प्र1.
अपने देश के विभिन्न राज्यों के शास्त्रीय और लोकनृत्यों की पहचान कीजिए। पुस्तक में बारह चित्र दिए गए हैं और हर चित्र के नीचे नृत्य का नाम छपा है —
| क्रम | चित्र में क्या दिखता है | चित्र के नीचे छपा नाम |
|---|---|---|
| 1 | चौड़े घेरदार बैंगनी-लाल घाघरे में खड़ी नर्तकी, हाथ की मुद्रा बनाए हुए | भरतनाट्यम |
| 2 | पीली लंबी पोशाक में घूमती नर्तकी, पैरों में घुँघरू | कथक |
| 3 | हरे रंग का चेहरा और बहुत बड़ा सिर का मुकुट, सफेद घेरदार पोशाक | कथकली |
| 4 | सफेद-सुनहरी पोशाक में झुककर नाचती नर्तकी | मोहिनीअट्टम |
| 5 | लाल-पीली पोशाक और चाँदी के गहनों में एक हाथ ऊपर उठाए नर्तकी | ओडिसी |
| 6 | लाल-हरी साड़ी में दोनों हाथों से पल्ला ऊपर उठाए नर्तकी | लावणी |
| 7 | सफेद-लाल पोशाक में सिर पर आभूषण पहने नर्तकी | कुचिपुड़ी |
| 8 | एक पुरुष ढोल बजाता हुआ और एक महिला हल्के पीले वस्त्र में नाचती हुई | बिहू |
| 9 | पगड़ी पहने पुरुष ढोल बजाता हुआ और एक महिला नाचती हुई | भांगड़ा |
| 10 | एक जोड़ा हाथ में डंडे लेकर नाचता हुआ | गरबा |
| 11 | काले घेरदार घाघरे और रंगीन गहनों में नाचती महिला | कालबेलिया |
| 12 | पीली पोशाक और बहुत बड़ा रंगीन मुकुट पहने नर्तक, हाथ में तलवार | छऊ |
उत्तर
पुस्तक के बारह चित्रों में ये नृत्य दिखाए गए हैं — भरतनाट्यम, कथक, कथकली, मोहिनीअट्टम, ओडिसी, लावणी, कुचिपुड़ी, बिहू, भांगड़ा, गरबा, कालबेलिया और छऊ।
इनमें से कथकली के बारे में इसी पाठ में लिखा है — “केरल में कई जगह सुप्रसिद्ध नृत्य ‘कथकली’ का भी आयोजन होता है।” यानी कथकली केरल का नृत्य है।
नमूना उत्तर — कौन-सा नृत्य किस राज्य का:
| नृत्य | प्रकार | राज्य |
|---|---|---|
| भरतनाट्यम | शास्त्रीय | तमिलनाडु |
| कथक | शास्त्रीय | उत्तर प्रदेश |
| कथकली | शास्त्रीय | केरल |
| मोहिनीअट्टम | शास्त्रीय | केरल |
| ओडिसी | शास्त्रीय | ओडिशा |
| कुचिपुड़ी | शास्त्रीय | आंध्र प्रदेश |
| लावणी | लोकनृत्य | महाराष्ट्र |
| बिहू | लोकनृत्य | असम |
| भांगड़ा | लोकनृत्य | पंजाब |
| गरबा | लोकनृत्य | गुजरात |
| कालबेलिया | लोकनृत्य | राजस्थान |
| छऊ | लोकनृत्य | ओडिशा, झारखंड और पश्चिम बंगाल |
संकेत: पुस्तक चित्रों के नीचे केवल नृत्य का नाम छापती है, राज्य का नाम नहीं। ऊपर की तालिका इसीलिए ‘नमूना उत्तर’ है। अपने अध्यापक और पुस्तकालय की सहायता से इसे जाँच लीजिए — पुस्तक स्वयं पृष्ठ 104 पर यही करने को कहती है।
अंतर समझिए: शास्त्रीय नृत्य के नियम बँधे हुए होते हैं और उसे वर्षों सीखना पड़ता है। लोकनृत्य गाँव-समाज के लोग त्योहार या फसल के समय मिलकर करते हैं, और वह सबके लिए खुला होता है।