क्योंकि ‘सुरुर-सुरुर’ पानी पीने की आवाज़ है। यह शब्द उसी आवाज़ से बना है।
पंक्ति का सरल अर्थ — “सुरुर-सुरुर करके कौन पानी पी रहा है?”
कवि जो चित्र बना रहा है — एक तालाब है। उसके किनारे भैंस खड़ी है। वह मुँह पानी में डालकर लंबे-लंबे घूँट भर रही है और उससे सुरुर-सुरुर की आवाज़ आ रही है। मदन ने यही दृश्य देखा और वही आवाज़ कविता में रख दी।