कांग लेखक का टिफिन लेकर आई थीं। उन्होंने पहले घर को देखा, फिर मुस्कुराते हुए पूछा — “खिड़की खुली थी क्या बाबा?” लेखक ने कहा, “हाँ।”
तब वे हँसीं और बोलीं, “खिड़की खुली रखेगा तो बादल तो घर में आएगा ही न।” उन्होंने आगे बताया — “बरसाती दिनों में बादल बहुत नीचे तैरते हैं। ऐसे में खिड़की-दरवाजे खुले मिल जाएँ तो वे घर को अपना समझकर चले आते हैं और सब कुछ गीला कर जाते हैं।”
कांग को पता कैसे था: वे उसी जगह की रहने वाली थीं। अपने आस-पास को रोज देखने वाला व्यक्ति उसकी बातें अच्छी तरह जानता है।
संकेत: रचना का शीर्षक ‘चेरापूँजी के मेहमान’ इसीलिए है — यहाँ बादल ही बिन बुलाए मेहमान बनकर घर आ गए।