उत्तरम् — न। (नहीं।)
शुद्धं वाक्यम् — ‘य, र, ल, व’ वर्णाः अन्तःस्थाः (अर्ध-स्वराः) सन्ति, न तु ऊष्माणः। ऊष्माणः तु ‘श, ष, स, ह’ इति चत्वारः वर्णाः सन्ति।
निर्णायक अन्तर — स्पर्श होता है या नहीं: अन्तःस्थ वर्णों में करण स्थान को छूता तो है, भले थोड़ा; ऊष्म वर्णों में करण स्थान को छूता ही नहीं, केवल पास जाता है और बीच में ‘लघुः विवरः’ रह जाता है। इसी छोटे-से छेद से वायु रगड़ खाकर निकलती है और सरसराहट (ऊष्मा) पैदा होती है — यही ‘ऊष्माणः’ नाम का कारण है।
दोनों की संख्या चार-चार: संख्या समान होने से भ्रम बढ़ जाता है। याद रखने का सूत्र — ‘य र ल व’ अन्तःस्थ (स्वर के नज़दीक), ‘श ष स ह’ ऊष्म (हवा के नज़दीक)। कान से भी जाँच लीजिए — श, ष, स, ह में साफ़ ‘सरसराहट’ सुनाई देती है, य, र, ल, व में नहीं।