शारदा अध्याय 10 अभ्यासाद् जायते सिद्धिः

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
इति + अतः
उत्तर

इत्यतः। (हिन्दी — ‘इसलिए’, ‘इस कारण से’।)

सन्धेः नाम — यण् सन्धिः (स्वरसन्धिः)।

इति + अतः
इ + अ → य् + अ
इत्यतः
नियम पहले, प्रयोग बाद में: यण् सन्धि का सूत्र है «इको यणचि» — इक् (इ, उ, ऋ, ऌ) के बाद यदि असवर्ण स्वर (अच्) आए, तो इक् के स्थान पर यण् (य्, व्, र्, ल्) हो जाता है। यहाँ ‘इति’ का अन्तिम है और आगे है — दोनों असवर्ण हैं, अतः इ → य् हुआ और बना ‘इत्यतः’। इसी नियम के और उदाहरण — प्रति + एकम् = प्रत्येकम्, अति + अन्तम् = अत्यन्तम्, मधु + अरिः = मध्वरिः।
पाठ में कहाँ: ‘… प्रभुः नाथः इत्यतः “आदिनाथः” इति ख्यातः।’ (पृ. 133)
प्र2.
च + इति
उत्तर

चेति। (हिन्दी — ‘और ऐसा’, ‘तथा यह’।)

सन्धेः नाम — गुण सन्धिः (स्वरसन्धिः)।

च + इति
अ + इ → ए
चेति
नियम: गुण सन्धि का सूत्र है «आद्गुणः» — अ अथवा आ के बाद यदि इ/ई आए तो दोनों मिलकर , उ/ऊ आए तो , और ऋ आए तो अर् हो जाता है। यहाँ ‘च’ का तथा ‘इति’ का मिलकर बने — ‘चेति’। इसी नियम से — देव + इन्द्रः = देवेन्द्रः, सूर्य + उदयः = सूर्योदयः, महा + ऋषिः = महर्षिः।
पाठ में कहाँ: ‘ब्राह्मी सुन्दरी चेति द्वे कन्ये’ (पृ. 130); ‘भिक्षुः भिक्षुणी श्रावकः श्राविका चेति क्रमं रचितवान्’ (पृ. 133)। पाठ में एक स्थान पर तिहरा जोड़ भी है — ‘च + इति + एतादृश्यः = चेत्येतादृश्यः’ (पृ. 128), जहाँ पहले गुण सन्धि, फिर यण् सन्धि लगी।
प्र3.
देवस्य + अपि
उत्तर

देवस्यापि। (हिन्दी — ‘देव का भी’।)

सन्धेः नाम — दीर्घ सन्धिः (स्वरसन्धिः)।

देवस्य + अपि
अ + अ → आ
देवस्यापि
नियम: दीर्घ सन्धि का सूत्र है «अकः सवर्णे दीर्घः» — यदि दो सवर्ण (एक ही स्थान से बोले जाने वाले) स्वर मिलें, तो दोनों के स्थान पर उनका दीर्घ रूप हो जाता है। यहाँ ‘देवस्य’ का अन्तिम तथा ‘अपि’ का आदि — दोनों सवर्ण हैं, अतः मिलकर बने। इसी नियम से — विद्या + आलयः = विद्यालयः, मुनि + इन्द्रः = मुनीन्द्रः, भानु + उदयः = भानूदयः।
पाठ में कहाँ: ‘ऋषभदेवस्यापि जीवने काचित् तादृशी घटना संवृत्ता …’ (पृ. 130)
प्र4.
तथा + एव
उत्तर

तथैव। (हिन्दी — ‘उसी प्रकार’, ‘वैसे ही’।)

सन्धेः नाम — वृद्धि सन्धिः (स्वरसन्धिः)।

तथा + एव
आ + ए → ऐ
तथैव
नियम: वृद्धि सन्धि का सूत्र है «वृद्धिरेचि» — अ अथवा आ के बाद यदि एच् (ए, ऐ, ओ, औ) आए, तो दोनों के स्थान पर वृद्धि होती है : अ/आ + ए/ऐ → , तथा अ/आ + ओ/औ → । यहाँ ‘तथा’ का तथा ‘एव’ का मिलकर बने। इसी नियम से — एक + एकम् = एकैकम्, महा + औषधम् = महौषधम्, तव + एव = तवैव।
पाठ में कहाँ:तथैव ऋषभस्य पुत्रीषु ब्राह्मी सुन्दरी चेति द्वे कन्ये …’ (पृ. 130)। इसी नियम का एक और रूप पाठ में — ‘अथ + एकदा = अथैकदा’ (पृ. 127) तथा ‘तस्य + एव = तस्यैव’ (पृ. 133)।
प्र5.
इति + एतादृशाः
उत्तर

