शारदा अध्याय 10 यस्तु क्रियावान् मनुजः स विद्वान्

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
जैनसम्प्रदायानुसारं भोजनपद्धतिं लिखत। (किं खादन्ति ? कस्मिन् समये खादन्ति ?)
उत्तर

यह अन्वेषण-कार्य है — पुस्तक इसका उत्तर स्वयं नहीं देती, वह आपसे पता लगाने को कहती है। सही तरीका यह है : (१) अपने किसी जैन मित्र, सहपाठी अथवा उनके परिवार से पूछिए; (२) विद्यालय-पुस्तकालय अथवा किसी विश्वसनीय पुस्तक से मिलाइए; (३) फिर पाठ के अहिंसा तथा अपरिग्रह सिद्धान्तों से जोड़कर लिखिए कि ऐसा क्यों किया जाता है। और एक बात अवश्य ध्यान रखिए — परम्पराओं में भेद होता है (दिगम्बर तथा श्वेताम्बर में, गृहस्थ तथा मुनि में), इसलिए ‘सब जैन ऐसा ही करते हैं’ कहने के बजाय ‘जैनपरम्परायाम् एतादृशी पद्धतिः प्रायः पाल्यते’ लिखिए।

आदर्श उत्तरम् (नमूना उत्तर — संस्कृतम्) —

जैनसम्प्रदाये भोजनविषये अहिंसा एव मूलं तत्त्वम्।

किं खादन्ति ?
जैनजनाः शाकाहारम् एव सेवन्ते। मांसम्, मत्स्यम्, अण्डं च ते न खादन्ति।
बहवः जनाः कन्दमूलानि अपि वर्जयन्ति, यतः तेषु सूक्ष्मजीवाः अधिकाः भवन्ति इति परम्परायां मन्यते।
मधु अपि प्रायः वर्जयन्ति, यतः तस्य ग्रहणे मधुमक्षिकाणां हिंसा भवति।
जलं वस्त्रेण गालयित्वा एव पिबन्ति, येन सूक्ष्मजीवाः न पीड्येरन्।
भोजनं सरलं, अल्पं, संयमपूर्वकं च भवति — इदम् एव ‘अपरिग्रहस्य’ आचरणम्।

कस्मिन् समये खादन्ति ?
सूर्यास्तात् पूर्वम् एव भोजनं कुर्वन्ति। रात्रौ भोजनं प्रायः न कुर्वन्ति।
अस्य कारणद्वयम् — (क) रात्रौ सूक्ष्मजीवाः अन्ने पतितुं शक्नुवन्ति, अतः अहिंसा भङ्गा भवेत्;
(ख) सूर्यास्तात् पूर्वं कृतं भोजनं सुखेन पच्यते, आरोग्याय च हितकरम्।
एतत् व्रतं ‘रात्रिभोजनत्यागः’ इति कथ्यते।

पर्वदिनेषु उपवासः, एकाशनम् (एकवारं भोजनम्) इत्यादीनि व्रतानि अपि आचरन्ति।

(हिन्दी अनुवाद —) जैन सम्प्रदाय में भोजन के विषय में मूल तत्त्व अहिंसा ही है। क्या खाते हैं — जैन लोग शाकाहार ही लेते हैं; मांस, मछली और अण्डा नहीं खाते। बहुत-से लोग कन्दमूल (ज़मीन के नीचे उगने वाली वस्तुएँ) भी छोड़ देते हैं, क्योंकि परम्परा में माना जाता है कि उनमें सूक्ष्म जीव अधिक होते हैं। शहद भी प्रायः वर्जित है, क्योंकि उसे लेने में मधुमक्खियों की हिंसा होती है। पानी कपड़े से छानकर ही पीते हैं, जिससे सूक्ष्म जीवों को कष्ट न हो। भोजन सरल, कम और संयमपूर्वक होता है — यही ‘अपरिग्रह’ का आचरण है। किस समय खाते हैं — सूर्यास्त से पहले ही भोजन कर लेते हैं, रात में प्रायः भोजन नहीं करते। इसके दो कारण हैं : (क) रात में सूक्ष्म जीव भोजन में गिर सकते हैं, जिससे अहिंसा भंग होगी; (ख) सूर्यास्त से पहले किया गया भोजन आसानी से पचता है और स्वास्थ्य के लिए हितकर है। इस व्रत को ‘रात्रिभोजन-त्याग’ कहते हैं। पर्व के दिनों में उपवास तथा एकाशन (दिन में एक बार भोजन) जैसे व्रत भी किए जाते हैं।

