शारदा अध्याय 11 अभ्यासाद् जायते सिद्धिः

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
‘ई’ वर्णः सन्ध्यक्षरम् अस्ति। (आम् / न)
उत्तर

उत्तरम् — न। (नहीं।)

शुद्धं वाक्यम् — ‘ई’ वर्णः समानाक्षरम् अस्ति, न तु सन्ध्यक्षरम्। (‘ई’ समानाक्षर स्वर है, सन्ध्यक्षर नहीं।)

बिन्दुः‘ई’ के विषय में
भेदःसमानाक्षर-स्वरः
स्थानम् · करणम्तालु · जिह्वा-मध्यः — अतः एक-स्थानी
उपभेदाःइ (ह्रस्वः), ई (दीर्घः), इ३ (प्लुतः) — त्रयः
आभ्यन्तर-प्रयत्नःविवृत-प्रयत्नः
कसौटी — स्थान गिनिए: सन्ध्यक्षर वे हैं जो दो स्वरों की सन्धि से बने हों और जिनके दो स्थान हों — केवल ए, ऐ, ओ, औ। ‘ई’ का स्थान एक ही है (तालु), और उसका अपना ह्रस्व रूप ‘इ’ भी है — जिसका ह्रस्व रूप हो, वह सन्ध्यक्षर हो ही नहीं सकता (पृष्ठ १५२ : ‘सन्ध्यक्षर-स्वरे ह्रस्वः उपभेदः न भवति’)। दोनों कसौटियों पर ‘ई’ समानाक्षर ही सिद्ध होता है।
प्र2.
‘ऐ’ वर्णः सन्ध्यक्षरम् अस्ति। (आम् / न)
उत्तर

उत्तरम् — आम्। (हाँ।)

पूर्णवाक्येन — ‘ऐ’ वर्णः सन्ध्यक्षरम् अस्ति; सः द्वि-स्थानी (कण्ठतालव्यः) अस्ति, तस्य ह्रस्वः उपभेदः न भवति, दीर्घ-प्लुतौ — द्वौ एव उपभेदौ भवतः।

बिन्दुः‘ऐ’ के विषय में
भेदःसन्ध्यक्षर-स्वरः
स्थानम् · करणम्कण्ठः + तालु — अतः द्वि-स्थानी (कण्ठतालव्यः)
उपभेदाःऐ (दीर्घः), ऐ३ (प्लुतः) — द्वौ; ह्रस्वः नास्ति
आभ्यन्तर-प्रयत्नःविवृत-प्रयत्नः
सन्धि-रूपेणअ / आ + ए / ऐ = ऐ (वृद्धि-सन्धिः) — यथा : तव + ऐक्यम् = तवैक्यम्
नाम ही प्रमाण है:सन्ध्यक्षर’ = सन्धि से बना अक्षर। ‘ऐ’ दो स्वरों के मेल से बना है, इसलिए उसमें दोनों स्थान बचे रहते हैं — कण्ठ भी और तालु भी। पृष्ठ १५४ की सारणी में इसीलिए ‘ऐ ऐ३’ कण्ठ्य पंक्ति में भी है और तालव्य पंक्ति में भी।
प्र3.
‘झ’ वर्णः सपर्शः अस्ति। (आम् / न)
उत्तर

उत्तरम् — आम्। (हाँ — ‘झ’ स्पर्श-व्यञ्जन है।)

पूर्णवाक्येन — ‘झ’ वर्णः स्पर्शः (स्पर्श-व्यञ्जनम्) अस्ति; सः च-वर्गस्य चतुर्थः वर्णः, तालव्यः, तस्य आभ्यन्तर-प्रयत्नः स्पृष्ट-प्रयत्नः अस्ति।

