शारदा अध्याय 10 स्वाध्यायान्मा प्रमदः

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
जैनधर्मस्य चतुर्विंशतेः तीर्थङ्कराणां नामानि क्रमेण लिखत। पुस्तकं प्रथमस्य चतुर्विंशस्य च तीर्थङ्करस्य विषये किं किम् आह ?
उत्तर

पुस्तक ‘स्वाध्यायान्मा प्रमदः’ के अन्तर्गत चौबीसों तीर्थङ्करों के चित्र तथा नाम क्रम से देती है। पूरी सूची —

क्र.तीर्थङ्करःक्र.तीर्थङ्करः
(१)ऋषभदेवः (आदिनाथः)(१३)विमलनाथः
(२)अजितनाथः(१४)अनन्तनाथः
(३)सम्भवनाथः(१५)धर्मनाथः
(४)अभिनन्दनाथः(१६)शान्तिनाथः
(५)सुमतिनाथः(१७)कुन्थुनाथः
(६)पद्मप्रभुः(१८)अरनाथः
(७)सुपार्श्वनाथः(१९)मल्लिनाथः
(८)चन्द्रप्रभुः(२०)मुनिसुव्रतः
(९)पुष्पदन्तः (सुविधिनाथः)(२१)नामिनाथः
(१०)शीतलनाथः(२२)नेमिनाथः (अरिष्टनेमिः)
(११)श्रेयांसनाथः(२३)पार्श्वनाथः
(१२)वासुपूज्यः(२४)महावीरः (वर्धमानः)

पुस्तक की अपनी टिप्पणियाँ (केवल दो तीर्थङ्करों पर) —

तीर्थङ्करःपुस्तकस्य वाक्यानिहिन्दी
(१) ऋषभदेवः (आदिनाथः)प्रथमः तीर्थङ्करः, ‘आदिनाथः’ इति प्रसिद्धः। आद्यः धर्मोपदेशकः; कृषिः, लिपिः, कला, व्यवसायः च जगति आरब्धाः।प्रथम तीर्थंकर, ‘आदिनाथ’ नाम से प्रसिद्ध। सबसे पहले धर्म का उपदेश देने वाले; उन्हीं से जगत् में खेती, लिपि, कला तथा व्यवसाय आरम्भ हुए।
(२४) महावीरः (वर्धमानः)चतुर्विंशः तीर्थङ्करः, जैनधर्मस्य परमो महापुरुषः। वैशाली-कुण्डग्रामे जातः। ‘पञ्चमहाव्रतानां’ प्रचारकः। अहिंसा, अपरिग्रह, संयमस्य महत्त्वं लोकाय उपदिष्टवान्।चौबीसवें तीर्थंकर, जैन धर्म के परम महापुरुष। वैशाली के कुण्डग्राम में जन्मे। ‘पञ्चमहाव्रतों’ के प्रचारक। उन्होंने लोक को अहिंसा, अपरिग्रह तथा संयम का महत्त्व बताया।
पुस्तक की टिप्पणी और पाठ की कथा एक ही बात कहती हैं: ‘स्वाध्याय’ में ऋषभदेव के लिए लिखा है — ‘कृषिः, लिपिः, कला, व्यवसायः च जगति आरब्धाः’। अब मुख्य पाठ को याद कीजिए — उन्होंने कृषिकार्य, वस्त्रनिर्माण, पात्रनिर्माण, गृह-नगर-निर्माण सिखाया (कृषि, कला, व्यवसाय) और उनकी पुत्री ब्राह्मी से लिपि का विकास हुआ (लिपि)। अर्थात् यह टिप्पणी कोई नई सूचना नहीं, पूरे पाठ का एक पंक्ति में सार है। इसीलिए वे ‘आदिनाथ’ हैं — ‘आदि’ अर्थात् ‘सबसे पहले’।
चित्रों में छिपा एक सङ्केत: पुस्तक के हर तीर्थङ्कर-चित्र में आसन के नीचे एक छोटा-सा चिह्न बना है — इसे परम्परा में ‘लाञ्छन’ कहते हैं और इसी से मूर्ति पहचानी जाती है। जैसे — ऋषभदेव के नीचे वृषभ (बैल — इसीलिए ‘ऋषभ’ नाम), अजितनाथ के नीचे गज, सम्भवनाथ के नीचे अश्व, पद्मप्रभु के नीचे कमल, सुपार्श्वनाथ के नीचे स्वस्तिक, चन्द्रप्रभु के नीचे चन्द्र, शान्तिनाथ के नीचे मृग, नेमिनाथ के नीचे शङ्ख, पार्श्वनाथ के नीचे सर्प तथा महावीर के नीचे सिंह। पुस्तक ये नाम नहीं लिखती — चित्र देखकर स्वयं मिलाइए, यही ‘स्वाध्याय’ है। वर्तनी-सङ्केत: पुस्तक (२१) पर ‘नामिनाथः’ छापती है; अन्य ग्रन्थों में यह नाम प्रायः ‘नमिनाथः’ मिलता है — उत्तर में पुस्तक का ही रूप लिखिए।
प्र2.
जैनधर्मस्य द्वादश प्रमुखतीर्थस्थानानि तेषां च राज्यानि लिखत। एतेषु कानि स्थानानि पाठे अपि आगतानि ?
उत्तर