उत्तर को पाठ से जोड़िए — यही उसे उत्तम बनाएगा: पाठ में ऋषभदेव अपने शिष्यों को यही सिखाने निकले थे कि ‘जैनसन्न्यासिनः वृक्षेभ्यः फलानि शाकानि वा न चिनुयुः’ — अर्थात् साधु स्वयं तोड़कर न खाए, भिक्षा से जीवन चलाए। और उन्होंने उपवास को शिकायत के बिना स्वीकार किया, यहाँ तक कि चार सौ दिन तक। अतः जैन भोजनपद्धति का मूल पाठ में ही रखा है — भोजन केवल पेट भरने का साधन नहीं, अहिंसा का अभ्यास है। उत्तर में यह वाक्य अवश्य जोड़िए।
प्र2.
पञ्चमहाव्रतानि लिखत।
उत्तर

पञ्चमहाव्रतानि — सत्यम्, अहिंसा, अस्तेयम्, अपरिग्रहः, ब्रह्मचर्यं च। (पुस्तक के अपने शब्द, पृ. 134)

पाठस्य वाक्यम् — ‘तथा च प्राणिमात्रहिताय पञ्चमहाव्रतानि — सत्यम्, अहिंसा, अस्तेयम्, अपरिग्रहः, ब्रह्मचर्यं च आचरितुं कल्याणकरम् इति निगद्यते।’

क्र.महाव्रतम्अर्थः (संस्कृतम्)हिन्दी अर्थदैनिक जीवन में उदाहरण
सत्यम्यथार्थवचनम्सच बोलनाभूल हो जाए तो उसे छिपाने के बजाय स्वीकार कर लेना
अहिंसामनसा वाचा कर्मणा च प्राणिनां न पीडनम्मन, वचन तथा कर्म से किसी को न सतानाकिसी सहपाठी का उपहास न करना — वाणी की हिंसा भी हिंसा है
अस्तेयम्अदत्तस्य अग्रहणम्चोरी न करना — बिना दी हुई वस्तु न लेनाकिसी की पुस्तक बिना पूछे न उठाना
अपरिग्रहःआवश्यकात् अधिकं संग्रहः न करणीयःआवश्यकता से अधिक संग्रह न करनाजितनी आवश्यकता हो उतना ही लेना, बचा हुआ बाँट देना
ब्रह्मचर्यम्इन्द्रियसंयमःसंयम का पालनअपनी इच्छाओं पर नियन्त्रण रखना, अध्ययन में मन लगाना
पाठ इन्हें ‘प्राणिमात्रहिताय’ कहता है — अर्थात् ये व्रत केवल व्रती के अपने कल्याण के लिए नहीं, समस्त प्राणियों के हित के लिए हैं। ध्यान दीजिए, पाँचों व्रत निषेधात्मक दिखते हैं (न बोलना झूठ, न सताना, न लेना, न जोड़ना, न भोगना) — किन्तु उनका फल विधायक है : विश्वास, सुरक्षा, ईमानदारी, संतोष और आत्मबल। पुस्तक के अनुसार इन्हीं का प्रचार चौबीसवें तीर्थङ्कर महावीर ने किया — ‘पञ्चमहाव्रतानां प्रचारकः’ (पृ. 143)।
तुलना (याद रखने में सहायक): पाठ में तीन सूचियाँ आती हैं, उन्हें अलग-अलग पहचानिए — (१) सिद्धान्ताः : अहिंसा, अनेकान्तवाद, स्याद्वाद, अपरिग्रह; (२) त्रीणि रत्नानि : सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चरित्र; (३) पञ्चमहाव्रतानि : सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह, ब्रह्मचर्य। परीक्षा में इन्हें आपस में न मिलाइए।
प्र3.
णमोकारमहामन्त्र-दिवसस्य विषये किं जानन्ति इत्युपरि कक्षायां वदत।
उत्तर

