शारदा अध्याय 5 संवादः (भागः २)

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
‘डेटासेट्’ किम् अस्ति ? आर्यस्य प्रश्नस्य अध्यापकः किम् उत्तरम् अयच्छत् ?
उत्तर

उत्तरम् — आर्यः विनोदेन पृच्छति — ‘यन्त्राणामपि पाठशाला अस्ति वा ?’ (सर्वे हसन्ति)। अध्यापकः उत्तरं ददाति — ‘अस्याः यन्त्रपाठशालायाः नाम “डेटासेट्” इति ! कृतकबुद्धिः यन्त्रं दत्तांशमाध्यमेन शिक्षणं करोति।

(हिन्दी — आर्य पूछता है — ‘क्या यन्त्रों की भी पाठशाला होती है?’ सब हँस पड़ते हैं। अध्यापक कहते हैं — ‘इस यन्त्र-पाठशाला का नाम ‘डेटासेट्’ है! कृतकबुद्धि यन्त्र को दत्तांश (डेटा) के माध्यम से शिक्षा देती है।’)

डेटासेट् = यन्त्रपाठशाला
दत्तांशः (Data) = दत्तः अंशः — वह ‘दिया हुआ अंश’ जिससे यन्त्र सीखता है
यन्त्रपाठशालायाः = यन्त्रस्य पाठशाला — षष्ठी-तत्पुरुष, षष्ठी एकवचन
यह उपमा इतनी अच्छी क्यों है: ‘डेटासेट्’ को ‘यन्त्रपाठशाला’ कहना पूरे विषय का सबसे सरल और सबसे सही चित्र है। बालक पाठशाला में जो पढ़ता है, वैसा ही बनता है; यन्त्र डेटासेट् में जो देखता है, वैसा ही सीखता है। और इसी उपमा से अगला प्रश्न अपने आप निकल आता है — यदि पाठशाला ही ग़लत पढ़ाए तो ? यही यशिका पूछती है।
ध्यान दें: ‘यन्त्राणामपि’ = यन्त्राणाम् + अपि। ‘अस्याः’ इदम् शब्द का स्त्रीलिङ्ग षष्ठी एकवचन है (पाठशाला स्त्रीलिङ्ग है)। ‘दत्तांशमाध्यमेन’ में तृतीया करण के अर्थ में है — ‘डेटा के द्वारा’ (‘करणे तृतीया’)।
प्र2.
यदि अशुद्धदत्तांशः दीयते तर्हि का समस्या भवति ? ‘पूर्वग्रहः’ इति कः दोषः ?
उत्तर

उत्तरम् — यशिका पृच्छति — ‘किन्तु आचार्य ! यदि अशुद्धदत्तांशः दीयते तर्हि कृतकबुद्धिः अपि त्रुटिं करोति ?’ अध्यापकः वदति — ‘आम्। यदा प्रशिक्षणदत्तांशः पक्षपातयुक्तः भवति, तदा निष्कर्षाः अपि पक्षपातयुक्ताः भवन्ति। एषः दोषः ‘पूर्वग्रहः’ इति कथ्यते। कृतकबुद्धिः अद्यापि विकासपदे अस्ति। सेदानीं मानवीयपरिचर्या-विवेकेन सह त्रुटिरहितरूपेण ग्रहीतुं शक्यते।’

(हिन्दी — यशिका पूछती है — ‘किन्तु आचार्य! यदि अशुद्ध डेटा दिया जाए तो क्या कृतकबुद्धि भी त्रुटि करती है?’ अध्यापक कहते हैं — ‘हाँ। जब प्रशिक्षण का डेटा पक्षपात से भरा होता है, तब निष्कर्ष भी पक्षपातपूर्ण हो जाते हैं। इस दोष को ‘पूर्वग्रह’ (Bias) कहा जाता है। कृतकबुद्धि अभी विकास की अवस्था में है। इसीलिए अब मानवीय देखभाल तथा विवेक के साथ ही इसे त्रुटिरहित रूप में ग्रहण किया जा सकता है।’)

