प्र1.
छोटे-छोटे समूहों में पलाश, सागवान, कटहल या इसी तरह के चौड़े पत्तों वाले पौधों के ताजा पत्ते एकत्र कीजिए। यदि पत्ते उपलब्ध न हों तो कागज का उपयोग करके यह गतिविधि कीजिए। इसके अतिरिक्त कुछ छोटी-छोटी पतली लकड़ी की डंडियाँ एकत्रित कीजिए। अब पत्तों या कागज के टुकड़ों को छोटी-छोटी डंडियों का उपयोग करके आपस में जोड़िए और इसे थाली अथवा चम्मच का रूप दीजिए।
उत्तर
आप क्या बनाएँगे: पत्तों की एक गोल थाली (पत्तल) और एक छोटा गहरा दोना या चम्मच — ठीक वही जो पृष्ठ 139 के चित्रों में दिखाए गए हैं। डंडियाँ छोटी कीलों जैसा काम करती हैं। वे पत्तों को बिना गोंद, बिना धागे और बिना किसी मशीन के जोड़ देती हैं।
पत्तल कैसे बनाएँ:
- पलाश, सागवान या कटहल के 6 से 8 ताजे चौड़े पत्ते इकट्ठे कीजिए। ताजे पत्ते बिना टूटे मुड़ जाते हैं। उन्हें धोकर पानी झाड़ लीजिए।
- डंडियों को लगभग 3 सेमी के छोटे टुकड़ों में तोड़ लीजिए। सिरे बहुत नुकीले न रखिए।
- एक पत्ता सीधा बिछाइए। दूसरे पत्ते को इस तरह रखिए कि वह पहले पत्ते के लगभग आधे भाग पर आ जाए।
- जहाँ दोनों पत्ते एक-दूसरे पर हैं, वहाँ एक डंडी आर-पार खोंस दीजिए — अंदर, फिर बाहर, टाँके की तरह। दोनों पत्ते जुड़ गए।
- इसी तरह गोलाई में पत्ते जोड़ते जाइए, हर नए पत्ते को पिछले पत्ते से खोंसते हुए।
- जब गोला पूरा हो जाए तो अंतिम पत्ते को पहले पत्ते से जोड़ दीजिए।
- पत्तल को कुछ मिनट किसी भारी पुस्तक के नीचे दबा दीजिए। किनारे को कैंची से काटकर गोल कर लीजिए।
दोना या चम्मच कैसे बनाएँ:
- एक बड़ा पत्ता लीजिए। उसे शंकु (कोन) के आकार में मोड़िए, जिससे नोक नीचे आ जाए।
- मोड़ को पकड़े रहिए और ऊपरी किनारे के पास दोनों तहों में एक डंडी आर-पार खोंस दीजिए।
- यदि शंकु खुल जाए तो थोड़ा नीचे एक और डंडी लगा दीजिए।
- थोड़ा पानी डालकर जाँचिए। यदि पानी टपके तो अंदर एक और पत्ता लगाकर उसे भी खोंस दीजिए।
डंडी पकड़ क्यों बना लेती है: डंडी दोनों पत्तों के आर-पार जाती है और उनके रेशों के आड़े पड़ती है। पत्तों को अलग करने के लिए उन रेशों को फाड़ना पड़ेगा, और इसके लिए बहुत जोर चाहिए। यह ठीक टाँके जैसा ही विचार है — सुई धागे को कपड़े के दो टुकड़ों के आर-पार ले जाती है, और फिर कपड़े बिना फटे अलग नहीं होते।
यह जानना क्यों जरूरी है: भारत में सैकड़ों वर्षों से भोजन में, मंदिरों में और मेलों में पत्तल और दोने का उपयोग होता आया है। इनमें लागत लगभग शून्य है, कारखाने की आवश्यकता नहीं है, और उपयोग के बाद ये गलकर मिट्टी में मिल जाते हैं। प्लास्टिक की थाली इनमें से कुछ भी नहीं कर पाती। टूट जाने पर वह केवल कचरा बनकर रह जाती है।