कक्षा ५ हमारा अद्भुत संसार अध्याय 8 आइए विचार करें के लिए एनसीईआरटी समाधान

अद्यतन2026-09-19

प्र1.
1. क्या आपने कभी पुराने कपड़ों का पुनरुपयोग या पुनर्चक्रण किया है? आपने या आपके परिवारजनों ने उनसे क्या बनाया था?
उत्तर

हाँ। अधिकतर भारतीय घरों में पुराना कपड़ा यों ही फेंका नहीं जाता — उससे कुछ और बना लिया जाता है।

नमूना उत्तर: “हाँ, हमने किया है। माँ की पुरानी सूती साड़ी से दो चीजें बनीं। उसके अच्छे भाग को काटकर मेरी छोटी बहन के लिए गुदड़ी बनाई गई — पुराने कपड़ों की तीन तहें लंबे कच्चे टाँकों से जोड़कर। साड़ी का किनारा काटकर उससे एक झोला सिला गया, जिसे हम बाजार ले जाते हैं। मेरी विद्यालय की कमीजें छोटी होने पर काटकर रसोई के सफाई-कपड़े बना दी गईं। पिताजी का फटा कुर्ता मोची को दिया, जिसने उसका एक टुकड़ा एक थैले की मरम्मत में अस्तर के रूप में लगाया।”

पुराने कपड़ों का सामान्यतः यों उपयोग होता है —

कपड़ा पहले क्या थावह क्या बन जाता है
छोटी हो चुकी कमीज या फ्रॉकछोटे भाई-बहन या पड़ोसी के बच्चे को दे दी जाती है
पुरानी साड़ीरजाई या गुदड़ी, पेटीकोट, कपड़े का थैला, परदा, फर्श की चटाई
घिसा हुआ तौलिया या चादररसोई के कपड़े, डस्टर, फर्श पोंछने का कपड़ा
दर्जी की दुकान के छोटे टुकड़ेरजाई के चौकोर टुकड़े, कोस्टर, गुड़िया के कपड़े, पाउच, गद्दी की भराई
पुराना ऊनी स्वेटरऊन खोलकर फिर से मोजे, टोपी या दस्ताने बुन लिए जाते हैं
फटी जींस या मोटा कपड़ापेंसिल-पाउच, थैला, दूसरी पतलूनों के घुटनों पर पैबंद
बहुत घिसा हुआ कपड़ासफाई के चीथड़े, पोंछा, श्यामपट का डस्टर
यह क्यों महत्वपूर्ण है: कपड़े के हर टुकड़े में बहुत सारा परिश्रम भरा है। किसी ने कपास उगाई, किसी ने सूत काता, किसी ने बुना, किसी ने सिला। कपड़े को फिर से उपयोग में लाने का अर्थ है कि वह सारा परिश्रम काम आता रहेगा। साथ ही एक नई वस्तु कम बनानी पड़ेगी और एक वस्तु कम कचरे में जाएगी।
प्र2.
2. यदि सिले हुए कपड़े या बुनी हुई चटाई में से एक धागा टूट जाए तो क्या होगा? प्रत्येक धागा क्यों महत्वपूर्ण है?
उत्तर

कपड़ा या चटाई उसी स्थान से खुलने लगेगी — और खुलाव आगे भी बढ़ सकता है। हर धागा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि हर धागा अपने पास वाले धागों को अपनी जगह पर थामे हुए है।

बुनी हुई चटाई में:

  1. एक धागा टूट जाता है।
  2. जो धागे उसे काटकर जा रहे थे, उनकी पकड़ ढीली पड़ जाती है।
  3. वहाँ एक छेद बन जाता है और ढीले धागे खिसकने लगते हैं।
  4. यदि कुछ न किया जाए तो छेद बड़ा होता जाता है और चटाई उधड़ जाती है।

सिले हुए कपड़े में:

  1. सिलाई का धागा किसी एक जगह टूट जाता है।
  2. पास वाला टाँका ढीला होता है, फिर अगला, फिर उसका अगला।
  3. सिलाई-रेखा के साथ-साथ कपड़े के दोनों टुकड़े अलग हो जाते हैं।
  4. चूँकि पूरी सिलाई एक ही धागे से हुई थी, पूरी सिलाई खुल सकती है।
प्रत्येक धागा क्यों महत्वपूर्ण है: कपड़ा कोई ठोस चादर नहीं है। वह बहुत-से धागों से बना है, जिनमें से हर धागा दूसरों के ऊपर और नीचे से निकलता है, इसलिए हर धागा अपने पड़ोसियों को थामता है और स्वयं भी उनसे थमा रहता है। पूरा काम कोई एक धागा नहीं कर रहा — और कोई एक धागा बेकार भी नहीं है। एक निकाल दीजिए, तो पास वाले धागों के पास पकड़ने को कुछ नहीं बचेगा। बुनाई का पूरा विचार यही है: शक्ति साथ मिलकर काम करने से आती है।
इसका उपाय: छोटी फटन तुरंत सिल दीजिए। सिलाई-रेखा के दोनों सिरों पर ठीक से गाँठ लगाइए। और ध्यान दीजिए कि यही बात परिवार, कक्षा और गाँव में भी लागू होती है — कोई एक व्यक्ति सारा काम नहीं करता, पर यदि एक व्यक्ति का हिस्सा छूट जाए तो उसके आस-पास का काम भी बिखरने लगता है।
प्र3.
3. किसी व्यस्क व्यक्ति के साथ किसी दर्जी या हथकरघे की दुकान पर जाइए। वहाँ आपने कौन-से मशीन या उपकरण उपयोग में आते हुए देखे?
उत्तर

किसी बड़े के साथ जाइए, वहाँ काम कर रहे व्यक्ति का अभिवादन कीजिए, और कुछ भी छूने से पहले पूछ लीजिए। हर औजार पर दो प्रश्न पूछिए — “इसका नाम क्या है?” और “इसका उपयोग किसलिए होता है?” उत्तर वहीं लिख लीजिए।

नमूना उत्तर — हमारी गली के दर्जी की दुकान पर मेरी यात्रा

मशीन या औजारउसका उपयोग
सिलाई मशीनसुई बहुत तेजी से ऊपर-नीचे चलती है और कपड़ा उसके नीचे सरकता जाता है। हाथ से जो सिलाई एक घंटे में होगी, मशीन उसे एक मिनट में कर देती है।
बॉबिन और बॉबिन केसधागे की छोटी चरखी, जो मशीन के नीचे लगती है। मशीन के टाँके में दो धागे लगते हैं — एक ऊपर से, एक नीचे बॉबिन से।
बड़ी कैंचीकपड़ा काटने के लिए। दर्जी इससे कागज कभी नहीं काटता, क्योंकि कागज से धार भोथरी हो जाती है।
इंच-टेप (नापने का फीता)ग्राहक का नाप लेने के लिए — छाती, कमर, लंबाई, कंधा, बाँह।
दर्जी की खड़ियाकपड़े पर काटने की रेखाएँ बनाने के लिए। यह निशान बाद में झड़ जाता है।
पिन और पिन-कुशनसिलाई से पहले दो टुकड़ों को अपनी जगह पर टिकाए रखने के लिए।
सुइयाँ और अँगुश्ताना (थिंबल)हाथ की सिलाई के लिए; अँगुश्ताना उस उँगली को बचाता है जो सुई को धकेलती है।
अनेक रंगों के धागों की रीलेंताकि सिलाई का रंग कपड़े के रंग से मिल जाए।
इस्तरी और इस्तरी की मेजसिलाई-रेखाओं को दबाकर चपटा करने के लिए, जिससे तैयार वस्त्र ठीक बैठे।
कागज के नमूने (पैटर्न) और पुतलानमूने से काटने का आकार मिलता है; पुतले पर नाप जाँची जाती है।