चरणम्यत् भवतिहिन्दी में
प्रशिक्षणदत्तांशः पक्षपातयुक्तः भवतिजिस डेटा पर यन्त्र सिखाया गया, वही एकपक्षीय था
यन्त्रं तम् एव दत्तांशं शिक्षतेयन्त्र वही सीखता है जो उसे दिखाया गया
निष्कर्षाः अपि पक्षपातयुक्ताः भवन्तिइसलिए उसके निष्कर्ष भी पक्षपाती निकलते हैं
एषः दोषः ‘पूर्वग्रहः’ इति कथ्यतेइसी दोष का नाम है पूर्वग्रह / पूर्वाग्रह (Bias)
पूर्वाग्रह क्या है, एक उदाहरण से: मान लीजिए किसी यन्त्र को केवल शहरी विद्यालयों की उत्तरपुस्तिकाएँ दिखाकर ‘अच्छा उत्तर’ पहचानना सिखाया गया। अब वह ग्रामीण विद्यार्थी के सही उत्तर को भी कम अंक देगा — इसलिए नहीं कि उत्तर ग़लत है, बल्कि इसलिए कि उसने वैसा उत्तर कभी देखा ही नहीं। दोष यन्त्र का नहीं, उसकी ‘पाठशाला’ का है। इसीलिए अध्यापक कहते हैं — कृतकबुद्धि ‘अद्यापि विकासपदे अस्ति’, और उसे मानवीय विवेक के साथ ही लेना चाहिए। यही पाठ का केन्द्रीय सन्देश है।
शब्द-भेद (पुस्तक में दोनों रूप छपे हैं): पाठ (पृष्ठ ५४) तथा अभ्यास-प्रश्न २ (झ) में पूर्वग्रहः छपा है, जबकि शब्दार्थ-तालिका (पृष्ठ ५८) तथा प्रश्न ३ की मञ्जूषा (पृष्ठ ६२) में पूर्वाग्रहः। दोनों रूप शुद्ध हैं और अर्थ एक ही है — ‘पूर्व + ग्रह’ (पहले से पकड़ा हुआ मत) तथा ‘पूर्व + आग्रह’ (पहले से जमा हुआ आग्रह)। उत्तर में जो रूप प्रश्न में दिया हो, वही लिखिए।
ध्यान दें: ‘सेदानीं’ = स + इदानीम्? नहीं — यहाँ पुस्तक का पाठ ‘सेदानीम्’ है, जिसका आशय ‘सा इदानीम्’ (वह अब) है; अर्थ की दृष्टि से ‘अतः इदानीम्’ (अतः अब) पढ़ना सबसे सहज है। ‘ग्रहीतुं शक्यते’ — तुमुन्-प्रत्ययान्त + कर्मवाच्य क्रिया, ‘ग्रहण किया जा सकता है’।
प्र3.
कृतकबुद्धिः केषु स्थलेषु उपयुज्यते ? श्रेयायाः प्रश्नस्य अध्यापकस्य च उत्तरं लिखत।
उत्तर

उत्तरम् — श्रेया पृच्छति — ‘गुरुवर ! एषा बुद्धिः केषु स्थलेषु उपयुज्यते ?’ अध्यापकः वदति — ‘श्रेये ! तव प्रश्नः अतीव महत्त्वपूर्णः। शिक्षायां, चिकित्सायां, कृषि-क्षेत्रे, न्यायालये, सञ्चारे, वित्ते, कलासङ्गीतक्षेत्रे मनोरञ्जनादिषु क्षेत्रेषु च कृतकबुद्धिः भूरिशः उपयुज्यते।

(हिन्दी — श्रेया पूछती है — ‘गुरुवर! यह बुद्धि किन-किन स्थानों पर प्रयुक्त होती है?’ अध्यापक कहते हैं — ‘श्रेये! तुम्हारा प्रश्न अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। शिक्षा में, चिकित्सा में, कृषि-क्षेत्र में, न्यायालय में, सञ्चार में, वित्त में, कला-सङ्गीत तथा मनोरञ्जन आदि क्षेत्रों में कृतकबुद्धि बहुतायत से प्रयुक्त होती है।’)