यह कक्षा-भाषण का कार्य है। अच्छे भाषण में चार बातें आनी चाहिए — (१) दिवस कब है, (२) मन्त्र क्या है और किस भाषा में है, (३) उसका अर्थ, (४) उससे क्या सन्देश मिलता है। नीचे दो-ढाई मिनट का नमूना भाषण दिया है; इसे कण्ठस्थ करके, धीरे और स्पष्ट बोलिए।

आदर्श उत्तरम् (नमूना भाषणम्) —

॥ णमोकारमहामन्त्रदिवसः ॥

माननीयाः अध्यापकाः, प्रियाः सहपाठिनः, सर्वेभ्यः नमस्कारः।
अद्य अहं ‘णमोकारमहामन्त्रदिवसस्य’ विषये किञ्चित् वक्तुम् इच्छामि।

अस्माकं पाठ्यपुस्तकं ‘शारदा’ कथयति — प्रतिवर्षम् अप्रैल-मासस्य नवमे दिनाङ्के
जैनजनाः सामूहिकरूपेण अस्य मन्त्रस्य जपादिकं कृत्वा उत्सवम् आचरन्ति।
अतः अस्य दिवसस्य ‘णमोकारमहामन्त्रदिवसः’ इति ख्यातिः वर्तते।

अयं मन्त्रः संस्कृतभाषायां नास्ति — सः प्राकृतभाषायां वर्तते, इति पुस्तकम् एव वदति।
मन्त्रः एवम् अस्ति —
‘णमो अरिहन्ताणं, णमो सिद्धाणं, णमो आयरियाणं, णमो उवज्झायाणं, णमो लोए सव्वसाहूणं।’

अस्य अर्थः — नमामि अरिहन्तॄन्, नमामि सिद्धान्, नमामि आचार्यान्,
नमामि उपाध्यायान्, नमामि लोके सर्वसाधून् इति।
एषः मन्त्रः पञ्चपरमेष्ठिभ्यः प्रणामं समर्पयति।

अस्य मन्त्रस्य महत्तमा विशेषता का ?
अस्मिन् मन्त्रे कस्यापि व्यक्तेः नाम नास्ति — गुणेभ्यः एव नमस्कारः अस्ति।
यः रागद्वेषौ जितवान्, यः सिद्धिं प्राप्तवान्, यः मार्गं दर्शयति,
यः पाठयति, यः च साधनां करोति — तेभ्यः सर्वेभ्यः अयं प्रणामः।

अतः एव पुस्तकं वदति — ‘वसुधैवकुटुम्बकम्’ इत्यस्य अनुरूपेण
विश्वशान्त्यै कोटिशः जनाः इमं मन्त्रं गायन्ति।

