कविता में चंदू चाचा जलेबी बेच रहे हैं।
वे गरमागरम जलेबी बेचते हैं और आवाज लगाते हैं — “एक पाव बीस में ले लो, मीठी मस्त जलेबी।” कविता में केवल ‘बीस’ लिखा है, यानी एक पाव जलेबी का दाम बीस रुपए है।
अद्यतन2026-09-19
कविता में चंदू चाचा जलेबी बेच रहे हैं।
वे गरमागरम जलेबी बेचते हैं और आवाज लगाते हैं — “एक पाव बीस में ले लो, मीठी मस्त जलेबी।” कविता में केवल ‘बीस’ लिखा है, यानी एक पाव जलेबी का दाम बीस रुपए है।
कवि कहता है — “टेढ़ी-मेढ़ी अंदर से, बाहर गोल-गोल।”
इसका अर्थ है कि जलेबी के भीतर के घुमाव टेढ़े-मेढ़े होते हैं, पर बाहर से वह गोल दिखाई देती है।
तन्नु ने दादी से पूछा — “इनमें भरता कैसे रस?”
यानी वह जानना चाहती है कि जलेबी के भीतर मीठा रस कैसे भर जाता है।
कविता की अगली पंक्तियाँ ही उत्तर देती हैं —
चंदू चाचा कहते हैं — जलेबी यहीं खाओ और घर भी ले जाओ। जो मीठा खाएगा, उसके बोल भी मीठे हो जाएँगे।
यहाँ ‘मीठे बोल’ का अर्थ है — प्यार से बोलना, मीठी बातें करना।
अंतिम पंक्तियाँ हैं — “चंदू बातें बहुत बनाता, बिकती जाती, बिकती जाती।”
इससे पता चलता है कि चंदू चाचा बहुत बातूनी और हँसमुख दुकानदार हैं। वे बातें करते जाते हैं और जलेबी बिकती जाती है।