम् लिखत।
उत्तर

ब्राह्मीलिपिः। (हिन्दी — ब्राह्मी नाम की लिपि।)

समासस्य नाम — मध्यमपदलोपी कर्मधारयः (पुस्तक की शब्दार्थ-तालिका में यही नाम दिया है — ‘ब्राह्मीलिपिः मध्यपदलोपी (कर्मधारयः)’)।

‘मध्यमपदलोपी’ का अर्थ: इस समास में विग्रह का बीच वाला पद समास बनते समय गिर जाता है। यहाँ विग्रह है ‘ब्राह्मी नामा लिपिः’ (ब्राह्मीनाम्नी लिपिः) — किन्तु समस्तपद में ‘नामा/नाम्नी’ बचा ही नहीं, केवल ‘ब्राह्मी + लिपिः’ रह गया। ऐसे और उदाहरण — ‘शाकप्रियः पार्थिवः = शाकपार्थिवः’, ‘गुडमिश्रितः धानः = गुडधानाः’। यही इस समास का लक्षण है और इसीलिए इसका नाम ही ‘मध्यमपदलोपी’ पड़ा।
पाठ में कहाँ: ‘जैनसम्प्रदायानुगुणं ब्राह्मीलिप्याः विकासः ब्राह्मीद्वारैव कृता इति श्रूयते।’ (पृ. 130)
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