नमूना उत्तर — हथकरघा बुनकर के यहाँ मेरी यात्रा

औजार या करघे का भागउसका उपयोग
करघालकड़ी का बड़ा ढाँचा, जिस पर कपड़ा बुना जाता है। यह धागों के एक पूरे समूह को कसकर और सीधा पकड़े रखता है।
ताना और उसका बेलनकपड़े की लंबाई में जाने वाले धागे। ये पीछे के बेलन पर लिपटे रहते हैं और स्थिर रहते हैं।
ढरकी (शटल)नाव जैसी चिकनी लकड़ी, जिसमें धागे की नली रहती है। बुनकर इसे एक ओर से दूसरी ओर फेंकता है, जिससे धागा ताने के आर-पार चला जाता है — यही बाना है।
राछ और पायदानपायदान दबाते ही ताने का हर दूसरा धागा ऊपर उठ जाता है और ढरकी के निकलने के लिए रास्ता खुल जाता है। मिनट में सैकड़ों बार “ऊपर-नीचे” इसी तरह होता है।
कंघी (रीड)हर बार ढरकी फेंकने के बाद इसे आगे धकेलकर नए धागे को बुने हुए कपड़े से सटाकर कसा जाता है।
कपड़े का बेलनसामने का बेलन, जिस पर बुना हुआ कपड़ा लिपटता जाता है।
चरखी या नली भरने का चरखाढरकी में डालने वाली छोटी नलियों पर धागा लपेटने के लिए।
बुनकर के हाथ और पैरदोनों पैर पायदान चलाते हैं और दोनों हाथ ढरकी फेंककर कंघी खींचते हैं — वह भी एक ही समय पर, पूरे दिन।
सबसे अधिक ध्यान देने योग्य बात: इनमें से कोई भी काम आसान नहीं है। बुनकर घंटों तक हाथ और पैर की एक लय बनाए रखता है। दर्जी को किसी सचमुच के व्यक्ति का नाप लेकर कपड़ा काटना पड़ता है, और गलत कट जाए तो कपड़ा वापस नहीं जुड़ता। ये दोनों कुशल कार्य हैं, जिन्हें सीखने में वर्षों लगते हैं। जाते समय धन्यवाद कहिए, और हो सके तो कोई छोटी वस्तु खरीद लीजिए।
क्या आप जानते हैं? हथकरघा बुनाई में बिजली बिलकुल नहीं लगती। इसीलिए इसे पर्यावरण-अनुकूल और संधारणीय कहा जाता है — और यह भारत में 45 लाख से अधिक लोगों को, जिनमें अधिकतर महिलाएँ और ग्रामीण कारीगर हैं, आजीविका देती है।
प्र4.
4. पता लगाइए कि आपके क्षेत्र या राज्य में किस प्रकार की बुनाई या सिलाई का काम प्रसिद्ध है। उसका नाम बताइए।
उत्तर

भारत का लगभग हर राज्य किसी न किसी अपने कपड़े के लिए जाना जाता है। किसी बड़े से पूछिए, साड़ी बेचने वाले दुकानदार से पूछिए, या देखिए कि त्योहार के दिन आपके नगर में लोग क्या पहनते हैं।

पता कैसे लगाएँ:

  1. घर पर पूछिए — “क्या हमारे क्षेत्र का कोई प्रसिद्ध कपड़ा या कढ़ाई है?”
  2. कपड़े की दुकान पर पूछिए कि विवाह के समय लोग कौन-सा स्थानीय कपड़ा माँगते हैं।
  3. देखिए कि दादी की सबसे अच्छी साड़ी या दादाजी के शॉल को क्या कहते हैं।
  4. नाम, बनने का स्थान और उसकी एक विशेषता लिख लीजिए।

नमूना उत्तर: “हमारे राज्य पंजाब में प्रसिद्ध काम है फुलकारीफुल अर्थात् फूल और कारी अर्थात् काम — यानी नाम का अर्थ है फूलों का काम। महिलाएँ सादे कपड़े पर चमकीले रेशमी धागे से, प्रायः उल्टी ओर से, कढ़ाई करती हैं, जिससे सीधी ओर लाल, पीले, गुलाबी और नारंगी फूल तथा ज्यामितीय आकार भर जाते हैं। इसे दुपट्टे या ओढ़नी के रूप में पहना जाता है और परंपरा से विवाह के समय लड़की को फुलकारी दी जाती है। मेरी दादी के पास एक फुलकारी है जो उनकी माँ ने बनाई थी।”

भारत की कुछ प्रसिद्ध बुनाई और कढ़ाई परंपराएँ — इनमें से कई का उल्लेख इसी अध्याय में है:

