यह अन्वेषण-कार्य है — पुस्तक इसका उत्तर स्वयं नहीं देती, वह आपसे पता लगाने को कहती है। सही तरीका यह है : (१) अपने किसी जैन मित्र, सहपाठी अथवा उनके परिवार से पूछिए; (२) विद्यालय-पुस्तकालय अथवा किसी विश्वसनीय पुस्तक से मिलाइए; (३) फिर पाठ के अहिंसा तथा अपरिग्रह सिद्धान्तों से जोड़कर लिखिए कि ऐसा क्यों किया जाता है। और एक बात अवश्य ध्यान रखिए — परम्पराओं में भेद होता है (दिगम्बर तथा श्वेताम्बर में, गृहस्थ तथा मुनि में), इसलिए ‘सब जैन ऐसा ही करते हैं’ कहने के बजाय ‘जैनपरम्परायाम् एतादृशी पद्धतिः प्रायः पाल्यते’ लिखिए।
आदर्श उत्तरम् (नमूना उत्तर — संस्कृतम्) —
किं खादन्ति ?
जैनजनाः शाकाहारम् एव सेवन्ते। मांसम्, मत्स्यम्, अण्डं च ते न खादन्ति।
बहवः जनाः कन्दमूलानि अपि वर्जयन्ति, यतः तेषु सूक्ष्मजीवाः अधिकाः भवन्ति इति परम्परायां मन्यते।
मधु अपि प्रायः वर्जयन्ति, यतः तस्य ग्रहणे मधुमक्षिकाणां हिंसा भवति।
जलं वस्त्रेण गालयित्वा एव पिबन्ति, येन सूक्ष्मजीवाः न पीड्येरन्।
भोजनं सरलं, अल्पं, संयमपूर्वकं च भवति — इदम् एव ‘अपरिग्रहस्य’ आचरणम्।
कस्मिन् समये खादन्ति ?
सूर्यास्तात् पूर्वम् एव भोजनं कुर्वन्ति। रात्रौ भोजनं प्रायः न कुर्वन्ति।
अस्य कारणद्वयम् — (क) रात्रौ सूक्ष्मजीवाः अन्ने पतितुं शक्नुवन्ति, अतः अहिंसा भङ्गा भवेत्;
(ख) सूर्यास्तात् पूर्वं कृतं भोजनं सुखेन पच्यते, आरोग्याय च हितकरम्।
एतत् व्रतं ‘रात्रिभोजनत्यागः’ इति कथ्यते।
पर्वदिनेषु उपवासः, एकाशनम् (एकवारं भोजनम्) इत्यादीनि व्रतानि अपि आचरन्ति।
(हिन्दी अनुवाद —) जैन सम्प्रदाय में भोजन के विषय में मूल तत्त्व अहिंसा ही है। क्या खाते हैं — जैन लोग शाकाहार ही लेते हैं; मांस, मछली और अण्डा नहीं खाते। बहुत-से लोग कन्दमूल (ज़मीन के नीचे उगने वाली वस्तुएँ) भी छोड़ देते हैं, क्योंकि परम्परा में माना जाता है कि उनमें सूक्ष्म जीव अधिक होते हैं। शहद भी प्रायः वर्जित है, क्योंकि उसे लेने में मधुमक्खियों की हिंसा होती है। पानी कपड़े से छानकर ही पीते हैं, जिससे सूक्ष्म जीवों को कष्ट न हो। भोजन सरल, कम और संयमपूर्वक होता है — यही ‘अपरिग्रह’ का आचरण है। किस समय खाते हैं — सूर्यास्त से पहले ही भोजन कर लेते हैं, रात में प्रायः भोजन नहीं करते। इसके दो कारण हैं : (क) रात में सूक्ष्म जीव भोजन में गिर सकते हैं, जिससे अहिंसा भंग होगी; (ख) सूर्यास्त से पहले किया गया भोजन आसानी से पचता है और स्वास्थ्य के लिए हितकर है। इस व्रत को ‘रात्रिभोजन-त्याग’ कहते हैं। पर्व के दिनों में उपवास तथा एकाशन (दिन में एक बार भोजन) जैसे व्रत भी किए जाते हैं।