शारदा अध्याय 11 अभ्यासाद् जायते सिद्धिः

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
स्वराः स्वतन्त्रवर्णाः सन्ति। (रेखाङ्कितम् — स्वराः)
उत्तर

प्रश्नः — के स्वतन्त्रवर्णाः सन्ति ?

(हिन्दी — कौन स्वतन्त्र वर्ण हैं ? — उत्तर : स्वर।)

रेखाङ्कितं पदम्लिङ्गम् · विभक्तिः · वचनम्प्रश्नवाचकं पदम्कारणम्
स्वराःपुल्लिङ्गम् · प्रथमा · बहुवचनम्के‘किम्’ शब्दस्य पुल्लिङ्ग-प्रथमा-बहुवचनम् ‘के’ भवति
प्रश्ननिर्माण का पहला नियम: जो पद रेखांकित है, उसे हटाकर उसकी जगह उसी लिङ्ग, उसी विभक्ति तथा उसी वचन का प्रश्नवाचक शब्द रखिए; शेष वाक्य ज्यों का त्यों रहने दीजिए। ‘स्वराः’ पुल्लिङ्ग प्रथमा बहुवचन है, इसलिए ‘किम्’ का वही रूप — के — आएगा। ‘कः’ (एकवचन) या ‘कानि’ (नपुंसकलिङ्ग) लिखना अशुद्ध होगा।
‘किम्’ शब्द के तीनों लिङ्गों में प्रथमा: पुल्लिङ्ग — कः · कौ · के; स्त्रीलिङ्ग — का · के · काः; नपुंसकलिङ्ग — किम् · के · कानि। यही तालिका प्रश्न ५ के (क) और (ख) दोनों का आधार है।
प्र2.
व्यञ्जनानि अर्धमात्रिकाणि भवन्ति। (रेखाङ्कितम् — व्यञ्जनानि)
उत्तर

प्रश्नः — कानि अर्धमात्रिकाणि भवन्ति ?

(हिन्दी — कौन आधी मात्रा वाले होते हैं ? — उत्तर : व्यञ्जन।)

रेखाङ्कितं पदम्लिङ्गम् · विभक्तिः · वचनम्प्रश्नवाचकं पदम्कारणम्
व्यञ्जनानिनपुंसकलिङ्गम् · प्रथमा · बहुवचनम्कानि‘किम्’ शब्दस्य नपुंसकलिङ्ग-प्रथमा-बहुवचनम् ‘कानि’ भवति
(क) और (ख) की तुलना कीजिए: दोनों वाक्यों में रेखांकित पद कर्ता है और दोनों बहुवचन हैं — फिर भी प्रश्नवाचक अलग हैं। कारण केवल लिङ्ग है : ‘स्वरः’ पुल्लिङ्ग है (→ के), ‘व्यञ्जनम्’ नपुंसकलिङ्ग है (→ कानि)। यही इस अभ्यास की असली परीक्षा है — विभक्ति और वचन देख लेना काफ़ी नहीं, लिङ्ग भी देखना पड़ता है।
वाक्य का अर्थ भी समझिए: ‘अर्धमात्रिकाणि’ = आधी मात्रा वाले। पृष्ठ १५२ की सारणी कहती है — व्यञ्जनम् ‘अर्धमात्रः नित्यम्’; स्वर तो ‘एकमात्रः / द्विमात्रः / त्रिमात्रः वा’ हो सकता है। इसीलिए व्यञ्जन को अकेला बोलने के लिए आधार-स्वर चाहिए।
प्र3.
स्वराणां द्वौ भेदौ भवतः। (रेखाङ्कितम् — द्वौ)
उत्तर

प्रश्नः — स्वराणां कति भेदाः भवन्ति ?