राज्य या क्षेत्रप्रसिद्ध बुनाई या सिलाई का काम
तमिलनाडुकांजीवरम रेशमी साड़ियाँ (बुनाई); नीलगिरि की टोडा कढ़ाई
कश्मीरपश्मीना शॉल (बुनाई); कश्मीरी कढ़ाई और उसका आम्र-कली (पेजली) प्रतिरूप
ओडिशा और गुजरातइकत बुनाई; गुजरात के पाटन की पटोला साड़ियाँ
उत्तर प्रदेशलखनऊ की चिकनकारी; वाराणसी की बनारसी रेशमी साड़ियाँ
राजस्थानबंजारा कढ़ाई, गोटा काम, बांधनी
पंजाबफुलकारी कढ़ाई
पश्चिम बंगाल, ओडिशा, त्रिपुराकंथा कढ़ाई, जो कच्चे टाँकों की पंक्तियों से बनती है
मेघालयखनेंग कढ़ाई
गुजरात (कच्छ)काला कपास की बुनाई, शीशे की कढ़ाई
असम और पूर्वोत्तरमूगा और एरी रेशम की बुनाई, जो घर के करघों पर होती है
मध्य प्रदेशचंदेरी और महेश्वरी साड़ियाँ
आंध्र प्रदेश और तेलंगानापोचमपल्ली इकत, कलमकारी
बिहार और झारखंडतसर रेशम की बुनाई, सुजनी कढ़ाई
महाराष्ट्रपैठणी साड़ियाँ; पुराने कपड़ों से बनी गुदड़ी
केरलकसावु — सुनहरे किनारे वाला सफेद सूती वस्त्र
हर स्थान का अपना कपड़ा क्यों है: बुनकर वही सामग्री उपयोग करते थे जो पास में मिलती थी — काली मिट्टी वाले क्षेत्रों में कपास, जहाँ शहतूत उगता है वहाँ रेशम, ठंडे पहाड़ों में ऊन। फिर हर क्षेत्र ने अपने प्रतिरूप और रंग जोड़े और उन्हें पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाया। इसलिए कपड़ा केवल कपड़ा नहीं होता। वह बताता है कि वह कहाँ से आया है।
प्र5.
5. हमें पुराने कपड़े नहीं फेंकने चाहिए। क्यों?
उत्तर

क्योंकि पुराना कपड़ा अब भी काम का है, उसे बनाने में बहुत परिश्रम लगा है, और उसे फेंकने से केवल कचरा बढ़ता है।

  • कोई और उसे अब भी पहन सकता है। जो कमीज आपके लिए छोटी हो गई, वह किसी छोटे बच्चे को ठीक आती है। कपड़े आगे देना हमारे घरों की पुरानी आदत है और इसमें कुछ खर्च नहीं होता।
  • उससे कुछ नया बनाया जा सकता है। पुरानी साड़ियों से रजाइयाँ बनती हैं। पुरानी कमीजों से सफाई के कपड़े और थैले। पुस्तक हमें छोटे-छोटे टुकड़े जोड़कर सुंदर रजाई बनाने की पुरानी भारतीय परंपरा बताती है।
  • कपड़ा बनाने में बहुत परिश्रम लगता है। किसी ने कपास उगाई और चुनी, किसी ने सूत काता, किसी ने करघे पर बुना, किसी ने सिला। कपड़ा फेंकने का अर्थ है यह सारा परिश्रम फेंक देना।
  • कपड़ा बनाने में बहुत जल और भूमि लगती है। कपास की फसल के लिए भूमि, जल और महीनों की देखभाल चाहिए। कपड़े को अधिक समय तक चलाने का अर्थ है कम नया कपड़ा बनाना पड़ेगा।
  • कपड़े का कचरा गायब नहीं होता। सूती कपड़ा धीरे-धीरे गल जाता है, पर नायलॉन और पॉलिस्टर जैसे कृत्रिम कपड़े वर्षों तक मिट्टी में पड़े रहते हैं। फेंके हुए कपड़ों का ढेर वहीं का वहीं रहता है।
  • किसी को उसकी आवश्यकता है। पुराने पर साफ कपड़े किसी जरूरतमंद को देने पर उनका मोल कूड़ेदान से कहीं अधिक होता है।
किसी को दे दीजिए → कोई उसे पहनेगा
काटकर सिल लीजिए → रजाई, थैला, सफाई का कपड़ा
फेंक दीजिए → कुछ भी हाथ नहीं आता
इसके पीछे का विचार: हर कपड़े में किसान, कातने वाले, बुनकर और दर्जी का परिश्रम भरा है। उस परिश्रम का आदर करने का अर्थ है कपड़े को तब तक चलाना जब तक चल सके, और फिर उससे कुछ और बना लेना। हमारी दादी-नानी यही करती थीं, बिना किसी से यह शब्द सीखे — पुनर्चक्रण
प्र6.
6. नीचे रेशमकीट के जीवन-चक्र के चरणों को आगे-पीछे दिया गया है। इन्हें पढ़िए और सही क्रम में 1 से 6 तक संख्याएँ लिखिए। • व्यस्क रेशमकीट कोकून से बाहर आता है। • अंडों से छोटे-छोटे रेशमकीट (लार्वा) निकलते हैं। • रेशमकीट अंडे देता है। • चक्र पुनः आरंभ होता है। • रेशमकीट (लार्वा) शहतूत के पत्ते खाते हैं और बड़े हो जाते हैं। • रेशमकीट (लार्वा) अपने चारों ओर कृमिकोष (कोकून) बुनते हैं।
उत्तर

