प्र1.
अपने दैनिक जीवन में हम कच्चे टाँकों का उपयोग और कहाँ कर सकते हैं?
उत्तर
कच्चे टाँके लगभग हर उस जगह काम आते हैं जहाँ कपड़े को थामकर रखना हो — मरम्मत में, मोहरी में, टुकड़े जोड़ने में और सजावट में।
| कच्चे टाँके कहाँ काम आते हैं | वहाँ वे क्या करते हैं |
|---|---|
| फटी कमीज या फटी जेब की मरम्मत | फटे दोनों किनारों को पास लाकर थाम लेते हैं |
| पतलून या स्कर्ट के नीचे की मोहरी बनाना | मुड़े हुए किनारे को दबाए रखते हैं ताकि वह उधड़े नहीं |
| टुकड़े जोड़कर रजाई या गुदड़ी बनाना | चौकोर टुकड़ों को जोड़ते हैं और तहों को भी एक साथ थामते हैं |
| बंगाल, ओडिशा और त्रिपुरा की कंथा कढ़ाई | पूरी डिजाइन कच्चे टाँकों की पंक्तियों से ही बनती है — वही टाँका जो आपने अभी सीखा |
| मशीन की सिलाई से पहले कच्ची सिलाई | दो टुकड़ों को ढीले-ढाले जोड़े रखती है, ताकि दर्जी नाप जाँच सके |
| पायजामे या थैले में नाड़े की नली बनाना | नाड़ा या डोरी निकालने के लिए सुरंग बना देते हैं |
| कपड़े में चुन्नट डालना | एक रेखा में टाँके लगाकर धागा खींचिए — कपड़ा सिमटकर चुन्नटदार हो जाता है |
| तकिए का गिलाफ, गद्दे का खोल या अनाज की बोरी बंद करना | खुला मुँह बंद कर देते हैं |
| पोशाक के अंदर नाम-पट्टी लगाना | पट्टी को टिका देते हैं ताकि वह खो न जाए |
एक साधारण टाँका इतने काम कैसे कर लेता है: कच्चा टाँका तेज लगता है, उसमें धागा बहुत कम लगता है, और गलती हो जाए तो उसे आसानी से खोला जा सकता है। जहाँ बहुत अधिक मजबूती चाहिए वहाँ दर्जी मशीन का टाँका लगाता है — पर रोज के जोड़ने और मरम्मत का अधिकतर काम यही एक टाँका कर देता है।
कंथा को फिर देखिए: पृष्ठ 142 के चित्र में क्रीम रंग के कपड़े पर लाल फूल और हरी पत्तियाँ हैं। उनकी हर रेखा कच्चे टाँकों की पंक्ति है। पूर्वी भारत की महिलाओं ने उसी टाँके से एक पूरी कला खड़ी कर दी जो बच्चा सबसे पहले सीखता है।