एतावत् एव। धन्यवादः।

(हिन्दी अनुवाद —) आदरणीय अध्यापकगण, प्रिय सहपाठियो, सबको नमस्कार। आज मैं ‘णमोकार महामन्त्र दिवस’ के विषय में कुछ कहना चाहता/चाहती हूँ। हमारी पाठ्यपुस्तक ‘शारदा’ कहती है कि हर वर्ष 9 अप्रैल को जैन लोग सामूहिक रूप से इस मन्त्र का जप आदि करके उत्सव मनाते हैं; इसीलिए इस दिन को ‘णमोकार महामन्त्र दिवस’ कहा जाता है। यह मन्त्र संस्कृत में नहीं, प्राकृत भाषा में है — यह पुस्तक स्वयं कहती है। मन्त्र इस प्रकार है — ‘णमो अरिहन्ताणं, णमो सिद्धाणं, णमो आयरियाणं, णमो उवज्झायाणं, णमो लोए सव्वसाहूणं।’ इसका अर्थ है — अरिहन्तों को नमस्कार, सिद्धों को नमस्कार, आचार्यों को नमस्कार, उपाध्यायों को नमस्कार और लोक के सब साधुओं को नमस्कार। यह मन्त्र पाँच परमेष्ठियों को प्रणाम करता है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता क्या है? इसमें किसी व्यक्ति का नाम नहीं है — नमस्कार गुणों को है : जिसने राग-द्वेष जीत लिए, जिसने सिद्धि पा ली, जो मार्ग दिखाता है, जो पढ़ाता है और जो साधना कर रहा है — उन सबको यह प्रणाम है। इसीलिए पुस्तक कहती है कि ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना के अनुरूप विश्वशान्ति के लिए करोड़ों लोग इस मन्त्र को गाते हैं। बस इतना ही। धन्यवाद।

बोलते समय तीन बातें: (१) मन्त्र की पंक्तियाँ धीरे और स्पष्ट बोलिए — ‘ण’ और ‘न’ का भेद सुनाई देना चाहिए। (२) यह किसी सम्प्रदाय की श्रद्धा का विषय है, अतः आदरपूर्वक बोलिए और वही कहिए जो पुस्तक कहती है। (३) अन्त में एक वाक्य अपनी ओर से जोड़िए — ‘भाषा बदल गई, भाव नहीं बदला’ — इससे भाषण पूरा लगेगा।
प्र4.
पञ्चमहाव्रतेषु कस्यापि एकस्य व्रतस्य विषये सहपाठिनां पुरतः आगत्य वदत।
उत्तर

यह लघु-भाषण का कार्य है। पाँच में से कोई एक व्रत चुनिए। अच्छा भाषण चार चरणों में चलता है — (१) व्रत का नाम तथा अर्थ, (२) पाठ से उसका प्रमाण, (३) विद्यालय-जीवन का एक ठोस उदाहरण, (४) एक वाक्य का संकल्प। नीचे अहिंसा पर नमूना भाषण दिया है; इसी ढाँचे पर आप ‘सत्य’, ‘अस्तेय’, ‘अपरिग्रह’ अथवा ‘ब्रह्मचर्य’ पर बोल सकते हैं।

आदर्श उत्तरम् (नमूना भाषणम् — ‘अहिंसा’) —

॥ अहिंसा परमो धर्मः ॥

माननीयाः अध्यापकाः, प्रियाः सहपाठिनः, नमस्कारः।
अद्य अहं पञ्चमहाव्रतेषु प्रथमस्य — अहिंसाव्रतस्य — विषये वदामि।

अहिंसा इति कः अर्थः ? न हिंसा इति अहिंसा — कस्यापि प्राणिनः पीडनं न करणीयम्।
अस्माकं पाठः वदति — ‘अहिंसा परमो धर्मः मनसा, वाचा, कर्मणा च अहिंसापालनम्’।
अतः अहिंसा त्रिविधा — मनसा अहिंसा, वाचा अहिंसा, कर्मणा अहिंसा च।

कर्मणा अहिंसा सुगमा — वयं कमपि न ताडयामः।
वाचा अहिंसा कठिनतरा — कटुवचनम् अपि हिंसा एव।
मनसा अहिंसा कठिनतमा — मनसि द्वेषः अपि हिंसायाः बीजम्।