सही क्रम यह है। ये संख्याएँ पुस्तक में दिए गए गोलों में लिखिए।

पुस्तक में दिया गया चरणइसका अर्थकौन-सी संख्या लिखें
व्यस्क रेशमकीट कोकून से बाहर आता है।कीट अपने रेशमी खोल को तोड़कर बाहर आता है5
अंडों से छोटे-छोटे रेशमकीट (लार्वा) निकलते हैं।अंडों से नन्हे लार्वा निकलते हैं2
रेशमकीट अंडे देता है।सबसे पहली अवस्था1
चक्र पुनः आरंभ होता है।नया कीट अंडे देता है और सब फिर से शुरू6
रेशमकीट (लार्वा) शहतूत के पत्ते खाते हैं और बड़े हो जाते हैं।वे खाते जाते हैं और तेजी से बढ़ते हैं3
रेशमकीट (लार्वा) अपने चारों ओर कृमिकोष (कोकून) बुनते हैं।हर लार्वा स्वयं को रेशम में लपेट लेता है4

अब सही क्रम में पढ़िए:

  1. रेशमकीट अंडे देता है।
  2. अंडों से छोटे-छोटे रेशमकीट (लार्वा) निकलते हैं।
  3. रेशमकीट (लार्वा) शहतूत के पत्ते खाते हैं और बड़े हो जाते हैं।
  4. रेशमकीट (लार्वा) अपने चारों ओर कृमिकोष (कोकून) बुनते हैं।
  5. व्यस्क रेशमकीट कोकून से बाहर आता है।
  6. चक्र पुनः आरंभ होता है।
2 और 3. लार्वा शहतूत के पत्ते खाकर बड़ा होता है 1. अंडे पत्ते पर दिए हुए 4. कृमिकोष चारों ओर लिपटा रेशम 5. वयस्क रेशमकीट कोकून से बाहर आता है रेशमकीट का जीवन-चक्र 6. कीट अंडे देता है और चक्र पुनः आरंभ हो जाता है।
चारों अवस्थाएँ घूम-घूमकर दोहराई जाती हैं। इसीलिए इसे चक्र कहते हैं — इसका कोई अंत नहीं।
क्रम स्वयं कैसे निकालें: यह पूछिए कि कौन-सा चरण किसके पहले आना ही चाहिए। अंडे दिए बिना लार्वा नहीं निकल सकते, इसलिए “अंडे देता है” पहले आएगा। कोकून बुनने से पहले लार्वा को बड़ा होना पड़ेगा। और वयस्क कीट कोकून बनने के बाद ही बाहर आ सकता है। जो कीट बाहर आता है, वही अगले अंडे देता है — इसलिए अंतिम चरण फिर पहले चरण से जुड़ जाता है। जीवन-चक्र का यही अर्थ है: वृद्धि और परिवर्तन का ऐसा क्रम जो दोहराया जाता है।
रेशम कहाँ से आता है: जो रेशम हम पहनते हैं, वह चरण 4 का धागा है — कृमिकोष का। कोकून को गर्म पानी में डालकर धागा धीरे से बाहर निकाला जाता है और उससे रेशमी सूत बनता है। एक कोकून में बहुत लंबा, बहुत महीन और बिना टूटा हुआ एक ही धागा होता है।
प्र7.
7. अपने घर से या आस-पास के दर्जी से विभिन्न प्रकार के वस्त्रों के 5–6 टुकड़े (बचे हुए कपड़े) लीजिए। इन वस्त्रों का ध्यानपूर्वक अवलोकन करके तालिका पूरी कीजिए। किसी बड़े से पूछें या अपनी पुस्तक में ढूँढ़कर पता करें कि ये वस्त्र किस पदार्थ (रेशे) से बने हैं — सूती, ऊनी, रेशमी, जूट, पॉलिएस्टर या नायलॉन।
वस्त्रों की क्रम संख्याकैसा अनुभव हुआ? (चिकना, खुरदुरा)मोटा/पतलाचमकदार (हाँ/नहीं)खिंचाव (हाँ/नहीं)आपके अनुमान के अनुसार यह किस पदार्थ (रेशे) से बना है?
1.
2.
3.
4.
5.
उत्तर

हर टुकड़े की जाँच कैसे करें:

