शारदा अध्याय 4 स्वाध्यायान्मा प्रमदः

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
सुभाषचन्द्रः वदति ……………… भवन्तः मह्यं रुधिरं यच्छन्तु अहं भवद्भ्यः स्वातन्त्र्यं प्रयच्छामि ……………… ।
उत्तर

सुभाषचन्द्रः वदति यत् भवन्तः मह्यं रुधिरं यच्छन्तु अहं भवद्भ्यः स्वातन्त्र्यं प्रयच्छामि इति (हिन्दी — सुभाषचन्द्र कहते हैं कि ‘आप मुझे रक्त दीजिए, मैं आपको स्वतन्त्रता दूँगा’।)

‘यत्…इति’ क्यों: यह युगल कथन को उद्धृत करने के लिए आता है — ठीक वैसे ही जैसे हिन्दी में ‘…कहा कि … ऐसा’। ‘यत्’ कथन का आरम्भ बताता है और ‘इति’ उसका अन्त। जहाँ ‘वदति / उक्तवान् / अवदत् / कथयति’ जैसी कहने की क्रिया हो, वहीं यही जोड़ी लगेगी। पुस्तक का उदाहरण भी यही है — “स्वामी विवेकानन्दः उक्तवान् यत् सामर्थ्यमेव जीवनं दुर्बलता मृत्युः इति।”
ऐतिहासिक सन्दर्भ: यह नेताजी सुभाषचन्द्र बोस का प्रसिद्ध उद्घोष है — “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा।” ‘मह्यम्’ (चतुर्थी — मुझे) तथा ‘भवद्भ्यः’ (चतुर्थी बहुवचन — आप लोगों को) दोनों «सम्प्रदाने चतुर्थी» के उदाहरण हैं।
प्र2.
……………… अर्जुनः भीष्मद्रोणादीन् अपश्यत् ……………… शोकं प्राप्नोत्।
उत्तर

यदा अर्जुनः भीष्मद्रोणादीन् अपश्यत् तदा शोकं प्राप्नोत्। (हिन्दी — जब अर्जुन ने भीष्म-द्रोण आदि को देखा, तब वह शोक को प्राप्त हुआ।)

‘यदा…तदा’ क्यों: दोनों वाक्यांश एक ही समय की दो घटनाएँ बताते हैं — देखना और शोक होना। जहाँ ‘जब … तब’ का सम्बन्ध हो, वहाँ ‘यदा…तदा’ आता है। दोनों क्रियाएँ यहाँ भूतकाल (लङ्) में हैं — अपश्यत्, प्राप्नोत् — जो इस कालसम्बन्ध को और स्पष्ट करता है।
सन्दर्भ: यह श्रीमद्भगवद्गीता के आरम्भ (विषादयोग) का प्रसङ्ग है — कुरुक्षेत्र में अपने ही गुरुजनों को शत्रुपक्ष में देखकर अर्जुन शोकग्रस्त हो गया। ‘भीष्मद्रोणादीन्’ = भीष्मः द्रोणः आदिः येषां ते, तान् — बहुव्रीहि, द्वितीया बहुवचन।
प्र3.
श्रीरामः भरतम् उक्तवान् ……………… जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी ……………… ।
उत्तर

श्रीरामः भरतम् उक्तवान् यत् जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी इति (हिन्दी — श्रीराम ने भरत से कहा कि ‘माता और जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर हैं’।)

‘यत्…इति’ क्यों: यहाँ भी ‘उक्तवान्’ (कहा) कथन-क्रिया है, अतः उद्धरण को ‘यत्’ से आरम्भ और ‘इति’ से समाप्त करना होगा। स्मरण रखिए — संस्कृत में उद्धरण-चिह्न का काम प्रायः ‘इति’ ही करता है।
पूरा श्लोकांश: “अपि स्वर्णमयी लङ्का न मे लक्ष्मण रोचते। जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी॥” — ‘गरीयसी’ ‘गुरु’ शब्द का तरतमभाव (comparative) रूप है, स्त्रीलिङ्ग में; और ‘स्वर्गात्’ में पञ्चमी है, क्योंकि «तुलनार्थे पञ्चमी» — तुलना जिससे की जाए, उसमें पञ्चमी आती है।
प्र4.
……………… भरतः अयोध्यां प्राप्तवान् ……………… श्रीरामः तत्र नासीत्।
उत्तर

यदा भरतः अयोध्यां प्राप्तवान् तदा श्रीरामः तत्र नासीत्। (हिन्दी — जब भरत अयोध्या पहुँचे, तब श्रीराम वहाँ नहीं थे।)