पुस्तक बारह प्रमुख तीर्थस्थान गिनाती है —

क्र.तीर्थस्थानम्राज्यम् / स्थितिः
(१)सम्मेतशिखरम्पारसनाथ पर्वतः, झारखण्डः
(२)श्रवणबेलगोळःकर्नाटकम्
(३)पावापुरीबिहारः
(४)रैवतकः (गिरनारः) पर्वतःगुजरातः
(५)शत्रुञ्जयपर्वतःपदलिप्तपुरम् — पालीताणा, गुजरातः
(६)राजगृहम्बिहारः
(७)अयोध्याउत्तरप्रदेशः
(८)काशी (वाराणसी)उत्तरप्रदेशः
(९)चम्पापुरम्भागलपुर, बिहारः
(१०)हस्तिनापुरम्उत्तरप्रदेशः
(११)मिथिलाबिहारः
(१२)द्वारिकागुजरातः

पाठे अपि आगतानि स्थानानि —

स्थानम्पाठे कुत्र
हस्तिनापुरम् (उत्तरप्रदेशः)‘एकदा पर्यटनावसरे सः हस्तिनापुरस्य समीपे स्थितस्य इक्षुक्षेत्रस्य पार्श्वमार्गात् गच्छति स्म’ — यहीं श्रेयांस ने इक्षुरस दिया (पृ. 133); और यहीं ‘वर्षितप-पारणा-महोत्सवः’ मनाया जाता है
पदलिप्तपुरम् — पालीताणा (गुजरातः)‘अतः जैनसम्प्रदाये वर्षितप-पारणा-महोत्सवः अधुनापि गुजराते पदलिप्तपुरम् (पालीताणा) … आचर्यते’ (पृ. 133) — यही सूची का (५) शत्रुञ्जयपर्वत है
सूची को मानचित्र पर रखकर देखिए — तब वह याद रह जाएगी: बारह में से पाँच बिहार-झारखण्ड में हैं (सम्मेतशिखर, पावापुरी, राजगृह, चम्पापुर, मिथिला), तीन उत्तर प्रदेश में (अयोध्या, काशी, हस्तिनापुर), तीन गुजरात में (गिरनार, शत्रुञ्जय, द्वारिका) और एक कर्नाटक में (श्रवणबेलगोल)। अर्थात् ये तीर्थ पूर्व, उत्तर, पश्चिम और दक्षिण — चारों दिशाओं में फैले हैं। यही बताता है कि यह परम्परा किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं रही। ‘अयोध्या’ को ऋषभदेव की जन्मभूमि तथा ‘पावापुरी’ को महावीर के निर्वाण-स्थल के रूप में जाना जाता है, अर्थात् सूची का पहला और अन्तिम तीर्थङ्कर दोनों इसी सूची से जुड़े हैं।
उच्चारण-सङ्केत: ‘श्रवणबेलगोळः’ में ‘ळ’ कन्नड-मराठी का मूर्धन्य ल है — जैसा पुस्तक में छपा है वैसा ही लिखिए। ‘पदलिप्तपुरम्’ पालीताणा का संस्कृत नाम है; ‘रैवतकः’ गिरनार का। ‘शत्रुञ्जयः’ = शत्रुं जयति इति (उपपद-तत्पुरुष) — ‘जो शत्रु को जीते’।
प्र3.
‘स्वाध्यायान्मा प्रमदः’ इति शीर्षकस्य अर्थः कः ? अस्मिन् पाठे एतत् किमर्थं दत्तम् ?
उत्तर

अर्थः — ‘स्वाध्यायात् मा प्रमदः’ — स्वाध्याये प्रमादं मा कुरु, अर्थात् स्वयम् अध्ययनं कर्तुं कदापि आलस्यं मा कुरु।

(हिन्दी — ‘स्वाध्याय में प्रमाद मत कर’ — अर्थात् स्वयं पढ़ने-सीखने में कभी आलस्य मत करो।)

पदम्व्याकरणअर्थः
स्वाध्यायात्पुं.पञ्चमी ए.व.स्वाध्याय से (‘मा’ के योग में पञ्चमी) — स्व + अध्यायः = अपना अध्ययन
मानिषेधार्थकम् अव्ययम्मत (यह ‘लुङ्’ अथवा ‘लोट्’ के साथ आता है और ‘अ’ आगम नहीं लगने देता)
प्रमदः√मद् (प्र + मद्), लुङ्, मध्यमपुरुष ए.व.प्रमाद मत कर, असावधान मत हो
यह वाक्य कहाँ से आया और यहाँ क्यों है: यह तैत्तिरीयोपनिषद् की प्रसिद्ध ‘शिक्षावल्ली’ का वचन है — ‘स्वाध्यायान्मा प्रमदः’ (स्वाध्याय में प्रमाद मत करो), जो दीक्षान्त-उपदेश का अंग है। पुस्तक ने इसे उस खण्ड का शीर्षक बनाया है जिसमें पूछा कुछ नहीं जाता, केवल सामग्री दी जाती है — यहाँ चौबीस तीर्थङ्करों के नाम और बारह तीर्थस्थान। सन्देश स्पष्ट है : जो प्रश्न में नहीं पूछा गया, वह भी पढ़ने योग्य है। परीक्षा के लिए पढ़ना ‘अध्ययन’ है; बिना पूछे पढ़ना ‘स्वाध्याय’ है — और यही वह पढ़ाई है जो जीवन भर साथ रहती है।
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