प्र1.
जैनधर्मस्य चतुर्विंशतेः तीर्थङ्कराणां नामानि क्रमेण लिखत। पुस्तकं प्रथमस्य चतुर्विंशस्य च तीर्थङ्करस्य विषये किं किम् आह ?
उत्तर
पुस्तक ‘स्वाध्यायान्मा प्रमदः’ के अन्तर्गत चौबीसों तीर्थङ्करों के चित्र तथा नाम क्रम से देती है। पूरी सूची —
| क्र. | तीर्थङ्करः | क्र. | तीर्थङ्करः |
|---|---|---|---|
| (१) | ऋषभदेवः (आदिनाथः) | (१३) | विमलनाथः |
| (२) | अजितनाथः | (१४) | अनन्तनाथः |
| (३) | सम्भवनाथः | (१५) | धर्मनाथः |
| (४) | अभिनन्दनाथः | (१६) | शान्तिनाथः |
| (५) | सुमतिनाथः | (१७) | कुन्थुनाथः |
| (६) | पद्मप्रभुः | (१८) | अरनाथः |
| (७) | सुपार्श्वनाथः | (१९) | मल्लिनाथः |
| (८) | चन्द्रप्रभुः | (२०) | मुनिसुव्रतः |
| (९) | पुष्पदन्तः (सुविधिनाथः) | (२१) | नामिनाथः |
| (१०) | शीतलनाथः | (२२) | नेमिनाथः (अरिष्टनेमिः) |
| (११) | श्रेयांसनाथः | (२३) | पार्श्वनाथः |
| (१२) | वासुपूज्यः | (२४) | महावीरः (वर्धमानः) |
पुस्तक की अपनी टिप्पणियाँ (केवल दो तीर्थङ्करों पर) —
| तीर्थङ्करः | पुस्तकस्य वाक्यानि | हिन्दी |
|---|---|---|
| (१) ऋषभदेवः (आदिनाथः) | प्रथमः तीर्थङ्करः, ‘आदिनाथः’ इति प्रसिद्धः। आद्यः धर्मोपदेशकः; कृषिः, लिपिः, कला, व्यवसायः च जगति आरब्धाः। | प्रथम तीर्थंकर, ‘आदिनाथ’ नाम से प्रसिद्ध। सबसे पहले धर्म का उपदेश देने वाले; उन्हीं से जगत् में खेती, लिपि, कला तथा व्यवसाय आरम्भ हुए। |
| (२४) महावीरः (वर्धमानः) | चतुर्विंशः तीर्थङ्करः, जैनधर्मस्य परमो महापुरुषः। वैशाली-कुण्डग्रामे जातः। ‘पञ्चमहाव्रतानां’ प्रचारकः। अहिंसा, अपरिग्रह, संयमस्य महत्त्वं लोकाय उपदिष्टवान्। | चौबीसवें तीर्थंकर, जैन धर्म के परम महापुरुष। वैशाली के कुण्डग्राम में जन्मे। ‘पञ्चमहाव्रतों’ के प्रचारक। उन्होंने लोक को अहिंसा, अपरिग्रह तथा संयम का महत्त्व बताया। |
पुस्तक की टिप्पणी और पाठ की कथा एक ही बात कहती हैं: ‘स्वाध्याय’ में ऋषभदेव के लिए लिखा है — ‘कृषिः, लिपिः, कला, व्यवसायः च जगति आरब्धाः’। अब मुख्य पाठ को याद कीजिए — उन्होंने कृषिकार्य, वस्त्रनिर्माण, पात्रनिर्माण, गृह-नगर-निर्माण सिखाया (कृषि, कला, व्यवसाय) और उनकी पुत्री ब्राह्मी से लिपि का विकास हुआ (लिपि)। अर्थात् यह टिप्पणी कोई नई सूचना नहीं, पूरे पाठ का एक पंक्ति में सार है। इसीलिए वे ‘आदिनाथ’ हैं — ‘आदि’ अर्थात् ‘सबसे पहले’।
चित्रों में छिपा एक सङ्केत: पुस्तक के हर तीर्थङ्कर-चित्र में आसन के नीचे एक छोटा-सा चिह्न बना है — इसे परम्परा में ‘लाञ्छन’ कहते हैं और इसी से मूर्ति पहचानी जाती है। जैसे — ऋषभदेव के नीचे वृषभ (बैल — इसीलिए ‘ऋषभ’ नाम), अजितनाथ के नीचे गज, सम्भवनाथ के नीचे अश्व, पद्मप्रभु के नीचे कमल, सुपार्श्वनाथ के नीचे स्वस्तिक, चन्द्रप्रभु के नीचे चन्द्र, शान्तिनाथ के नीचे मृग, नेमिनाथ के नीचे शङ्ख, पार्श्वनाथ के नीचे सर्प तथा महावीर के नीचे सिंह। पुस्तक ये नाम नहीं लिखती — चित्र देखकर स्वयं मिलाइए, यही ‘स्वाध्याय’ है। वर्तनी-सङ्केत: पुस्तक (२१) पर ‘नामिनाथः’ छापती है; अन्य ग्रन्थों में यह नाम प्रायः ‘नमिनाथः’ मिलता है — उत्तर में पुस्तक का ही रूप लिखिए।