(हिन्दी — स्वरों के कितने भेद होते हैं ? — उत्तर : दो — समानाक्षर तथा सन्ध्यक्षर।)

रेखाङ्कितं पदम्पदस्य प्रकारःप्रश्नवाचकं पदम्कारणम्
द्वौसंख्यावाचकं विशेषणम् (पुल्लिङ्ग-प्रथमा-द्विवचनम्)कतिसंख्या पूछने के लिए सदा अव्यय ‘कति’ आता है
संख्यावाची पद का प्रश्नवाचक सदा ‘कति’: ‘द्वौ’ संख्या बता रहा है, इसलिए उसकी जगह कति आएगा। ‘कति’ अव्यय है — उसका रूप लिङ्ग-वचन से नहीं बदलता। परन्तु ‘कति’ के साथ क्रिया बहुवचन में आती है, इसलिए ‘भवतः’ (द्विवचन) को बदलकर ‘भवन्ति’ (बहुवचन) करना पड़ता है, और ‘भेदौ’ को ‘भेदाः’। यही इस उपभाग की बारीकी है।
दूसरा स्वीकार्य रूप: यदि वाक्य का ढाँचा ज्यों का त्यों रखना हो तो ‘स्वराणां कति भेदौ भवतः ?’ भी लिखा जाता है, पर प्रचलित तथा अधिक शुद्ध रूप ‘कति भेदाः भवन्ति ?’ ही है — क्योंकि ‘कति’ पूछते समय उत्तर की संख्या अज्ञात होती है, इसलिए बहुवचन ही उचित है। यही रूप ५ (ङ) में भी लगेगा।
प्र4.
ह्रस्वस्य उपभेदाः न भवन्ति। (रेखाङ्कितम् — ह्रस्वस्य)
उत्तर

प्रश्नः — कस्य उपभेदाः न भवन्ति ?

(हिन्दी — किसके उपभेद नहीं होते ? — उत्तर : ह्रस्व के।)

रेखाङ्कितं पदम्लिङ्गम् · विभक्तिः · वचनम्प्रश्नवाचकं पदम्कारणम्
ह्रस्वस्यपुल्लिङ्गम् · षष्ठी · एकवचनम्कस्य‘किम्’ शब्दस्य पुल्लिङ्ग-षष्ठी-एकवचनम् ‘कस्य’ भवति
विभक्ति नहीं बदलती: रेखांकित पद षष्ठी में है (सम्बन्धे षष्ठी — ‘ह्रस्व के’ उपभेद), इसलिए प्रश्नवाचक भी षष्ठी में ही आएगा — ‘कस्य’। ‘कः’ (प्रथमा) लिख देना सबसे आम भूल है। नियम एक ही है : जो विभक्ति रेखांकित पद की, वही प्रश्नवाचक की
वाक्य का अर्थ: ‘ह्रस्व’ स्वयं एक उपभेद है (ह्रस्व-दीर्घ-प्लुत में पहला), इसलिए उसके भीतर और उपभेद नहीं होते। पृष्ठ १५२ की सारणी में यही तथ्य दूसरी दिशा से कहा गया है — सन्ध्यक्षर स्वर में ‘ह्रस्वः उपभेदः न भवति’।
प्र5.
व्यञ्जनानां चत्वारो भेदाः भवन्ति। (रेखाङ्कितम् — चत्वारो)
उत्तर

प्रश्नः — व्यञ्जनानां कति भेदाः भवन्ति ?

(हिन्दी — व्यञ्जनों के कितने भेद होते हैं ? — उत्तर : चार — स्पर्श, अन्तःस्थ, ऊष्म तथा अयोगवाह।)

रेखाङ्कितं पदम्पदस्य प्रकारःप्रश्नवाचकं पदम्कारणम्
चत्वारः (चत्वारो)संख्यावाचकं विशेषणम् (पुल्लिङ्ग-प्रथमा-बहुवचनम्)कतिसंख्या पूछने के लिए अव्यय ‘कति’
यहाँ क्रिया बदलनी नहीं पड़ती: (ग) में ‘भवतः’ को ‘भवन्ति’ करना पड़ा था, क्योंकि वहाँ द्विवचन था। यहाँ वाक्य पहले से ही बहुवचन में है (‘भेदाः भवन्ति’), इसलिए केवल ‘चत्वारो’ की जगह ‘कति’ रख देना पर्याप्त है — शेष वाक्य ज्यों का त्यों।
‘चत्वारो’ क्यों छपा है: मूल रूप ‘चत्वारः’ है। आगे ‘भ’ (मृदु व्यञ्जन) आने से विसर्ग का ‘उ’ होकर ‘ओ’ बन गया — विसर्ग-सन्धि (उत्व) — अतः ‘चत्वारो भेदाः’। यही नियम ‘रामः + भवति = रामो भवति’ में है।
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