प्र1.
ढोल, नगाड़ा या अन्य कोई वाद्ययंत्र बजाते हुए बोलिए, “सुनो, सुनो, सुनो! राजदरबार में कवि-सम्मेलन हो रहा है। सबसे अच्छी कविता सुनाने वाले को सौ अशर्फियाँ इनाम में मिलेंगी।” अब इस संवाद को अपनी मातृभाषा में हाव-भाव के साथ बोलिए।
उत्तर
यह कक्षा में करने वाला काम है। यह लिखकर नहीं, बोलकर और अभिनय करके पूरा होगा।
कैसे करें —
- ढोल या नगाड़ा न हो तो कोई खाली डिब्बा, बाल्टी या थाली ले लीजिए। यही आपका ढोल है।
- पहले तीन बार ढोल बजाइए — ढम! ढम! ढम! इससे सब लोग आपकी ओर देखेंगे।
- अब ऊँची आवाज़ में बोलिए — “सुनो, सुनो, सुनो!” तीनों बार आवाज़ और ऊँची कीजिए।
- ‘सौ अशर्फियाँ’ बोलते समय ज़रा रुकिए और हाथ फैलाकर दिखाइए कि इनाम बहुत बड़ा है।
- बोलते-बोलते कक्षा में घूमिए, जैसे ढिंढोरा पीटने वाला गली-गली घूमता है।
- अब यही बात अपनी मातृभाषा में बोलिए। शब्द बदल जाएँगे, पर जोश वही रहना चाहिए।
अच्छे प्रदर्शन में ये बातें होनी चाहिए — ऊँची और साफ़ आवाज़, बीच-बीच में ठहराव, चेहरे पर जोश, और ढोल की थाप के साथ ताल-मेल।
संकेत: पुस्तक में कलाकारी वाले इस अभ्यास में लिखा है “सौ अशर्फियाँ इनाम में मिलेंगी”, जबकि पाठ में पृष्ठ 127 पर यही बात “सौ अशर्फियाँ पुरस्कार में मिलेंगी” छपी है। इनाम और पुरस्कार एक ही अर्थ के दो शब्द हैं, इसलिए दोनों ठीक हैं।