संक्षिप्त उत्तर — कचरा उसी रूप में दीजिए जिस रूप में आप स्वयं लेना चाहेंगे। बाकी सब बातें इसी से निकलती हैं।
दस काम जो हम सचमुच कर सकते हैं
- गीला और सूखा अलग कीजिए — हाथ से निकलने से पहले ही।
- नुकीली वस्तुएँ लपेटिए। टूटा काँच, ब्लेड, फूटा बल्ब — मोटे समाचार-पत्र में लपेटकर ऊपर “काँच” लिख दीजिए।
- बैटरी, दवाइयाँ और ई-कचरा दोनों कूड़ेदानों से बाहर रखिए। ये विषैले होते हैं। इन्हें अलग चिह्नित डिब्बे में रखिए।
- गीला कचरा ज़मीन पर या खिड़की से बाहर मत फेंकिए।
- कूड़ेदान का ढक्कन लगा रहने दीजिए, ताकि कुछ बिखरे नहीं और कोई पशु उसे खींचे नहीं।
- कूड़ेदान को ऊपर तक मत भरिए। जो कूड़ेदान बंद ही न हो, उसे हाथ से ख़ाली करना पड़ता है।
- कूड़ा फैलाइए ही मत। ज़मीन पर पड़ा हर रैपर किसी की कमर झुकाता है।
- शौचालय का उपयोग करके उसे स्वच्छ छोड़िए। फ़्लश कीजिए और उसमें रैपर मत डालिए।
- उनका अभिवादन कीजिए और उनका नाम जानिए। नमस्ते कहिए। धन्यवाद कहिए। यह छोटी बात नहीं है।
- पूछिए कि उनके पास दस्ताने, जूते और मास्क हैं या नहीं — और न हों तो शिक्षक को बताइए।
कक्षा में आने वाले अतिथि से पूछने योग्य प्रश्न
- आपका काम कितने बजे आरंभ होता है और आप कितना क्षेत्र सँभालते हैं?
- काम का सबसे कठिन भाग कौन-सा है?
- कचरे में आपको ऐसा क्या मिलता है जो वहाँ कभी नहीं होना चाहिए था?
- क्या काम करते हुए कभी आपको चोट लगी है?
- आप इस विद्यालय के हर विद्यार्थी से एक बात कहना चाहें तो क्या कहेंगे?
नमूना उत्तर — हमारी कक्षा ने क्या सीखा: “सुनीता दीदी ने बताया कि वे सुबह छह बजे काम शुरू करती हैं और हमारे आने से पहले पूरा मैदान बुहार देती हैं, और जो वे उठाती हैं उसका अधिकांश खेल के मैदान से आए चॉकलेट के रैपर होते हैं। उन्होंने कहा कि सबसे कठिन काम बुहारना नहीं है — सबसे कठिन हैं मिले-जुले कूड़ेदान, क्योंकि उन्हें गीला और सूखा हाथ से अलग करना पड़ता है। एक बार गीले कूड़ेदान में किसी के डाले काँच के टूटे चूड़े से उनकी उँगली कट गई थी। जब हमने पूछा कि वे हमसे क्या चाहती हैं, तो उन्होंने कहा — ‘बस दो बातें। कूड़ेदान में डालिए, और सही कूड़ेदान में डालिए।’ इसके बाद हमारी कक्षा ने दो काम किए — हमने कार्यालय से खेल के मैदान के किनारे एक कूड़ेदान माँगा, और यह नियम बनाया कि भोजन के बाद अपनी कक्षा के रैपर हम स्वयं उठाएँगे। और हमने उनका नाम सीखा, जो हममें से किसी को पता ही नहीं था।”
सम्मान इस अध्याय का भाग क्यों है: विद्यालय तभी आनंदमय स्थान है जब वह उसमें रहने वाले हर व्यक्ति के लिए आनंदमय हो — उन लोगों के लिए भी जो उसे स्वच्छ रखते हैं। उनके काम के कारण ही हमारा काम संभव होता है। श्रम की गरिमा का यही अर्थ है — दया नहीं, सम्मान, और ऐसा व्यवहार जो वह सम्मान दिखाए।