क्षेत्रम् (सप्तमी विभक्तौ)हिन्दीपाठ में आगे दिया गया उदाहरण
शिक्षायाम्शिक्षा मेंदीक्षा, स्वयम्, पी.एम्.-ईविद्या, चैट्बोट्, भाषानुवादोपकरणानि
चिकित्सायाम्चिकित्सा मेंरोबोटिक्-सर्जरी, रोग-पूर्वज्ञानम्, रश्मिपरीक्षणविद्या, औषधशुश्रूषा
कृषि-क्षेत्रेखेती मेंड्रोन से बीज-वपन, कीटनिरीक्षण, भूमिक्षमता-परीक्षण
न्यायालयेन्यायालय में(पाठ में विस्तार नहीं; ‘यस्तु क्रियावान्’ खण्ड में विधिक्षेत्र माँगा गया है)
सञ्चारेसञ्चार मेंसंवादोपकरणानि — चैट-जीपीटी, गूगल-सहायकम्
वित्तेवित्त (धन-व्यवस्था) मेंशब्दार्थ-तालिका : वित्ते = अर्थव्यवस्थायाम् (In finance)
कलासङ्गीतक्षेत्रेकला तथा सङ्गीत के क्षेत्र मेंकाव्यरचना (वेदः द्वारा प्राप्त श्लोकः), दॅल्ल्-ई (चित्रोत्पादनम्)
मनोरञ्जनादिषु क्षेत्रेषुमनोरञ्जन आदि क्षेत्रों मेंयू-ट्यूब्, एलेक्सा का गीत गाना
व्याकरण का सूत्र यहीं पकड़िए: प्रश्न ‘केषु स्थलेषु’ सप्तमी बहुवचन में है, इसलिए पूरा उत्तर भी सप्तमी में ही आया — शिक्षायाम्, चिकित्सायाम्, क्षेत्रे, न्यायालये, सञ्चारे, वित्ते, क्षेत्रेषु। यही ‘अधिकरणे सप्तमी’ का नियम है, जिसे पुस्तक ‘अत्र इदम् अवधेयम्’ में अलग से समझाती है। संस्कृत में प्रश्न की विभक्ति ही उत्तर की विभक्ति तय कर देती है — इसे पकड़ लेने पर आधा अभ्यास अपने आप सध जाता है।
शब्द: ‘भूरिशः’ अव्यय है — ‘बहुत अधिक मात्रा में, बहुतायत से’ (भूरि + शस्)। ‘मनोरञ्जनादिषु’ = मनोरञ्जनम् आदिः येषां तेषु — बहुव्रीहि। ‘श्रेये !’ सम्बोधन एकवचन है (श्रेया → श्रेये)।
प्र4.
शिक्षायां कृतकबुद्धेः उपयोगः कथं भवति ? किं कृतकबुद्धिः शिक्षकस्य स्थानं ग्रहीतुं शक्नोति ?
उत्तर

उत्तरम् (उपयोगः) — अथर्वस्य प्रश्नस्य उत्तरे अध्यापकः वदति — ‘दीक्षा, स्वयम्, सर्वेषां कृते कृतकबुद्धिः, पी.एम्.-ईविद्या, संशयनिराकरणार्थं चैट्बोट्, भाषानुवादोपकरणानि च यत्र तत्र प्रयुज्यन्ते। एतानि कृतकबुद्ध्याधारितानि उपकरणानि सन्ति। एतेषां साहाय्येन छात्राः शिक्षकाणाम् अनुपस्थितौ अपि स्वयम् अध्येतुं शक्नुवन्ति।

उत्तरम् (शिक्षकस्य स्थानम्) — आकाशः शङ्कते — ‘हा धिक् ! एतेषां कारणेन मानवशिक्षकः किं प्रयोजनरहितः भविष्यति ?’ अध्यापकः स्पष्टं वदति — ‘न न ! कृतकबुद्धिः गुरुमित्रम् अस्ति, गुरुविकल्पः नास्ति। शिक्षकाणां सान्निध्ये छात्रेषु व्यक्तित्वविकासः भवति। शिक्षकाः पुस्तकीयज्ञानेन सह छात्रेषु मानवीयमूल्यबोधम् अपि जनयन्ति। ते अनुशासनं, परोपकारं, करुणां, तथैव व्यवहारज्ञानं च शिक्षयन्ति। सदा स्मरणीयं यत् कृतकबुद्धिः उपकरणम् अस्ति, प्रेरणा तु मानवेभ्यः एव आगच्छति।’

