कक्षा ५ हमारा अद्भुत संसार अध्याय 10 पाठ्य प्रश्न के लिए एनसीईआरटी समाधान

अद्यतन2026-09-19

प्र1.
क्या आपने कभी बड़े समूहों में काले और गुलाबी पक्षी देखे हैं?
उत्तर

यदि आपने आकाश में छोटे पक्षियों का ऐसा विशाल झुंड देखा है जो धुएँ के बादल की तरह एक साथ मुड़ता-घूमता है, तो संभवतः आपने गुलाबी मैना ही देखी है। ये अकेली लगभग कभी दिखाई नहीं देतीं। ये सैकड़ों या हज़ारों के झुंड में यात्रा करती हैं, खाती हैं और रात को साथ बसेरा करती हैं।

क्या-क्या देखिए:

  • रंग। वयस्क गुलाबी मैना का शरीर गुलाबी तथा सिर, पंख और पूँछ काले होते हैं। छोटे पक्षी कहीं अधिक साधारण होते हैं — भूरे और हल्के पीले, ठीक वैसे ही जैसा पक्षी पृष्ठ 164 पर बना है। इसलिए पूरा झुंड गुलाबी नहीं दिखता।
  • आकार। लगभग आम मैना जितना, जिससे इसका निकट का संबंध है। चोंच नुकीली और पीली-गुलाबी, सिर पर छोटी-सी कलगी।
  • झुंड। पृष्ठ 164 का छायाचित्र यही दिखाता है — हरे खेत के ऊपर हज़ारों पक्षी, इतने पास-पास कि पूरा झुंड हवा में उड़ेले गए एक ही गहरे आकार जैसा लगता है।
  • आवाज़। सूर्यास्त के समय किसी पेड़ से आती तेज़, चहचहाती, चीं-चीं जैसी आवाज़, जब सारा झुंड एक साथ सोने बैठता है।
  • ऋतु। सर्दी। ये लगभग अक्तूबर में आती हैं और मार्च-अप्रैल तक लौट जाती हैं।
ये इतने बड़े झुंड में क्यों उड़ती हैं: अकेले छोटे पक्षी को बाज़ सरलता से पकड़ लेता है। परंतु हज़ार पक्षी एक साथ मुड़ते-घूमते हैं तो बाज़ भ्रमित हो जाता है — वह किसी एक पक्षी पर दृष्टि टिका ही नहीं पाता। झुंड भोजन ढूँढ़ने में भी सहायक है — जैसे ही एक पक्षी टिड्डों से भरे खेत पर उतरता है, शेष भी तुरंत उतर आते हैं। साथ उड़ना ही वह उपाय है जिससे एक छोटा और कमज़ोर पक्षी स्वयं को सुरक्षित और भरपेट रखता है।
जाकर देखिए: सर्दियों में सूर्यास्त से ठीक पहले खेत के पास के किसी बड़े पेड़ को देखिए। यदि वह पेड़ अचानक शोर से भर जाए और चारों दिशाओं से पक्षी उसमें आते ही जाएँ, तो आपने बसेरा ढूँढ़ लिया। चुपचाप खड़े होकर गिनिए कि पक्षी कितनी देर तक आते रहते हैं।
प्र2.
क्या यह आश्चर्यजनक नहीं है कि ये छोटे-छोटे से पक्षी इतनी लंबी यात्रा करते हैं और इतने सहायक होते हैं?
उत्तर

हाँ — और इस वाक्य के दोनों भागों पर अलग-अलग सोचना चाहिए। यात्रा आश्चर्यजनक है क्योंकि पक्षी इतना छोटा है। सहायता आश्चर्यजनक है क्योंकि पक्षी हमारी सहायता करने के लिए आता ही नहीं।

1. यात्रा। गुलाबी मैना का भार बिस्कुट के एक छोटे पैकेट से भी कम होता है। फिर भी हर शरद ऋतु में वह रूस के दक्षिणी भाग और मंगोलिया से मध्य एशिया पार करती हुई भारत आती है — कई हज़ार किलोमीटर — और हर वसंत में उतनी ही दूर लौट जाती है। उसे कोई मानचित्र नहीं देता। न इंजन, न ईंधन, न लंबे विश्राम की सुविधा। यह सब वह अपने दो पंखों के बल पर करती है।

2. सहायता। भारत में वह टिड्डे-टिड्डियों तथा कीड़ों-मकौड़ों को खाती है। ये कीट गेहूँ, ज्वार, बाजरा और घास को चट कर जाते हैं। इसलिए खेत पर उतरता इनका झुंड किसान के लिए मुफ़्त में आई कीट-नाशक सेना जैसा है। पक्षी तो केवल अपना भोजन ढूँढ़ रहे हैं — पर उनका भोजन ही किसान का शत्रु है।

पक्षी को भारत से क्या मिलता हैभारत को पक्षी से क्या मिलता है
जब उसका अपना देश जमा हुआ रहता है तब गर्म मौसमफ़सल के कीटों का भारी संख्या में समाप्त होना
भरपूर कीट और अनाजगेहूँ, ज्वार और बाजरा को कम क्षति
बसेरे के लिए बड़े, सुरक्षित पेड़कीट मारने के लिए कम विष खरीदने की आवश्यकता
असली सीख: यह किसी ने योजना बनाकर नहीं किया। न पक्षी ने किसानों की सहायता का निश्चय किया, न किसानों ने पक्षी को बुलाया। यह इसलिए चलता है क्योंकि जीव एक-दूसरे पर ऐसे-ऐसे ढंग से निर्भर हैं जिनका उन्हें स्वयं भी पता नहीं होता। अध्याय इसी को परस्पर जुड़ा हुआ जीवन कहता है — एक धागा खींचिए और कहीं दूर कुछ हिल जाता है। और चूँकि यह पक्षी रास्ते में कई देश पार करता है, इसलिए इसे बचाना अकेले भारत का काम नहीं है।
याद रखने योग्य बात: यदि जिन पेड़ों पर ये पक्षी बसेरा करते हैं वे काट दिए जाएँ, या खेतों में ऐसा तेज़ विष छिड़का जाए जो हर कीट मार दे, तो पक्षियों के पास न ठहरने का स्थान बचेगा न खाने को कुछ। तब वे आना बंद कर देंगे — और कीट लौट आएँगे। बसेरे का एक पेड़ बचाना छोटा-सा काम है, पर उसका असर बहुत दूर तक जाता है।
क्या यह उपयोगी रहा?