इत्येतादृशाः। (हिन्दी — ‘इस प्रकार के’, ‘ऐसे-ऐसे’।)

सन्धेः नाम — यण् सन्धिः (स्वरसन्धिः)।

इति + एतादृशाः
इ + ए → य् + ए
इत्येतादृशाः
नियम: वही «इको यणचि» — ‘इति’ का अन्तिम तथा आगे असवर्ण स्वर , अतः इ → य्। यहाँ एक बात ध्यान से देखिए : (क) में ‘इति + अतः’ था और यहाँ ‘इति + एतादृशाः’ — आगे वाला स्वर बदल गया, पर नियम वही रहा, क्योंकि यण् सन्धि केवल यह देखती है कि पहला स्वर इक् हो और दूसरा उससे असवर्ण अच् हो। सन्धि याद करने का यही सही तरीका है — जोड़ी नहीं, नियम याद कीजिए।
पाठ में कहाँ: पाठ में यह स्त्रीलिङ्ग बहुवचन रूप में तिहरे जोड़ के साथ आया है — ‘… प्रजासु उत्पादनक्षमतायाः अभावः चेत्येतादृश्यः मूलसमस्याः सन्ति इति।’ (पृ. 128) = च + इति + एतादृश्यः।
प्र6.
ब्राह्मीद्वारा + एव
उत्तर

ब्राह्मीद्वारैव। (हिन्दी — ‘ब्राह्मी के द्वारा ही’।)

सन्धेः नाम — वृद्धि सन्धिः (स्वरसन्धिः)।

ब्राह्मीद्वारा + एव
आ + ए → ऐ
ब्राह्मीद्वारैव
नियम: «वृद्धिरेचि» — ‘द्वारा’ का अन्तिम तथा ‘एव’ का मिलकर बने। यह (घ) ‘तथा + एव → तथैव’ के ठीक समान है, केवल पूर्वपद बड़ा है। समास-युक्त लम्बे शब्द देखकर घबराइए मत — सन्धि सदा अन्तिम ध्वनि और अगली आदि ध्वनि के बीच होती है, बीच का ढेर सारा शब्द उससे अछूता रहता है।
पाठ में कहाँ: ‘जैनसम्प्रदायानुगुणं ब्राह्मीलिप्याः विकासः ब्राह्मीद्वारैव कृता इति श्रूयते।’ (पृ. 130)
प्र7.
प्रस्थितः + अयम्
उत्तर

प्रस्थितोऽयम्। (हिन्दी — ‘यह प्रस्थान किया हुआ (महामुनि)’।)

सन्धेः नाम — विसर्गसन्धिः (कुछ ग्रन्थों में इसे ‘गुणसन्धि-सहित विसर्गसन्धि’ भी कहते हैं)।

प्रस्थितः + अयम्
अ + विसर्ग (ः) + अ
अः → ओ, तथा आगे वाला अ → अवग्रह (ऽ)
प्रस्थितोऽयम्
नियम दो चरणों में: (१) यदि विसर्ग से पहले हो और विसर्ग के बाद भी हो, तो ‘अः’ के स्थान पर हो जाता है। (२) उसके बाद वाला ‘अ’ लुप्त हो जाता है और उसके स्थान पर अवग्रह-चिह्न (ऽ) लगाया जाता है — यह चिह्न बताता है कि यहाँ एक ‘अ’ था। इसीलिए ‘प्रस्थितोऽयम्’ लिखा जाता है, ‘प्रस्थितोयम्’ नहीं। इसी नियम से — कः + अपि = कोऽपि, रामः + अवदत् = रामोऽवदत्, सः + अपि = सोऽपि।
पाठ में कहाँ: ‘… जीवनस्य परमसत्यम् अन्वेष्टुं प्रस्थितोऽयं महामुनिः।’ (पृ. 131)
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