‘यदा…तदा’ क्यों: वाक्य में समय का सम्बन्ध है — भरत के लौटने का समय और राम के न होने का समय एक ही है। ननिहाल से लौटने पर भरत ने पाया कि राम वनवास जा चुके हैं।
अन्य सम्भव उत्तर:यद्यपि भरतः अयोध्यां प्राप्तवान् तथापि श्रीरामः तत्र नासीत्’ भी व्याकरण की दृष्टि से शुद्ध है (‘यद्यपि भरत अयोध्या पहुँचे, फिर भी राम वहाँ नहीं थे’)। किन्तु अभ्यास में ‘यद्यपि…तथापि’ का प्रयोग (ङ), (छ), (झ), (ट) में स्पष्ट रूप से माँगा गया है, अतः यहाँ ‘यदा…तदा’ ही अधिक उपयुक्त है।
प्र5.
……………… खुदीरामाय मृत्युदण्डः उद्घोषितः ……………… सः प्रसन्नवदनः आसीत्।
उत्तर

यद्यपि खुदीरामाय मृत्युदण्डः उद्घोषितः तथापि सः प्रसन्नवदनः आसीत्। (हिन्दी — यद्यपि खुदीराम को मृत्युदण्ड सुनाया गया, तथापि वे प्रसन्नमुख थे।)

‘यद्यपि…तथापि’ क्यों: दोनों वाक्यांशों में विरोध है — मृत्युदण्ड सुनकर मनुष्य को दुखी होना चाहिए, पर वे प्रसन्न थे। जहाँ ‘होने पर भी / फिर भी’ का भाव हो, वहीं यह जोड़ी आती है। पुस्तक का उदाहरण भी विरोध ही दिखाता है — “यद्यपि मेघाः सन्ति तथापि वृष्टिः न भवति।”
पाठ से मेल: यही बात पाठ में इन शब्दों में है — “राष्ट्रभक्तस्य खुदीरामस्य मुखे भयं दुःखं वा नासीत् प्रत्युत प्रसन्नता, शान्तिः, तृप्तिः, तेजः च आसीत्।” ‘प्रसन्नवदनः’ = प्रसन्नं वदनं यस्य सः — बहुव्रीहि समास
प्र6.
……………… वृष्टिः भवति ……………… कृषकाः सन्तुष्टाः भवन्ति।
उत्तर

यदा वृष्टिः भवति तदा कृषकाः सन्तुष्टाः भवन्ति। (हिन्दी — जब वर्षा होती है, तब किसान सन्तुष्ट होते हैं।)

‘यदा…तदा’ क्यों: यह कारण-सहित कालसम्बन्ध का सामान्य कथन है — वर्षा का समय ही किसान की प्रसन्नता का समय है। दोनों क्रियाएँ लट्-लकार (वर्तमान) में हैं, जो ऐसे सार्वकालिक (सदा सत्य) कथनों में आती हैं।
‘यावत्…तावत्’ भी सोचिए: ‘यावत् वृष्टिः भवति तावत् कृषकाः सन्तुष्टाः भवन्ति’ का अर्थ होगा ‘जब तक वर्षा होती रहती है, तब तक किसान सन्तुष्ट रहते हैं’ — अर्थ की दृष्टि से यह अवधि बताता है, जबकि प्रश्न में सामान्य नियम कहा गया है। इसलिए ‘यदा…तदा’ ही श्रेष्ठ है।
प्र7.
……………… खुदीरामः बालः ……………… सः देशकार्यं कृतवान्।
उत्तर

यद्यपि खुदीरामः बालः तथापि सः देशकार्यं कृतवान्। (हिन्दी — यद्यपि खुदीराम बालक थे, तथापि उन्होंने देश का कार्य किया।)

‘यद्यपि…तथापि’ क्यों: ‘बालक होना’ और ‘देश का बड़ा कार्य करना’ — साधारण दृष्टि से ये दोनों परस्पर विरोधी हैं, इसीलिए विरोध-सूचक जोड़ी चाहिए। यही वाक्य पूरे पाठ का सार भी है — न खलु वयस्तेजसो हेतुः। इस एक वाक्य से शीर्षक सिद्ध हो जाता है।
व्याकरण: ‘खुदीरामः बालः’ में क्रिया ‘आसीत्’ अध्याहृत है (छिपी हुई) — संस्कृत में ‘अस्’ धातु का लोप सामान्य है। पूर्ण रूप — ‘यद्यपि खुदीरामः बालः आसीत् तथापि सः देशकार्यं कृतवान्।’
प्र8.
……………… कार्यं करोति ……………… फलं प्राप्नोति।
उत्तर

यावत् कार्यं करोति तावत् फलं प्राप्नोति। (हिन्दी — जितना कार्य करता है, उतना ही फल पाता है।)

