शारदा अध्याय 10 अभ्यासाद् जायते सिद्धिः

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
उदाहरणम् — “जनैः स्वयमेव निर्माणकार्यम् आरब्धम्। → जनाः स्वयमेव निर्माणकार्यम् आरब्धवन्तः।” अत्र कः परिवर्तनस्य नियमः ? प्रथमं नियमं लिखत, ततः वाक्यानि परिवर्तयत।
उत्तर

नियमः — कर्मवाच्यात् कर्तृवाच्ये परिवर्तनम्। पुस्तक का उदाहरण-वाक्य कर्मवाच्य में है और उत्तर-वाक्य कर्तृवाच्य में। तीन बातें एक साथ बदलती हैं :

क्याकर्मवाच्येकर्तृवाच्येउदाहरण
कर्ता की विभक्तितृतीया (जनैः)प्रथमा (जनाः)जनैः → जनाः
कर्म की विभक्तिप्रथमा (निर्माणकार्यम्)द्वितीया (निर्माणकार्यम्)नपुंसक में दोनों रूप समान दिखते हैं, किन्तु स्त्री/पुं. में बदलाव स्पष्ट होगा — योजना → योजनाम्
क्रिया का प्रत्ययक्त (आरब्धम्) — कर्म के अनुसारक्तवतु (आरब्धवन्तः) — कर्ता के अनुसारकृतः → कृतवान् · परिवर्तिता → परिवर्तितवन्तः
पहचान का सूत्र एक ही है — क्रिया किसके साथ मिलेगी: कर्मवाच्य में क्रिया (क्त-प्रत्यय वाला विशेषण) कर्म के लिङ्ग-वचन से मिलती है — ‘योजना कृता’ (योजना स्त्रीलिङ्ग, अतः ‘कृता’)। कर्तृवाच्य में वही क्रिया (क्तवतु-प्रत्यय वाली) कर्ता के लिङ्ग-वचन से मिलती है — ‘ऋषभः योजनां कृतवान्’ (ऋषभ पुल्लिङ्ग एकवचन, अतः ‘कृतवान्’)। इसलिए वाक्य बदलते समय सबसे पहले यह देखिए कि नया कर्ता कौन है और उसका लिङ्ग-वचन क्या है — प्रत्यय अपने आप तय हो जाएगा। क्तवतु के रूप: पुं. एकवचन — कृतवान्; बहुवचन — कृतवन्तः; स्त्री. — कृतवती।
सावधानी: ‘स्वयमेव’ जैसे अव्यय ज्यों के त्यों रहते हैं, बदलते नहीं। और विशेषण जिस पद का है, उसी के साथ विभक्ति बदलेगा — जैसे ‘दीर्घकालिकः उपवासः’ (प्रथमा) कर्तृवाच्य में ‘दीर्घकालिकम् उपवासम्’ (द्वितीया) हो जाएगा।
प्र2.
महाराजेन राज्यं समर्पितम्।
उत्तर

महाराजः राज्यं समर्पितवान्। (हिन्दी — महाराज ने राज्य सौंप दिया।)

पदम्कर्मवाच्येकर्तृवाच्येकारणम्
कर्तामहाराजेन (तृ.ए.व.)महाराजः (प्र.ए.व.)कर्तृवाच्ये «कर्तरि प्रथमा»
कर्मराज्यम् (प्र.ए.व.)राज्यम् (द्वि.ए.व.)«कर्मणि द्वितीया» — नपुंसक होने से रूप वही दिखता है
क्रियासमर्पितम् (क्त)समर्पितवान् (क्तवतु)अब क्रिया कर्ता ‘महाराजः’ (पुं.ए.व.) के अनुसार
पाठ से मेल: ‘तदा नाभिः … तस्मै राज्यं समर्पितवान्।’ (पृ. 127) — पाठ में यह क्रिया ठीक इसी कर्तृवाच्य रूप में आई है।
प्र3.
केनापि तत् न चिन्तितम्।
उत्तर

कोऽपि तत् न चिन्तितवान्। (हिन्दी — किसी ने भी वह नहीं सोचा।)

पदम्कर्मवाच्येकर्तृवाच्येकारणम्
कर्ताकेनापि (किम् + अपि, तृ.ए.व.)कोऽपि (कः + अपि, प्र.ए.व.)प्रथमा में ‘कः’, और ‘कः + अपि’ की विसर्गसन्धि से ‘कोऽपि’
कर्मतत् (प्र.ए.व.)तत् (द्वि.ए.व.)नपुंसकलिङ्ग में प्रथमा-द्वितीया के रूप समान
क्रियाचिन्तितम् (क्त)चिन्तितवान् (क्तवतु)कर्ता ‘कोऽपि’ पुं.ए.व. है
सन्धि पर ध्यान दीजिए: ‘कः + अपि’ में विसर्ग के आगे ‘अ’ है, अतः विसर्गसन्धि से ‘कोऽपि’ बनेगा (अः + अ → ओ + ऽ)। यही सन्धि अभ्यास के प्रश्न ५ (छ) ‘प्रस्थितः + अयम् → प्रस्थितोऽयम्’ में भी पूछी गई है। ‘न’ अव्यय ज्यों का त्यों रहता है।
पाठ से मेल: ‘परं भिक्षायां भोजनपदार्थः देयः इति न केनापि चिन्तितम्।’ (पृ. 132)
प्र4.
ऋषभदेवेन दीर्घकालिकः उपवासः कृतः।
उत्तर

