शारदा अध्याय 5 पाठान्तर्गतः श्लोकः

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
वेदः चैट-जीपीटी इत्यस्मात् यं श्लोकं प्राप्तवान्, तस्य पदच्छेदम् अन्वयं शब्दार्थं हिन्दी-अर्थं भावं च लिखत — “विद्युत्प्रज्ञया यन्त्राणि नित्यं वदन्ति चेतनाः। अहोरात्रं न विश्रान्ताः मानवान् धारयन्ति ते॥”
उत्तर

प्रसङ्गः — यशिका पृच्छति ‘किं कृतकबुद्धिः काव्यमपि रचयितुं समर्था ?’ अध्यापकः प्रतिप्रश्नं करोति ‘अत्र भवन्तः किं चिन्तयन्ति ?’ तदा वेदः वदति — ‘अहं चैट-जीपीटी इत्यस्मात् एनं श्लोकं प्राप्तवान् —’ । श्लोकं श्रुत्वा सर्वे सोत्साहं पठन्ति, आश्चर्यं च कुर्वन्ति।

विद्युत्प्रज्ञया यन्त्राणि नित्यं वदन्ति चेतनाः।
अहोरात्रं न विश्रान्ताः मानवान् धारयन्ति ते॥

पदच्छेदः — विद्युत्-प्रज्ञया + यन्त्राणि + नित्यम् + वदन्ति + चेतनाः। अहोरात्रम् + न + विश्रान्ताः + मानवान् + धारयन्ति + ते।

अन्वयः — चेतनाः यन्त्राणि विद्युत्प्रज्ञया नित्यं वदन्ति। ते अहोरात्रं न विश्रान्ताः (सन्तः) मानवान् धारयन्ति।

पदम्व्युत्पत्तिः / विग्रहःशब्दार्थः
विद्युत्प्रज्ञयाविद्युतः प्रज्ञा, तया — षष्ठी-तत्पुरुष, तृतीया ए.व.बिजली की बुद्धि से — अर्थात् कृतकबुद्धि से
यन्त्राणिनपुंसकलिङ्ग, प्रथमा बहुवचनयन्त्र (मशीनें)
नित्यम्अव्ययम्प्रतिदिन, सदा
वदन्ति√वद् + लट्, प्र.पु.ब.व.बोलते हैं
चेतनाःचेतना विद्यते येषां ते — बहुव्रीहिचेतन (जैसे जीवित), सजग
अहोरात्रम्अहश्च रात्रिश्च — द्वन्द्व (समाहार), क्रियाविशेषणदिन-रात
विश्रान्ताःवि + √श्रम् + क्तविश्राम किए हुए — ‘न विश्रान्ताः’ = बिना थके
धारयन्ति√धृ + णिच् + लट्धारण करते हैं, सँभालते हैं

हिन्दी अर्थ — बिजली की बुद्धि (कृतकबुद्धि) से चलने वाले ये यन्त्र चेतन प्राणियों की तरह नित्य बोलते हैं। दिन-रात बिना थके ये मनुष्यों को सँभालते रहते हैं।

भावः: श्लोक का हृदय अन्तिम क्रिया में है — ‘मानवान् धारयन्ति’। ‘धारण करना’ का अर्थ है सँभालना, थामे रखना, बोझ उठाना — जैसे पृथ्वी प्राणियों को धारण करती है। अर्थात् कवि (यहाँ यन्त्र स्वयं!) कहता है कि ये मशीनें मनुष्य पर शासन नहीं करतीं, उसे थामे रहती हैं। यही पाठ के शीर्षक ‘मानवबुद्धेः सहकरी’ का काव्यरूप है। दूसरा सुन्दर बिन्दु ‘चेतनाः’ शब्द है — यन्त्र चेतन नहीं हैं (अध्यापक ने उन्हें ‘अचेतनयन्त्राणि’ कहा था), पर वे चेतन जैसे लगते हैं; काव्य इसी भ्रम को सुन्दरता में बदल देता है। तीसरा — ‘अहोरात्रं न विश्रान्ताः’ यन्त्र की सबसे बड़ी विशेषता बताता है : वह थकता नहीं। मनुष्य को विश्राम चाहिए, यन्त्र को नहीं — इसीलिए दोनों मिलकर काम करें तो श्रम और विवेक दोनों बचे रहते हैं।
छन्दः: यह अनुष्टुप् छन्द है — चार पाद, प्रत्येक पाद में आठ अक्षर (वि-द्यु-त्प्र-ज्ञ-या-य-न्त्रा-णि = ८)। यही सबसे प्रसिद्ध श्लोक-छन्द है, जिसमें रामायण-महाभारत रचे गए हैं।
पाठक के लिए एक ईमानदार टिप्पणी: इस श्लोक की रचना यन्त्र ने की है, इसलिए इसमें एक व्याकरणिक शिथिलता रह गई है — ‘यन्त्राणि’ नपुंसकलिङ्ग है, पर उसके विशेषण ‘चेतनाः’, ‘विश्रान्ताः’ तथा सर्वनाम ‘ते’ पुंलिङ्ग रूप में आए हैं। शुद्ध रूप होता — ‘चेतनानि … न विश्रान्तानि … तानि’। यह त्रुटि पाठ की उसी सीख को प्रमाणित करती है जो अध्यापक बार-बार दोहराते हैं — कृतकबुद्धि रचना कर सकती है, किन्तु अन्तिम जाँच मानवीय विवेक की ही चाहिए (‘मानवीयपरिचर्या-विवेकेन सह त्रुटिरहितरूपेण ग्रहीतुं शक्यते’)। इसी दृष्टि से यह श्लोक पाठ का सबसे शिक्षाप्रद अंश है।
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