‘यावत्…तावत्’ क्यों: यह युगल परिमाण अथवा अवधि की तुलना बताता है — ‘जितना…उतना’, ‘जब तक…तब तक’। यहाँ परिश्रम और फल का अनुपात कहा गया है, इसलिए यही जोड़ी उपयुक्त है। पुस्तक का उदाहरण अवधि दिखाता है — “यावत् भूतले गिरयः भवन्ति तावत् रामायणकथा प्रचलिष्यति।”
भाव: यह लोकप्रसिद्ध सूक्ति का ही रूप है — ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते’ की भावना; जितना श्रम, उतना प्रतिफल। ऐसे वाक्यों में लट्-लकार सार्वकालिक सत्य बताने के लिए आता है।
प्र9.
प्रफुल्ल-खुदीरामाभ्यां ……………… विस्फोटकं प्रक्षिप्तम् ……………… किङ्ग्ज़फोर्डः न मृतः।
उत्तर

प्रफुल्ल-खुदीरामाभ्यां यद्यपि विस्फोटकं प्रक्षिप्तम् तथापि किङ्ग्ज़फोर्डः न मृतः। (हिन्दी — यद्यपि प्रफुल्ल और खुदीराम ने विस्फोटक फेंका, तथापि किङ्ग्ज़फोर्ड नहीं मरा।)

‘यद्यपि…तथापि’ क्यों: अपेक्षा यह थी कि विस्फोट से किङ्ग्ज़फोर्ड मारा जाएगा, किन्तु परिणाम उलटा निकला — यह ठीक विरोध है। पाठ ने भी इसी विरोध को ‘यद्यपि…तथापि’ से कहा है — “यद्यपि सः किङ्ग्ज़फोर्ड् महोदयस्य रथः आसीत् तथापि तस्मिन् सः नासीदेव।”
व्याकरण: ‘प्रफुल्ल-खुदीरामाभ्याम्’ तृतीया द्विवचन है — क्योंकि वाक्य कर्मवाच्य में है (‘विस्फोटकं प्रक्षिप्तम्’), और कर्मवाच्य में कर्ता तृतीया में आता है। दो व्यक्ति होने से द्विवचन।
प्र10.
……………… अध्ययनं सुदृढं भवति ……………… ज्ञानं विकसितं भवति।
उत्तर

यदा अध्ययनं सुदृढं भवति तदा ज्ञानं विकसितं भवति। (हिन्दी — जब अध्ययन सुदृढ़ होता है, तब ज्ञान विकसित होता है।)

‘यदा…तदा’ क्यों: यहाँ एक स्थिति दूसरी स्थिति को जन्म देती है — पहले अध्ययन पक्का, फिर ज्ञान का विकास। ‘जब…तब’ का यह क्रम-सम्बन्ध ‘यदा…तदा’ से ही व्यक्त होता है, विरोध नहीं है इसलिए ‘यद्यपि…तथापि’ यहाँ नहीं चलेगा।
अन्य ठीक विकल्प:यावत् अध्ययनं सुदृढं भवति तावत् ज्ञानं विकसितं भवति’ — ‘जितना अध्ययन दृढ़ होगा, उतना ज्ञान बढ़ेगा’ — यह भी अर्थपूर्ण है। दोनों में से कोई भी लिख सकते हैं, पर कारण अवश्य बताइए।
प्र11.
……………… खुदीरामः आङ्ग्लानां हस्तगतः ……………… सः ततः बहिरागतः।
उत्तर

यद्यपि खुदीरामः आङ्ग्लानां हस्तगतः तथापि सः ततः बहिरागतः। (हिन्दी — यद्यपि खुदीराम अंग्रेज़ों के हाथ लग गए, तथापि वे वहाँ से बाहर निकल आए।)

‘यद्यपि…तथापि’ क्यों: पकड़े जाने के बाद छूट निकलना अपेक्षा के विरुद्ध है — यही विरोध इस जोड़ी की माँग करता है। पाठ का मूल वाक्य — “कदाचित् खुदीरामः पत्रकवितरणसमये आङ्ग्लानां हस्तगतः जातः। किन्तु सामर्थ्यसम्पन्नः खुदीरामः आङ्ग्लानां ताडनं कृत्वा ततः निरगच्छत्।” — यहाँ ‘किन्तु’ वही काम कर रहा है जो ‘तथापि’ करता है।
शब्द-विश्लेषण: ‘हस्तगतः’ = हस्तं गतः (द्वितीया तत्पुरुष) — हाथ में गया हुआ, पकड़ा गया। ‘बहिरागतः’ = बहिः + आगतः (विसर्ग-सन्धि: ‘बहिः’ के विसर्ग का ‘र्’ हुआ, क्योंकि आगे स्वर है)।
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