(हिन्दी — शिक्षा में दीक्षा, स्वयम्, ‘सर्वों के लिए ए.आई.’, पी.एम्. ई-विद्या, शङ्का दूर करने के लिए चैटबोट तथा भाषानुवाद के उपकरण जगह-जगह प्रयुक्त हो रहे हैं। ये सब ए.आई.-आधारित उपकरण हैं। इनकी सहायता से छात्र शिक्षकों की अनुपस्थिति में भी स्वयं पढ़ सकते हैं। किन्तु कृतकबुद्धि गुरु की मित्र है, गुरु का विकल्प नहीं। शिक्षकों के सान्निध्य में ही छात्रों का व्यक्तित्व-विकास होता है; शिक्षक पुस्तकीय ज्ञान के साथ मानवीय मूल्यों का बोध भी जगाते हैं, अनुशासन, परोपकार, करुणा तथा व्यवहार-ज्ञान सिखाते हैं। सदा याद रखना चाहिए कि कृतकबुद्धि उपकरण है — प्रेरणा तो मनुष्यों से ही आती है।)

यत् कृतकबुद्धिः दातुं शक्नोतियत् केवलं मानवशिक्षकः दातुं शक्नोति
सूचना, पाठ्यसामग्री, प्रश्नोत्तरम्व्यक्तित्वविकासः (सान्निध्येन)
संशयनिराकरणम् (चैट्बोट्)मानवीयमूल्यबोधः
भाषानुवादःअनुशासनम्, परोपकारः, करुणा
अनुपस्थितौ अपि स्वयम्-अध्ययनम्व्यवहारज्ञानम् तथा प्रेरणा
‘गुरुमित्रम्, न गुरुविकल्पः’ — यही उत्तर की जान है: ध्यान दीजिए कि अध्यापक ने तर्क कैसे रखा। उन्होंने यह नहीं कहा कि ए.आई. कमज़ोर है; उन्होंने यह कहा कि शिक्षक जो देता है, वह सूचना नहीं, संस्कार है — और संस्कार सान्निध्य से मिलता है, स्क्रीन से नहीं। ‘प्रेरणा तु मानवेभ्यः एव आगच्छति’ — इस एक वाक्य में ‘एव’ (ही) शब्द निर्णायक है। यन्त्र उत्तर दे सकता है, पर पढ़ने की इच्छा नहीं जगा सकता।
व्याकरण: ‘कृतकबुद्ध्याधारितानि’ = कृतकबुद्धि + आधारितानि (यण् सन्धि के बाद दीर्घ) — ‘ए.आई. पर आधारित’। ‘अनुपस्थितौ’ सप्तमी एकवचन है और यहाँ भावे सप्तमी जैसी है — ‘न होने पर’। ‘अध्येतुम्’ = अधि + √इ + तुमुन् — ‘पढ़ने के लिए’ (यही पद शब्दार्थ-तालिका की पहली पंक्ति में दिया है)। ‘हा धिक्’ खेद-सूचक अव्यय-युग्म है — ‘हाय!’
प्र5.
चिकित्साक्षेत्रे, कृषिक्षेत्रे तथा अपराधशमने कृतकबुद्धिः कथं साहाय्यं करोति ? वेदस्य तथा यशिकायाः भयं च कीदृशम् आसीत् ?
उत्तर

उत्तरम् (त्रीणि क्षेत्राणि) —

क्षेत्रम्पाठस्य वाक्यम्हिन्दी
चिकित्सायाम् (आर्यस्य प्रश्नः)आम् ! रोबोटिक्-सर्जरी, रोग-पूर्वज्ञानं, कृतकबुद्धिः रश्मिपरीक्षणविद्या, चैट-कृतकबुद्धिः, औषधशुश्रूषा चेत्यादीनि तदाधारितानि चिकित्सोपकरणानि सन्ति।रोबोटिक सर्जरी, रोग का पूर्वानुमान, ए.आई.-आधारित रेडियोलॉजी, चैट-ए.आई. तथा औषध-शुश्रूषा — ये सब ए.आई.-आधारित चिकित्सा-उपकरण हैं।
कृषि-क्षेत्रे (अक्षतस्य प्रश्नः)नूनं ! कृषि-क्षेत्रे अपि ड्रोनमाध्यमेन बीज-वपनं, कीटनिरीक्षणं, भूमिक्षमता-चेत्यादीनां परीक्षणम् अपि यन्त्रैः भवन्ति।निश्चय ही! खेती में भी ड्रोन के द्वारा बीज बोना, कीटों का निरीक्षण तथा भूमि की क्षमता की जाँच — ये सब यन्त्रों से होते हैं।
अपराधशमनाय (अथर्वस्य प्रश्नः)मुखपरिचयप्रणाली, पूर्वानुमेय-नियन्त्रणं चेत्यादि-योजनासु कृतकबुद्धेः प्रयोगः अस्ति।चेहरा पहचानने की प्रणाली तथा पूर्वानुमान-आधारित नियन्त्रण (Predictive Policing) जैसी योजनाओं में ए.आई. का प्रयोग है।

