हम आरंभ अपने ही विद्यालय को ध्यान से देखने और जो मिले उसे ठीक-ठीक लिखने से करेंगे। जब तक यह पता न हो कि समस्या कहाँ है, उसे ठीक नहीं किया जा सकता।
नमूना उत्तर: “सर, हम ऐसे आरंभ करेंगे। पहले हम पूरे विद्यालय में घूमेंगे और उसका मानचित्र बनाएँगे — मुख्य भवन, खेल का मैदान, उद्यान, पानी की टंकियाँ, विद्यालय द्वार और मार्ग। फिर हम पाँच विद्यालय अन्वेषक समूह बनाएँगे। हर समूह एक काम लेगा — जल, विद्युत, अपशिष्ट, हरियाली और यातायात। हर समूह पहले ही तय कर लेगा कि उसे क्या देखना है, ताकि हम केवल इधर-उधर न घूमते रहें। हम एक सप्ताह लेंगे और हर समूह अपनी बात लिखेगा — कितने नलों से रिसाव है, कितने कूड़ेदान हैं, कौन-सा कक्ष सबसे गर्म है, कितने वृक्ष हैं। फिर हम कक्षा में एक साथ बैठकर अपने निष्कर्ष साझा करेंगे। उसके बाद हम दो-तीन ऐसी समस्याएँ चुनेंगे जिन्हें हम इसी सत्र में स्वयं हल कर सकते हैं, और हर एक के लिए योजना बनाएँगे।”
‘पहले देखिए’ ही सही पहला कदम क्यों है: अनुमान से किया गया परिश्रम व्यर्थ जाता है। हो सकता है कोई कक्षा पूरा महीना पौधे लगाने में लगा दे, जबकि विद्यालय की सबसे बड़ी समस्या रात भर बहते तीन नल थे। अवलोकन बताता है कि आपका परिश्रम कहाँ सबसे अधिक काम आएगा। वैज्ञानिक भी इसी तरह काम करते हैं — देखो, लिखो, फिर करो।
अपने समूह के लिए सुझाव: बाहर निकलने से पहले तय कीजिए कि क्या देखना है, और एक कॉपी साथ ले जाइए। भावनाएँ नहीं, संख्याएँ लिखिए — “कुछ नल टपक रहे हैं” नहीं, बल्कि “4 नल टपक रहे हैं”। संख्याएँ लोगों को समझाती हैं।