  1. छूकर देखिए। आँखें बंद करके उसे उँगलियों में मलिए। वह चिकना है, खुरदुरा है, नरम है या चुभने वाला?
  2. प्रकाश के सामने रखिए। यदि प्रकाश आसानी से आर-पार जाए तो कपड़ा पतला है, नहीं जाए तो मोटा।
  3. प्रकाश में घुमाइए। क्या वह चमकता है, या प्रकाश उसमें डूब जाता है?
  4. धीरे से खींचिए दो दिशाओं में। क्या वह खिंचकर वापस आ जाता है, या वैसा ही रहता है?
  5. किसी बड़े से पूछिए कि यह कौन-सा कपड़ा है, और लेबल हो तो देखिए। फिर पृष्ठ 136 और 137 के रेशों से मिलाइए।

नमूना उत्तर — मेरी भरी हुई तालिका

वस्त्रों की क्रम संख्याकैसा अनुभव हुआ? (चिकना, खुरदुरा)मोटा/ पतलाचमकदार (हाँ/नहीं)खिंचाव (हाँ/नहीं)आपके अनुमान के अनुसार यह किस पदार्थ (रेशे) से बना है?
1नरम और चिकना, पर फिसलने वाला नहींपतलानहींनहींसूती — पुरानी कमीज का टुकड़ा
2बहुत चिकना और फिसलने वाला, छूने में ठंडापतलाहाँनहींरेशमी — साड़ी के किनारे का टुकड़ा
3नरम पर थोड़ा चुभने वाला, तुरंत गर्म लगता हैमोटानहींहाँऊनी — पुराने स्वेटर का टुकड़ा
4खुरदुरा और रोएँदार, हाथ में चुभता हैमोटानहींनहींजूट — बोरी का टुकड़ा
5चिकना और थोड़ा फिसलने वाला, पानी नहीं सोखतापतलाहाँथोड़ापॉलिएस्टर — बस्ते के अस्तर का टुकड़ा
6बहुत चिकना, लगभग प्लास्टिक जैसा, सरसराहट की आवाज करता हैपतलाहाँहाँनायलॉन — पुराने छाते के कपड़े का टुकड़ा

आपकी तालिका में आपके अपने टुकड़े होंगे, इसलिए आपके उत्तर अलग हो सकते हैं। महत्वपूर्ण यह है कि हर खाना सचमुच छूकर और देखकर भरा जाए, अनुमान से नहीं।

पहचानने में सहायता के लिए एक छोटी तालिका:

यदि कपड़ा ऐसा है…तो प्रायः वह है
नरम, बिना चमक का, पतला, पानी जल्दी सोखने वाला, जल्दी सिलवट पड़ने वालासूती
चिकना, चमकदार, ठंडा और बहुत हल्कारेशमी
मोटा, रोएँदार, गर्म, थोड़ा खिंचने वालाऊनी
खुरदुरा, रोएँदार, कड़ा, भूरा-साजूट
चिकना और थोड़ा चमकदार, सिलवट न पड़ने वाला, बहुत जल्दी सूखने वालापॉलिएस्टर
बहुत चिकना और फिसलने वाला, मजबूत, सरसराता हुआ, पानी फिसल जाने वालानायलॉन
ये जाँचें काम क्यों करती हैं: कपड़ा कैसा लगता है, यह सीधे उसके रेशे पर निर्भर करता है। ऊन गर्म इसलिए लगती है क्योंकि उसके रेशे हवा को अपने बीच रोक लेते हैं। सूती कपड़ा पसीना सोखता है क्योंकि उसके रेशे पानी को भीतर ले लेते हैं। नायलॉन और पॉलिएस्टर कारखाने में बनते हैं और पानी बिलकुल नहीं सोखते, इसलिए वे जल्दी सूखते हैं पर गर्मी में पहनने पर गर्म लगते हैं। अर्थात् कपड़े का व्यवहार बता देता है कि वह किस रेशे का है — और यह भी कि उसे कब पहनना चाहिए।
सावधानी: आजकल बहुत-से कपड़े दो रेशों के मिश्रण से बनते हैं — जैसे कपास में थोड़ा पॉलिएस्टर। यदि कोई टुकड़ा सूती जैसा लगे पर उसमें सिलवट बिलकुल न पड़े तो वह प्रायः मिश्रण होगा। निश्चित न हो पाने पर चिंता मत कीजिए; जो आपको लगता है वह लिखिए और फिर किसी बड़े से पूछ लीजिए।
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