ऋषभदेवः दीर्घकालिकम् उपवासं कृतवान्। (हिन्दी — ऋषभदेव ने दीर्घकालीन उपवास किया।)

पदम्कर्मवाच्येकर्तृवाच्येकारणम्
कर्ताऋषभदेवेन (तृ.ए.व.)ऋषभदेवः (प्र.ए.व.)कर्तरि प्रथमा
कर्मउपवासः (प्र.ए.व.)उपवासम् (द्वि.ए.व.)कर्मणि द्वितीया — यहाँ रूप स्पष्ट बदलता है
विशेषणम्दीर्घकालिकःदीर्घकालिकम्विशेषण अपने विशेष्य के साथ विभक्ति बदलता है
क्रियाकृतः (क्त, कर्म के अनुसार)कृतवान् (क्तवतु, कर्ता के अनुसार)ऋषभदेवः पुं.ए.व.
यह वाक्य सबसे अच्छा उदाहरण है क्योंकि इसमें तीनों परिवर्तन आँखों से दिख जाते हैं — कर्ता ‘ऋषभदेवेन’ से ‘ऋषभदेवः’, कर्म ‘उपवासः’ से ‘उपवासम्’, और विशेषण ‘दीर्घकालिकः’ से ‘दीर्घकालिकम्’। ऊपर (क) और (ख) में कर्म नपुंसक था, इसलिए रूप वही दिख रहा था; यहाँ पुल्लिङ्ग होने से भेद प्रकट है।
पाठ से मेल: ‘कदाचित् ऋषभदेवः भोज्यपदार्थानाम् अभावे चतुःशतं दिनानि नैरन्तर्येण उपवासं कृतवान्।’ (पृ. 132) — पाठ स्वयं कर्तृवाच्य रूप देता है।
प्र5.
जनैः जीवनपद्धतिः परिवर्तिता।
उत्तर

जनाः जीवनपद्धतिं परिवर्तितवन्तः। (हिन्दी — लोगों ने अपनी जीवन-पद्धति बदल ली।)

पदम्कर्मवाच्येकर्तृवाच्येकारणम्
कर्ताजनैः (तृ.ब.व.)जनाः (प्र.ब.व.)कर्तरि प्रथमा — यहाँ बहुवचन है
कर्मजीवनपद्धतिः (स्त्री.प्र.ए.व.)जीवनपद्धतिम् (स्त्री.द्वि.ए.व.)कर्मणि द्वितीया
क्रियापरिवर्तिता (क्त, स्त्रीलिङ्ग — कर्म के अनुसार)परिवर्तितवन्तः (क्तवतु, पुं.ब.व. — कर्ता के अनुसार)कर्ता ‘जनाः’ पुल्लिङ्ग बहुवचन है
यहाँ क्रिया का लिङ्ग भी बदल गया — क्यों: कर्मवाच्य में क्रिया कर्म ‘जीवनपद्धतिः’ (स्त्रीलिङ्ग) के साथ मिली थी, इसलिए ‘परिवर्तित’। कर्तृवाच्य में वह कर्ता ‘जनाः’ (पुल्लिङ्ग बहुवचन) के साथ मिलेगी, इसलिए ‘परिवर्तितवन्तः’। क्रिया किसके साथ मिलती है — यही दोनों वाच्यों का असली अन्तर है, विभक्ति तो उसी का परिणाम है।
पाठ से मेल: ‘तेन क्रमशः जनाः सक्रियाः अभवन् जीवनपद्धतिं च परिवर्तितवन्तः।’ (पृ. 129)
प्र6.
ऋषभेण योजना कृता।
उत्तर

ऋषभः योजनां कृतवान्। (हिन्दी — ऋषभ ने योजना बनाई।)

पदम्कर्मवाच्येकर्तृवाच्येकारणम्
कर्ताऋषभेण (तृ.ए.व.)ऋषभः (प्र.ए.व.)कर्तरि प्रथमा
कर्मयोजना (स्त्री.प्र.ए.व.)योजनाम् (स्त्री.द्वि.ए.व.)कर्मणि द्वितीया
क्रियाकृता (क्त, स्त्रीलिङ्ग)कृतवान् (क्तवतु, पुं.ए.व.)कर्ता ‘ऋषभः’ के अनुसार
पाठ से मेल तथा बहुवचन-रूप: पाठ में यही बात बहुवचन में आई है — ‘अतः सः मूलसमस्यानां परिष्काराय जनानां सुखमय-जीवनाय च विविधाः योजनाः रचितवान्।’ (पृ. 128)। यदि प्रश्न में कर्ता स्त्रीलिङ्ग होता (यथा — ‘मरुदेव्या योजना कृता’), तो उत्तर होता ‘मरुदेवी योजनां कृतवती’ — क्तवतु का स्त्रीलिङ्ग रूप ‘कृतवती’ है। यह भेद परीक्षा में बहुधा पूछा जाता है।
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