अस्माकं विद्यालये अपि अस्य अभ्यासः शक्यः।
यदा कश्चन सहपाठी परीक्षायाम् अल्पान् अङ्कान् प्राप्नोति, तदा तस्य उपहासः न करणीयः — इयम् अहिंसा।
यदा कश्चन मन्दं पठति, तदा तस्य सहायता करणीया — इयम् अपि अहिंसा।
यदा वयं क्रुद्धाः भवामः, तदा क्षणं तूष्णीं स्थातव्यम् — इयम् एव मनसा अहिंसा।

पाठे ऋषभदेवः स्वयम् एतत् आचरितवान् —
सः शिष्यान् अबोधयत् यत् वृक्षेभ्यः स्वयं फलानि न चेतव्यानि,
किन्तु सः तान् केवलं न उपदिष्टवान् — स्वयं भिक्षार्थं प्रस्थितः।
यः स्वयम् आचरति, तस्य एव उपदेशः फलति।

अतः अहं प्रतिज्ञां करोमि — अद्य प्रभृति अहं वाचा अपि कञ्चन न पीडयिष्यामि।
धन्यवादः।

(हिन्दी अनुवाद —) आदरणीय अध्यापकगण, प्रिय सहपाठियो, नमस्कार। आज मैं पाँच महाव्रतों में से पहले — अहिंसा व्रत — के विषय में बोलूँगा/बोलूँगी। अहिंसा का अर्थ क्या है? ‘हिंसा न हो’ — यही अहिंसा है, अर्थात् किसी भी प्राणी को कष्ट नहीं देना चाहिए। हमारा पाठ कहता है — ‘अहिंसा परम धर्म है — मन से, वाणी से और कर्म से अहिंसा का पालन।’ अतः अहिंसा तीन प्रकार की है। कर्म से अहिंसा सरल है — हम किसी को मारते नहीं। वाणी से अहिंसा कठिन है — कड़वा वचन भी हिंसा ही है। मन से अहिंसा सबसे कठिन है — मन में रखा द्वेष भी हिंसा का बीज है। इसका अभ्यास हमारे विद्यालय में भी सम्भव है : जब कोई सहपाठी परीक्षा में कम अंक लाए, तब उसका उपहास न करना — यही अहिंसा है; जब कोई धीरे पढ़ता हो, तब उसकी सहायता करना — यह भी अहिंसा है; जब हम क्रोधित हों, तब एक क्षण चुप रह जाना — यही मन से अहिंसा है। पाठ में ऋषभदेव ने स्वयं यही किया — उन्होंने शिष्यों को समझाया कि वृक्षों से स्वयं फल न तोड़ें, किन्तु केवल उपदेश नहीं दिया, स्वयं भिक्षा के लिए निकल पड़े। जो स्वयं आचरण करता है, उसी का उपदेश फलता है। इसलिए मैं प्रतिज्ञा करता/करती हूँ — आज से मैं वाणी से भी किसी को कष्ट नहीं दूँगा/दूँगी। धन्यवाद।

यह भाषण अच्छा क्यों माना जाएगा: (१) परिभाषा पहले वाक्य में आ गई; (२) प्रमाण पाठ का अपना वाक्य है, बाहर से लाया हुआ नहीं; (३) विभाजन स्पष्ट है — मन, वाणी, कर्म — और तीनों को कठिनाई के क्रम में रखा गया है, इसलिए बात याद रह जाती है; (४) उदाहरण सुनने वालों के अपने जीवन से हैं, इसलिए वे जुड़ते हैं; (५) कथा से जोड़ — ऋषभदेव का उदाहरण भाषण को पाठ से बाँध देता है; (६) अन्त में एक छोटा-सा, सचमुच निभाने योग्य संकल्प है, कोई बड़ी घोषणा नहीं। अन्य व्रत चुनें तो यही छह चरण दोहराइए — जैसे ‘अपरिग्रह’ पर बोलते समय उदाहरण दीजिए कि आवश्यकता से अधिक कापियाँ-वस्तुएँ जमा न करें और अतिरिक्त पुस्तकें किसी को दे दें।
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