किसी बुज़ुर्ग से पूछिए कि आज जो बात बिलकुल सामान्य है, वह उनके बचपन में थी ही नहीं। लगभग हर बुज़ुर्ग एक साथ तीन-चार बातें बता देंगे, और उनमें से हर एक कहीं न कहीं से आई है।
साक्षात्कार ठीक से कैसे लें:
- साठ वर्ष से अधिक आयु का कोई व्यक्ति चुनिए — दादा-दादी, नाना-नानी, पड़ोसी, दुकानदार या कोई सेवानिवृत्त शिक्षक।
- ऐसा समय तय कीजिए जब वे खाली हों, और कॉपी-पेन साथ ले जाइए। बताइए कि आप क्यों आए हैं।
- ये प्रश्न एक-एक करके पूछिए और उन्हें बोलने दीजिए — “आप बचपन में क्या खाते थे जो अब नहीं खाया जाता?” · “आज हम क्या खाते हैं जिसका नाम भी आपने नहीं सुना था?” · “विवाह में कौन-से गीत गाए जाते थे?” · “त्योहारों पर अब क्या होता है जो तब नहीं होता था?” · “आपकी गली में पहला टेलीविज़न, टेलीफ़ोन, गैस चूल्हा या स्कूटर कब आया?”
- जहाँ तक हो सके उनके अपने शब्द लिखिए, अपना सारांश नहीं।
- अंत में पूछिए, “आपको क्या लगता है यह कहाँ से आया?” — और फिर स्वयं भी पता कीजिए।
- पृष्ठ के ऊपर उस व्यक्ति का नाम और आयु लिखिए।
नमूना उत्तर
मेरी दादी कमला देवी, आयु 72 वर्ष, से बातचीत।
उन्होंने बताया कि जब वे छोटी थीं तो उनके गाँव में न नूडल्स थे, न मोमोज़, न पिज़्ज़ा, न जन्मदिन का केक। जन्मदिन केक और मोमबत्ती से मनाया ही नहीं जाता था — माँ खीर या हलवा बनाती थीं और बच्चा बड़ों के पैर छूता था। केक और ‘हैप्पी बर्थडे’ का गीत बहुत बाद में, यूरोप और अमेरिका से, पहले शहरों में और फिर गाँवों तक, फ़िल्मों और टेलीविज़न के माध्यम से आया।
उन्होंने यह भी बताया कि उनके बचपन में चाय रोज़ नहीं पी जाती थी। वह केवल तब बनती थी जब कोई अतिथि आता था। अब सब दिन में दो-तीन बार पीते हैं। उन्होंने कहा कि यह बदलाव तब आया जब चाय पैकेटों में बिकने लगी और उसका ख़ूब प्रचार होने लगा।
तीसरी बात उन्होंने गैस चूल्हे की बताई। वे लकड़ी और उपलों के चूल्हे पर खाना बनाती थीं और धुएँ से रोज़ आँखें जलती थीं। गैस का सिलेंडर उनके घर तब आया जब वे स्वयं माँ बन चुकी थीं।
| बुज़ुर्ग क्या-क्या बता सकते हैं | वह कहाँ से आया |
|---|---|
| नूडल्स, चाउमीन, मोमोज़ | चीन, तिब्बत और नेपाल — ये पहाड़ी कस्बों और ठेलों के माध्यम से भारतीय शहरों तक पहुँचे |
| पिज़्ज़ा, बर्गर, केक, शीतल पेय | यूरोप और अमेरिका, शहरों, फ़िल्मों और टेलीविज़न के रास्ते |
| जन्मदिन का केक और ‘हैप्पी बर्थडे’ गीत | यूरोप और अमेरिका की रीति; पहले भारतीय जन्मदिन का अर्थ था मिठाई और बड़ों का आशीर्वाद |
| दिन में कई बार चाय | चाय का पौधा असम में उगता है, पर रोज़ पीने की आदत पिछले लगभग सौ वर्षों में ही फैली |
| सिले-सिलाए कपड़े, जींस, स्कूल के जूते | पहले लगभग सब कुछ गाँव का दर्ज़ी सिलता था |
| प्लास्टिक की बाल्टी, मग और बोतल | इन्होंने एक ही पीढ़ी में पीतल, ताँबे और मिट्टी के बर्तनों की जगह ले ली |
| टेलीविज़न, मोबाइल फ़ोन, विवाह में फ़िल्मी गीत | मशीनें विदेश से आईं; दादी-नानी के गाए विवाह-गीत अब कम ही सुनाई देते हैं |
| पाव-भाजी, इडली, ढोकला अपने मूल स्थान से बहुत दूर खाए जाना | ये भारत के भीतर ही एक राज्य से दूसरे राज्य तक गए |