प्र1.
उदाहरणम् — “जनैः स्वयमेव निर्माणकार्यम् आरब्धम्। → जनाः स्वयमेव निर्माणकार्यम् आरब्धवन्तः।” अत्र कः परिवर्तनस्य नियमः ? प्रथमं नियमं लिखत, ततः वाक्यानि परिवर्तयत।
उत्तर
नियमः — कर्मवाच्यात् कर्तृवाच्ये परिवर्तनम्। पुस्तक का उदाहरण-वाक्य कर्मवाच्य में है और उत्तर-वाक्य कर्तृवाच्य में। तीन बातें एक साथ बदलती हैं :
| क्या | कर्मवाच्ये | कर्तृवाच्ये | उदाहरण |
|---|---|---|---|
| कर्ता की विभक्ति | तृतीया (जनैः) | प्रथमा (जनाः) | जनैः → जनाः |
| कर्म की विभक्ति | प्रथमा (निर्माणकार्यम्) | द्वितीया (निर्माणकार्यम्) | नपुंसक में दोनों रूप समान दिखते हैं, किन्तु स्त्री/पुं. में बदलाव स्पष्ट होगा — योजना → योजनाम् |
| क्रिया का प्रत्यय | क्त (आरब्धम्) — कर्म के अनुसार | क्तवतु (आरब्धवन्तः) — कर्ता के अनुसार | कृतः → कृतवान् · परिवर्तिता → परिवर्तितवन्तः |
पहचान का सूत्र एक ही है — क्रिया किसके साथ मिलेगी: कर्मवाच्य में क्रिया (क्त-प्रत्यय वाला विशेषण) कर्म के लिङ्ग-वचन से मिलती है — ‘योजना कृता’ (योजना स्त्रीलिङ्ग, अतः ‘कृता’)। कर्तृवाच्य में वही क्रिया (क्तवतु-प्रत्यय वाली) कर्ता के लिङ्ग-वचन से मिलती है — ‘ऋषभः योजनां कृतवान्’ (ऋषभ पुल्लिङ्ग एकवचन, अतः ‘कृतवान्’)। इसलिए वाक्य बदलते समय सबसे पहले यह देखिए कि नया कर्ता कौन है और उसका लिङ्ग-वचन क्या है — प्रत्यय अपने आप तय हो जाएगा। क्तवतु के रूप: पुं. एकवचन — कृतवान्; बहुवचन — कृतवन्तः; स्त्री. — कृतवती।
सावधानी: ‘स्वयमेव’ जैसे अव्यय ज्यों के त्यों रहते हैं, बदलते नहीं। और विशेषण जिस पद का है, उसी के साथ विभक्ति बदलेगा — जैसे ‘दीर्घकालिकः उपवासः’ (प्रथमा) कर्तृवाच्य में ‘दीर्घकालिकम् उपवासम्’ (द्वितीया) हो जाएगा।