बिन्दुः‘झ’ के विषय में
भेदःस्पर्श-व्यञ्जनम् (वर्गीयम्) — च-वर्गस्य चतुर्थः
स्थानम् · करणम्तालु · जिह्वा-मध्यः
आभ्यन्तर-प्रयत्नःस्पृष्ट-प्रयत्नः — करणं स्थानं स्पष्टरूपेण स्पृशति
उदाहरण-शब्दःङ्कारः, टिति
कसौटी: पाँचों वर्गों के पच्चीस वर्ण — क से म तक — सब ‘स्पर्शाः’ हैं, क्योंकि इनमें करण स्थान को पूरी तरह छू लेता है। ‘झ’ च-वर्ग में है, इसलिए वह स्पर्श ही है। सूत्र भी यही कहता है — ‘स्पृष्ट-करणाः – स्पर्शाः।’
पुस्तक की छपाई पर ध्यान: इस पंक्ति में पुस्तक में ‘सपर्शः’ छपा है, जबकि पूरे पाठ में और पृष्ठ १५२ की सारणी में शब्द ‘स्पर्शः’ ही है। यह स्पष्ट रूप से मुद्रण की भूल है — उत्तर लिखते समय शुद्ध रूप स्पर्शः ही लिखिए।
प्र4.
‘र’ वर्णः स्पर्शेषु परिगण्यते। (आम् / न)
उत्तर

उत्तरम् — न। (नहीं।)

शुद्धं वाक्यम् — ‘र’ वर्णः स्पर्शेषु न परिगण्यते; सः अन्तःस्थेषु परिगण्यते। तस्य आभ्यन्तर-प्रयत्नः ईषत्-स्पृष्ट-प्रयत्नः अस्ति। (‘र’ स्पर्श वर्णों में नहीं, अन्तःस्थ वर्णों में गिना जाता है।)

बिन्दुः‘र’ के विषय में
भेदःअन्तःस्थ-व्यञ्जनम् (अर्ध-स्वरः) — य र ल व मध्ये द्वितीयः
स्थानम् · करणम्मूर्धा · जिह्वा-उपाग्रः
आभ्यन्तर-प्रयत्नःईषत्-स्पृष्ट-प्रयत्नः — करणं स्थानं स्वल्पम् एव स्पृशति
तत्सदृशः स्वरःऋ (मूर्धन्यः) — अतः यण् सन्धि में ऋ का र् होता है
भ्रम कहाँ होता है: ‘र’ बोलते समय जीभ मूर्धा को छूती तो है, इसलिए लगता है कि यह स्पर्श वर्ण होगा। पर स्पर्श में स्पर्श पूरा होता है और वायु का मार्ग क्षण भर बन्द हो जाता है; ‘र’ में स्पर्श बहुत हल्का है और वायु बहती रहती है। इसीलिए वह अन्तःस्थ है, स्पर्श नहीं। परीक्षा यह है — ‘ट’ को खींचकर नहीं बोल सकते, ‘र’ को खींचकर बोल सकते हैं।
प्र5.
‘य, र, ल, व’ वर्णाः ऊष्माणः सन्ति। (आम् / न)
उत्तर

उत्तरम् — न। (नहीं।)

शुद्धं वाक्यम् — ‘य, र, ल, व’ वर्णाः अन्तःस्थाः (अर्ध-स्वराः) सन्ति, न तु ऊष्माणः। ऊष्माणः तु ‘श, ष, स, ह’ इति चत्वारः वर्णाः सन्ति।

भेदःवर्णाःआभ्यन्तर-प्रयत्नःकरणस्य क्रिया
अन्तःस्थाः (अर्ध-स्वराः)य · र · ल · वईषत्-स्पृष्ट-प्रयत्नःस्थानं स्वल्पं स्पृशति
ऊष्माणःश · ष · स · हईषद्-विवृत-प्रयत्नःस्थानं न स्पृशति, बहु समीपं याति
निर्णायक अन्तर — स्पर्श होता है या नहीं: अन्तःस्थ वर्णों में करण स्थान को छूता तो है, भले थोड़ा; ऊष्म वर्णों में करण स्थान को छूता ही नहीं, केवल पास जाता है और बीच में ‘लघुः विवरः’ रह जाता है। इसी छोटे-से छेद से वायु रगड़ खाकर निकलती है और सरसराहट (ऊष्मा) पैदा होती है — यही ‘ऊष्माणः’ नाम का कारण है।
दोनों की संख्या चार-चार: संख्या समान होने से भ्रम बढ़ जाता है। याद रखने का सूत्र — ‘य र ल व’ अन्तःस्थ (स्वर के नज़दीक), ‘श ष स ह’ ऊष्म (हवा के नज़दीक)। कान से भी जाँच लीजिए — श, ष, स, ह में साफ़ ‘सरसराहट’ सुनाई देती है, य, र, ल, व में नहीं।
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