उत्तरम् (भयम्) — वेदः वदति — ‘अहं कस्मिंश्चित् चलच्चित्रे दृष्टवान् यत् यन्त्राणि मानवेभ्यः संसारम् अधिगृह्णन्ति इति।’ यशिका च पृच्छति — ‘अपि च, आचार्य ! किं कृतकबुद्धिः मानवस्य स्थानं हर्तुं शक्नोति ?’ अध्यापकः शमयति — ‘एषा चिन्ता समाजे प्रगाढं जायमाना अस्ति, किन्तु अत्र बोद्धव्यं यत् कृतकबुद्धिः सहायिका अस्ति, मनुष्यस्य प्रतिस्पर्धिनी न।

(हिन्दी — वेद कहता है — ‘मैंने किसी चलचित्र में देखा कि यन्त्र मनुष्यों से संसार छीन लेते हैं।’ यशिका पूछती है — ‘क्या कृतकबुद्धि मनुष्य का स्थान छीन सकती है?’ अध्यापक कहते हैं — ‘यह चिन्ता समाज में गहरी होती जा रही है, किन्तु यहाँ समझने योग्य बात यह है कि कृतकबुद्धि सहायिका है, मनुष्य की प्रतिस्पर्धिनी नहीं।’)

पाठ भय का उत्तर कैसे देता है: दो शब्दों को आमने-सामने रखकर — ‘सहायिका’ बनाम ‘प्रतिस्पर्धिनी’। और ध्यान दीजिए, अध्यापक भय को झूठा नहीं कहते — ‘एषा चिन्ता समाजे प्रगाढं जायमाना अस्ति’, अर्थात् चिन्ता सचमुच बढ़ रही है। पहले भय को स्वीकार करना, फिर उसे सही दिशा देना — यही परिपक्व उत्तर की विधि है। इसी दृष्टि से आगे (पृष्ठ ५७) वे कहते हैं — ‘कृतकबुद्धिः स्वतः कस्यापि वृत्तिं न हरति’ — ए.आई. स्वयं किसी की नौकरी नहीं छीनती।
छपाई की सूचना: पाठ (पृष्ठ ५५) में यह पद ‘पूर्वानुमेय-नियन्त्रणम्’ (Predictive Policing) छपा है, किन्तु अभ्यास-प्रश्न २ (छ) में वही पद ‘अपूर्वानुमेय-नियन्त्रणम्’ छपा है। ‘अ’ उपसर्ग लगने से अर्थ उलट जाएगा (‘जिसका पूर्वानुमान न हो सके’), इसलिए शुद्ध पद पूर्वानुमेय-नियन्त्रणम् ही है — पूर्वम् अनुमेयम् (पहले से अनुमान करने योग्य) नियन्त्रणम्।
व्याकरण: ‘चलच्चित्रे’ = चलत् + चित्रे (श्चुत्व सन्धि — त् + च् = च्च्); ‘चलत्’ शतृ-प्रत्ययान्त है — ‘चलता हुआ चित्र’ अर्थात् film। ‘मानवेभ्यः … अधिगृह्णन्ति’ — यहाँ पञ्चमी अपादान में है (जिससे छीना जाए)। ‘हर्तुम्’ = √हृ + तुमुन्। ‘बोद्धव्यम्’ = √बुध् + तव्यत् — ‘समझना चाहिए’, विधि-कृदन्त।
क्या यह उपयोगी रहा? त्रुटि बताएँ